तुम्हारे साथ रहकर – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गयी हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गयी है जो खचाखच भरा है, कहीं भी एकान्त नहीं न बाहर, न भीतर। तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे लगा है कि हम असमर्थताओं से नहीं सम्भावनाओं से घिरे हैं, हर दिवार में द्वार बन सकता है और हर … Continue reading तुम्हारे साथ रहकर – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

धर्म की जय हो – Mayank Saxena

रक्तों के सागर में स्नान कर आया है खा कर मानव अंतड़ियां नाखूनों में देखो अभी तक भरा है मज्जा का गूदा आंखों से बह रही है हिंसा…और हिंसा उसके नाम अलग अलग हैं उसका तरीका एक ही धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो… Continue reading धर्म की जय हो – Mayank Saxena