तुम बचे रह गए पुरुष और मैं दूर होती गई- Ila Joshi

मैं औरत हूं और मुझे नहीं चाहिए पिता की संपत्ति में हिस्सा भाई से कोई तोहफ़ा पति से निजी खर्च और बेटे से बुढ़ापे का सहारा ये सब तुम रख लो और साथ में रख लो मेरा धर्म, जात और मेरा तुम्हारे साथ वो हर रिश्ता जो मेरे औरत बने रहने में मुझे तक़लीफ़ देते हैं इस असल के सूद में मैं दूंगी तुम्हें मेरा … Continue reading तुम बचे रह गए पुरुष और मैं दूर होती गई- Ila Joshi

आर्यवर्त की सजग सरकार-बोधिसत्व

  तभी अचानक सावन के दिव्य महीने में सर्वथा नूतन सरकार ने … एक नया नवेला नियम बनाया घर में दफ्तर में बाजार में रात दिन दोपहर मे नदी नाले नहर में डूब कर या खा कर जहर जो जान गवांएगा ऐसा आत्म हत्यारा देश के लिए शहीद माना जाएगा ऐसे आत्म बलिदानियों की भव्य समाधि बनेगी नगर चौक पर मूर्ति बिठाई जाएगी जन कवियों … Continue reading आर्यवर्त की सजग सरकार-बोधिसत्व

तुम्हारी दीवार कितनी लम्बी है?- Mayank Saxena

        तुम्हारी दीवार कितनी लम्बी है? कितने किलोमीटर लम्बी है ये दीवार क्या कहा कोई 700 किलोमीटर लम्बी तो कितना लगा होगा इसमें सीमेंट कितनी ईंटें कितना लोहा कितने लोग और कितना पैसा कितना ख़ून, ये मत बताना हमारा बहा है, सो हम जानते हैं किसी से भी बेहतर कितने किलोमीटर लम्बी है ये दीवार क्या कहा…कोई 700 किलोमीटर लम्बी? जिसको तुम … Continue reading तुम्हारी दीवार कितनी लम्बी है?- Mayank Saxena

बाढ़-टूरिज्म – Iqbal Abhimanyu

देखा है किसी शहर को डूबते हुए? चौखटों, आंगनों, दीवारों, किलकारियों, झल्लाहटों को ‘गड़प’ से मटमैले पानी में गुम हो जाते देखा है? सर पर बर्तन-भांडे, संसार का बोझ लिए लड़खड़ाती औरतों को देखा है? लाइन में लग बासी पुरियों और सड़े आलुओं की सब्जी लेते स्कूल ड्रेस में खड़े बच्चे के कीचड खाए पैरों को देखा है? देखा है गौमाता की सडती लाशों पर … Continue reading बाढ़-टूरिज्म – Iqbal Abhimanyu

तुम्हारे साथ रहकर – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गयी हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गयी है जो खचाखच भरा है, कहीं भी एकान्त नहीं न बाहर, न भीतर। तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे लगा है कि हम असमर्थताओं से नहीं सम्भावनाओं से घिरे हैं, हर दिवार में द्वार बन सकता है और हर … Continue reading तुम्हारे साथ रहकर – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

साली मुफ्तखोर – Mayank Saxena

गांव गए हो कभी नुक्कड़ पर छप्पर के नीचे सुबह से गांजा लगा कर जुआ खेलते 9 पुरुष आपस में बात करते हैं अपनी औरतों से बेहद परेशान कहते हैं कल साली को खूब मारा आज कल हरामखोर हो गई है काम में मन नहीं लगता है साली मुफ्तखोर दो पड़े हैं देखो कैसे सुबह से लगी है खेत में काम पर अब देखो मुन्ना … Continue reading साली मुफ्तखोर – Mayank Saxena

कुछ मकान बूढ़े हो जाते हैं – Mayank Saxena

कुछ मकान बूढ़े हो जाते हैं जब तो दरकने लगते हैं दरकते मकानों को रास नहीं आती मरम्मत पुताई लेकिन वो करवाता जाता है ये सब कुछ सिर्फ इसलिए कि बचा रहे वो देता रहे लोगों को आसरा मानते रहें लोग उसका अहसान बने रहें शरण में कहते रहें देखो असल तो पुराना ही है नया तो बेकार है कभी लगता है समाज… कहीं कोई … Continue reading कुछ मकान बूढ़े हो जाते हैं – Mayank Saxena

अक्सर अकेले में ढुंढती हूँ

अक्सर अकेले में ढुंढती हूँ, उन छः महीनों का हाल, बस खुद को यकीं दिलाने को, के हाँ, शायद मैं बचा सकती थी तुम्हें…. खंगालती हूँ अपने दिमाग का हर इक कोना, याद करने को उस ताले का नंबर, जिसमे छुपाये तुम्हारी डायरी के कुछ पन्ने, शायद अभी भी इंतजार करते होंगे मेरा… तुम्हारी काबिलियत पर कभी भी, शक न था मुझे, तभी तो आज … Continue reading अक्सर अकेले में ढुंढती हूँ