तुम बचे रह गए पुरुष और मैं दूर होती गई- Ila Joshi

मैं औरत हूं और मुझे नहीं चाहिए पिता की संपत्ति में हिस्सा भाई से कोई तोहफ़ा पति से निजी खर्च और बेटे से बुढ़ापे का सहारा ये सब तुम रख लो और साथ में रख लो मेरा धर्म, जात और मेरा तुम्हारे साथ वो हर रिश्ता जो मेरे औरत बने रहने में मुझे तक़लीफ़ देते…

दादरी का अख़लाक़ – राजेश जोशी की कविता

“दादरी का अख़लाक़” हर हत्या के बाद ख़ामोश हो जाते हैं हत्यारे और उनके मित्रगण. उनके दाँतों के बीच फँसे रहते हैं ताज़ा माँस के गुलाबी रेशे, रक्त की कुछ बूँदें भी चिपकी होती हैं होंठों के आसपास, पर आँखें भावशून्य हो जाती हैं जैसे चकित सी होती हों धरती पर निश्चल पड़ी कुचली-नुची मृत…

यह देश है कि भीड़? – कविता

भीड़ के ख़तरों को तुम नहीं जानते भीड़ सुनती है सिर्फ लाउडस्पीकर को भीड़ सच नहीं सुनती भीड़ सुन नहीं सकती कैसे सुन सकता है कोई साफ-साफ किसी शोर को भीड़ आती है किसी बांध के टूटने के सैलाब सी भीड़ विपदा होती है जो गिर पड़ती है मनुष्यता पर जिसे रोका जा सकता है…