आज ईद…कल से रोज़े (लघुकथा)

असगरी का दुपट्टा अब अपना रंग गंवा कर, सफेद और मटमैले के बीच के किसी रंग का हो चला था। किनारे की ज़री, कब धागों में बदल गई…पता भी नहीं चला। दुपट्टा जब डालती तो लगता कि बस एक दिन उसके सारे बाल भी इसी रंग के हो जाएंगे… “और क्या तब तक इसी दुपट्टे से काम चलाना पड़ेगा? ले दे कर उसके पास एक … Continue reading आज ईद…कल से रोज़े (लघुकथा)