जन-गण-मन… दे दनादन – Rakesh Kayasth

सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाने के परंपरा के विरोध में मैने कई बार लिखा है। राष्ट्रीय प्रतीकों के ज़रूरत से ज्यादा इस्तेमाल से उनकी गरिमा धूमिल होती है। साथ ही तथाकथित राष्ट्रवाद के नाम पर गुंडागर्दी करने वालों को इसका लाइसेंस भी मिल जाता है। ताजा शिकार हमेशा व्हील चेयर पर रहने वाले लेखक सलिल चतुर्वेदी हैं, जिन्हे गोवा के सिनेमा हॉल में जन-गण-मन के … Continue reading जन-गण-मन… दे दनादन – Rakesh Kayasth