सबसे ख़तरनाक – पाश

        मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होतीपुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होतीग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होतीबैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो हैसहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो हैसबसे ख़तरनाक नहीं होताकपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो हैजुगनुओं की लौ में पढ़नामुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो हैसबसे ख़तरनाक … Continue reading सबसे ख़तरनाक – पाश

समय रे समय! – मृत्युंजय प्रभाकर

समय रे समय! 6/03/2013 ह्यूगो चावेज़ को समर्पित समय की खूंटी पर नंगी लाश टंगी है खून पसरा है फर्श पर दीवालों पर छीटें बिखरे हैं जलते लोथड़े फैले हैं इधर-उधर जबकि टेबल पर बोतल खुली है और पलंग पर जांघें कहते हैं यहाँ सभ्यता बसती है। मृत्युंजय प्रभाकर Continue reading समय रे समय! – मृत्युंजय प्रभाकर

अच्छी होगी फसल मतदान की- गोरख पाण्डेय

छुरा भोंककर चिल्लाये .. हर हर शंकर छुरा भोंककर चिल्लाये .. अल्लाहो अकबर शोर खत्म होने पर जो कुछ बच रहा वह था छुरा और बहता लोहू… इस बार दंगा बहुत बड़ा था खूब हुई थी ख़ून की बारिश अगले साल अच्छी होगी फसल मतदान की – गोरख पाण्डेय Continue reading अच्छी होगी फसल मतदान की- गोरख पाण्डेय

किसी आतंकवादी संगठन से जुड़े सबूत – Rizvi

          मेरा एनकाउंटर कर के  हथियार, गोले, बारूद  किसी आतंकवादी संगठन से जुड़े सबूत  कोई पत्र, कुछ पैसे इत्यादि से मेरी लाश को सजाने से पहले    कम से में कम मेरे शरीर के अंग दान कर देना  ताकि किसी की जान बच जाय  मेरी आँखें भी किसी नेत्रहीन को दे देना    वर्दीवालों डरो नहीं,  मरने के बाद दान की … Continue reading किसी आतंकवादी संगठन से जुड़े सबूत – Rizvi

लड़ने के बहाने पहले से तय हैं – Himanshu Kumar

जन्म लेते ही मुझे हिन्दू, मुसलमान , या फलाना या ढिकाना  बना दिया गया जन्म लेने से पहले ही मेरे दुश्मन भी तय कर दिए गये जन्म से पहले ही मेरी ज़ात भी तय कर दी गयी यह भी मेरे जन्म से पहले ही तय कर दिया गया था कि मुझे किन बातों पर गर्व और किन पर शर्म महसूस करनी है अब एक अच्छा नागरिक होने के लिये मेरा कुछ … Continue reading लड़ने के बहाने पहले से तय हैं – Himanshu Kumar

मैं हूं – Mrityunjay Prabhakar

                गेहूं की बालियों मटर के दानों चावल की बोरियों आलू के खेतों में बनमिर्ची के झुरमुटों आम के दरख्तों जामुन की टहनियों अमरूद के पेड़ों में गांव की गलियों खेतों की पगडंडियों सड़कों के किनारों शहरों की परिधि में रात की चांदनी सहर के धुंधलके शाम की सस्ती चाय दोपहर के सादे भोजन में साइबरस्पेस के किसी … Continue reading मैं हूं – Mrityunjay Prabhakar

बाढ़-टूरिज्म – Iqbal Abhimanyu

देखा है किसी शहर को डूबते हुए? चौखटों, आंगनों, दीवारों, किलकारियों, झल्लाहटों को ‘गड़प’ से मटमैले पानी में गुम हो जाते देखा है? सर पर बर्तन-भांडे, संसार का बोझ लिए लड़खड़ाती औरतों को देखा है? लाइन में लग बासी पुरियों और सड़े आलुओं की सब्जी लेते स्कूल ड्रेस में खड़े बच्चे के कीचड खाए पैरों को देखा है? देखा है गौमाता की सडती लाशों पर … Continue reading बाढ़-टूरिज्म – Iqbal Abhimanyu

तुम्हारे साथ रहकर – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गयी हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गयी है जो खचाखच भरा है, कहीं भी एकान्त नहीं न बाहर, न भीतर। तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे लगा है कि हम असमर्थताओं से नहीं सम्भावनाओं से घिरे हैं, हर दिवार में द्वार बन सकता है और हर … Continue reading तुम्हारे साथ रहकर – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

धर्म की जय हो – Mayank Saxena

रक्तों के सागर में स्नान कर आया है खा कर मानव अंतड़ियां नाखूनों में देखो अभी तक भरा है मज्जा का गूदा आंखों से बह रही है हिंसा…और हिंसा उसके नाम अलग अलग हैं उसका तरीका एक ही धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो… Continue reading धर्म की जय हो – Mayank Saxena

तुम सिर्फ गण के कवि हो – Mayank Saxena

मैंने कहा मैं कवि हूं बांध दूंगा अपनी कविता में तुम्हें रोक दूंगा तुम्हारी उत्श्रृंखलता को वो बोला मैं कांवड़िया हूं तोड़ दूंगा तुम्हारी कलम छीन कर जला दूंगा सारे कागज़ हड्डियां छितरा दूंगा फिर लिखना कविता तुम सिर्फ गण के कवि हो और मैं शिव का गण हूं… हर हर महादेव…. Continue reading तुम सिर्फ गण के कवि हो – Mayank Saxena