अक्सर अकेले में ढुंढती हूँ

अक्सर अकेले में ढुंढती हूँ, उन छः महीनों का हाल, बस खुद को यकीं दिलाने को, के हाँ, शायद मैं बचा सकती थी तुम्हें…. खंगालती हूँ अपने दिमाग का हर इक कोना, याद करने को उस ताले का नंबर, जिसमे छुपाये तुम्हारी डायरी के कुछ पन्ने, शायद अभी भी इंतजार करते होंगे मेरा… तुम्हारी काबिलियत पर कभी भी, शक न था मुझे, तभी तो आज … Continue reading अक्सर अकेले में ढुंढती हूँ