हर हर मोदी घर घर मोदी – Mayank Saxena

हर हर मोदी घर घर मोदी महंगी सब्ज़ी अरहर मोदी फेंके लंबी टर टर मोदी कहते अफसर सर सर मोदी रोये जनता पत्थर मोदी दंगा होता बर्बर मोदी बोले झूठ है बम्पर मोदी विरोधियों का हंटर मोदी आर एस एस का पंटर मोदी सच से कांपे थर थर मोदी अब गरीब से डर डर मोदी घूमे दुनिया जी भर मोदी पर हो गूंगा घर पर … Continue reading हर हर मोदी घर घर मोदी – Mayank Saxena

Turned out you were just like us: Fahmida Riaz tells Indians

As India basks under the glory of unchecked hate-crimes, it is time to remember the lines of Pakistani female poet Fahmida Riaz, who warned about such scenario long ago. The video of Fahmia Riaz herself reciting this poem can be seen below: तुम बिल्कुल हम जैसे निकले तुम बिल्कुल हम जैसे निकले अब तक कहां छुपे थे भाई? वह मूरखता, वह घामड़पन जिसमें हमने सदी … Continue reading Turned out you were just like us: Fahmida Riaz tells Indians

वो मनमोहन सिंह नहीं चुपेन्द्र है – Bodhi Sattva

वह चुपेन्द्र है     रेल का किराया बढ़ा वो चुप है डीजल पेट्रोल का दाम बढ़ा वो चुप है चीनी का भाव चढ़ा वो चुप है प्याज का भाव बढ़ा वो चुप है। वो मनमोहन सिंह नहीं चुपेन्द्र है। Continue reading वो मनमोहन सिंह नहीं चुपेन्द्र है – Bodhi Sattva

There Will Come Soft Rains -Sara Teasdale

There will come soft rains and the smell of the ground, And swallows circling with their shimmering sound; And frogs in the pools singing at night, And wild plum trees in tremulous white, Robins will wear their feathery fire Whistling their whims on a low fence-wire; And not one will know of the war, not one Will care at last when it is done. Not … Continue reading There Will Come Soft Rains -Sara Teasdale

रेशम (by Shaleen Rakesh)

मेरी पलकों के तले तितलियों के चित्र हैं हर बार जब आँखें झपकता हूँ रंग उड़ने लग जाते हैं एक धुन सी सुनायी देती है जागो तो, जाग जाओ जब हम मिले थे तब मैं घास पर रेशमी कीड़े सा, तुम्हें खोजता था तब पर नहीं निकले थे हमारे ये सच है अब मेरी दस आँखें नहीं रहीं पर अगर होतीं तो तुम पर होतीं। Continue reading रेशम (by Shaleen Rakesh)

समय रे समय! – मृत्युंजय प्रभाकर

समय रे समय! 6/03/2013 ह्यूगो चावेज़ को समर्पित समय की खूंटी पर नंगी लाश टंगी है खून पसरा है फर्श पर दीवालों पर छीटें बिखरे हैं जलते लोथड़े फैले हैं इधर-उधर जबकि टेबल पर बोतल खुली है और पलंग पर जांघें कहते हैं यहाँ सभ्यता बसती है। मृत्युंजय प्रभाकर Continue reading समय रे समय! – मृत्युंजय प्रभाकर

उसके अलावा कुछ भी नहीं – राजेन्द्र राजन

चिड़िया की आंख शुरु से कहा जाता है सिर्फ चिड़िया की आंख देखो उसके अलावा कुछ भी नहीं तभी तुम भेद सकोगे अपना लक्ष्य सबके सब लक्ष्य भेदना चाहते हैं इसलिए वे चिड़िया की आंख के सिवा बाकी हर चीज के प्रति अंधे होना सीख रहे हैं इस लक्ष्यवादिता से मुझे डर लगता है मैं चाहता हूं लोगों को ज्यादा से ज्यादा चीजें दिखाई दें … Continue reading उसके अलावा कुछ भी नहीं – राजेन्द्र राजन

When the music died – Shaleen Rakesh

(Photo Courtesy: Pinterest) The sound waves lingered in the deafening silence that followed 
I jumped fences at the cemetery 
clutching wilted flowers bargaining for sleep in the night I see the disco lights still flickering their last gasp
s I admit I turned away 
 drinking iced tea to keep cool 
 and pretending the moon beams 
 did not whisper your name. Continue reading When the music died – Shaleen Rakesh