No cap on corporate funds to parties, suggest a way out, Govt tells Opposition

Parliament Thursday approved the Finance Bill, rejecting five amendments proposed a day earlier by Rajya Sabha on curtailing more powers to taxmen and capping corporate donations to political parties. The amendments, forced by the Opposition in Rajya Sabha where the government lacked majority, were negated by Lok Sabha and the Bill passed, completing the budgetary…

Vimal Thorat speaks about Dalit Feminism with Teesta Setalvad

Vimal Thorat, Convenor of the National Campaign for Dalit Human Rights (NCDHR) and a former professor of Hindi at the Indira Gandhi National Open University (IGNOU), in this exclusive and detailed interview to Teesta Setalvad speaks of her decades long struggle to ensure that Dalit literature from seven Indian languages (translated into Hindi) is available…

जला कर मारने, गोली से उड़ा देने या नरसंहार के लिए ‘असहिष्‍णुता’ (इनटोलरेंस) सही शब्‍द नहीं है – अरुंधति राय

हालांकि, मैं नहीं मानती कि कोई अवॉर्ड हमारे काम को आंकने का सही पैमाना है। मैं लौटाए गए अवॉर्ड्स की सूची में 1989 में प्राप्‍त नेशनल अवॉर्ड (बेस्‍ट स्‍क्रीनप्‍ले के लिए) को भी शामिल करती हूं। मैं यह साफ कर देना चाहती हूं कि मैं यह अवॉर्ड इसलिए नहीं लौटा रही क्‍योंकि मैं उस बात…

सरकार या ईवेंट मैनेजमेंट? – रवीश कुमार

 सौजन्य – एनडीटीवी इंडिया देश काम से चलता है, लेकिन पिछले कई सालों से सरकारें आंकड़ों से काम चला रही हैं। इन आंकड़ों में एक और आंकड़ा शामिल करना चाहिए, बयानों का आंकड़ा। आंकड़े कि कब, किसने, कहां पर और किस तरह का बयान दिया, आपत्तिजनक बयान कौन से थे, किन बयानों का सबने स्वागत…

प्यारे प्रधानमंत्री जी, आपके भाषण से भभूत तक – पीएम को पाती

सेवा में, प्रिय विदेश , परिधान, प्रधान-सेवक, प्रधान मंत्री, भारतीय जनता पार्टी, आर एस एस, भारत सरकार, इंदरप्रस्थ दिल्ली। विषय – आपके भाषण से भरोसे, जाति से जेल, सेवा से सरकार और भाषा से भभूत तक के सम्बंध में महोदय, आपको प्रधानमंत्री कहना चाहता हूं तो थोड़ा लम्बा हो जाता है, पीएम कहता हूं तो…

यह देश है कि भीड़? – कविता

भीड़ के ख़तरों को तुम नहीं जानते भीड़ सुनती है सिर्फ लाउडस्पीकर को भीड़ सच नहीं सुनती भीड़ सुन नहीं सकती कैसे सुन सकता है कोई साफ-साफ किसी शोर को भीड़ आती है किसी बांध के टूटने के सैलाब सी भीड़ विपदा होती है जो गिर पड़ती है मनुष्यता पर जिसे रोका जा सकता है…

जनसंहार के मामलों पर उदासीनता हमारी राष्ट्रीय संस्कृति हो गई है – तीस्ता सेतलवाड़ (साक्षात्कार)

कुछ लोग तीस्ता सेतलवाड़ को बीजेपी की आंख का कांटा मानते हैं; कुछ एक ऐसी असुविधा, जो किसी भी तरह 2002 के गुजरात दंगों को भूलने नहीं देंगी। और कई लोग भी हैं, जो उनको एक निडर सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं, जो लगातार न्याय और धर्मनिरपेक्षता के मोर्चे पर डटी हैं। लेकिन तथ्य यह है…