तीस्ता को ज़मानत न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल -Ravish Kumar

सुप्रीम कोर्ट के सवाल और कपिल सिब्बल की दलील के सामने आज सोलिसिटस जनरल तुषार मेहता सिर्फ एक ही बिन्दु के सहारे टिके नज़र आए कि इसकी सुनवाई हाईकोर्ट में हो रही है तो वहीं होनी चाहिए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में सुनवाई की तारीख को लेकर ही गंभीर सवाल उठा दिए।

UPDATED: 1 सितम्बर, 2022 11:08 PM

नई दिल्ली: 

सुप्रीम कोर्ट में आज तीस्ता सीतलवाड़ के मामले में गुजरात सरकार से जवाब देते नहीं बना। तीस्ता की ज़मानत का विरोध कर रही गुजरात सरकार हर सवाल पर बिखरती जा रही थी।सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस यू यू ललित ने कहा कि क्या हम आंखें बंद कर लें? सुप्रीम कोर्ट की बेंच की तरफ से जिस तरह से सवाल उठ रहे थे,उससे साफ हो रहा था कि तीस्ता के साथ जिस तरह का बर्ताव हुआ है, वह कानून की तमाम हदों को तोड़ कर किया गया है। चीफ जस्टिस ने तो यहां तक कह दिया कि क्या गुजरात हाई कोर्ट में यही प्रथा है? उनकी बेंच इस बात से नाराज़ नज़र आई कि एक महिला की ज़मानत के मामले में छह हफ्ते बाद की तारीख क्यों दी गई? सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से पूछा है कि ऐसे मामलों की जानकारी दें, जब महिला की जमानत के मामले को 6 हफ्ते बाद टाल दिया गया हो। अब बताना पड़ेगा कि क्या तीस्ता को लंबे समय तक जेल में रखने के लिए यह सब किया गया है? सुप्रीम कोर्ट के सवाल और कपिल सिब्बल की दलील के सामने आज सोलिसिटस जनरल तुषार मेहता सिर्फ एक ही बिन्दु के सहारे टिके नज़र आए कि इसकी सुनवाई हाईकोर्ट में हो रही है तो वहीं होनी चाहिए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में सुनवाई की तारीख को लेकर ही गंभीर सवाल उठा दिए। अब इस मामले की सुनवाई शुक्रवार यानी दो सितंबर को दोपहर दो बजे होगी। 

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से हलफनामा मांगा था, गुजरात सरकार तीस्ता की ज़मानत का विरोध कर रही थी, इस हलफनामे में गुजरात सरकार ने कई तरह के आरोप लगाए मगर सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस के सवाल भारी पड़ गए। गुजरात सरकार ने  आरोप लगाया कि तीस्ता ने वरिष्ठ राजनेता के इशारे पर पैसे लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ साज़िश रची। गुजरात सरकार ने कहा कि FIR सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आधारित नहीं है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि FIR केवल कोर्ट के आदेशों पर ही लगती है। राज्य सरकार ने कहा कि कई सारे सबूत मिले हैं कि तीस्ता ने सबूतों को गढ़ने की कोशिश की है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे ही लेकर सवाल कर दिया कि सबूत क्या हैं? तीस्ता ने अन्य आरोपी व्यक्तियों के साथ साजिश को अंजाम देकर राजनीतिक, वित्तीय और अन्य भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए आपराधिक कृत्य किए थे। इस हलफनामे के बाद भी सुप्रीम कोर्ट गुजरात सरकार के जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ। यह मामला गुजरात हाईकोर्ट में लंबित है जहां 19 सितंबर को सुनवाई होनी है। 

जस्टिस यूयू ललित ने कहा कि मैं सोराबुद्दीन मुठभेड़ केस में कुछ आरोपियों के लिए बतौर वकील पेश हुआ था,अगर आपको कोई दिक्कत नहीं है तो सुनवाई करेंगे. तीस्ता के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, जिसके बाद कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई शुरू की।चीफ जस्टिस यू यू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस सुधांशु धुलिया की बेंच के समक्ष सुनवाई चल रही थी। तीस्ता की ज़मानत का विरोध करने सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता कर रहे थे और ज़मानत की पैरवी मशहूर वकील कपिल सिब्बल कर रहे थे। कपिल सिब्बल ने कहा कि

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि तीस्ता की जमानत याचिका हाईकोर्ट के सामने लंबित है। इसलिए हमारी आपत्ति तो इस याचिका के सुनवाई योग्य होने पर ही है। तुषार मेहता ने कहा कि तीस्ता को कोई विशेष राहत देने की आवश्यकता नहीं है. इन सभी को सामान्य अभियुक्त की तरह हाईकोर्ट जाना चाहिए.सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील लंबित है. तो वो सुप्रीम कोर्ट कैसे आ सकती है.सुप्रीम कोर्ट के ही कई फैसले हैं कि हाईकोर्ट के फैसले का इंतज़ार करना चाहिए. लेकिन सर्वोच्च अदालत की तरफ से सवाल अलग तरह की खामियों को लेकर होने लगे थे। कोर्ट ने पूछा कि एक महिला की ज़मानत के मामले में क्या छह हफ्ते बाद की तारीख दी जाती है? ऐसा कब होता है? क्या गुजरात हाईकोर्ट की यही प्रथा है? कोर्ट के सवालों से साफ हो रहा था कि तीस्ता सीतलवाड़ की गिरफ्तारी किस मकसद से की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि दो महीने से तीस्ता गिरफ्तार हैं, पुलिस को इस दौरान क्या सामग्री मिली है, इस गिरफ्तारी से पुलिस को क्या फायदा हुआ है? FIR केवल कोर्ट के आदेशों पर ही लगती है।तीस्ता पर कोई UAPA जैसे आरोप नहीं जो जमानत ना दी जाए। ये साधारण IPC धाराएं हैं।ये महिला अनुकूल फैसले की हकदार है

ये सवाल बता रहे हैं कि तीस्ता को जेल में रखने के लिए जेल में रखा गया। मामूली प्रक्रिया को लेकर किए गए सवालों के जवाब गुजरात सरकार के पास नहीं थे। 26 जून को तीस्ता सीतलवाड़ को गिरफ्तार किया गया था। उनके साथ गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक आर बी श्रीकुमार भी गिरफ्तार हुए थे। चीफ जस्टिस ने गुजरात सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि हिरासत में पहले ही पूछताछ हो चुकी है। ये तो आप भी मानते हैं। जैसे जैसे बहस बढ़ रही थी, चीफ जस्टिस की बेंच के सवाल सख्त होते जा रहे थे। तुषार मेहता केवल इसी बात पर विरोध कर रहे थे कि आप इसे गुजरात हाईकोर्ट को सुनने के लिए ही कहें, इसे विशेष मामला न बनाएं। चीफ जस्टिस यू यू ललित ने हाईकोर्ट द्वारा 6 हफ्ते का वक्त देने पर भी सवाल उठाए और कहा कि तीन अगस्त को नोटिस जारी कर 19 सितंबर को केस की सुनवाई तय की. क्या बेल मामले में 6 हफ्ते का समय देना चाहिए. कोर्ट ने फिर कहा कि आपकी शिकायत में सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अंश पर है. 24 जून को फैसला आया, आपने 25 जून को FIR दर्ज कर ली.आपने इस महिला से पुलिस हिरासत में पूछताछ भी की. ये कोई हत्या या हत्या के प्रयास का मामला नहीं .आरोप सिर्फ जालसाजी के हैं.

चीफ जस्टिस और उनकी बेंच के सवाल से गुजरात सरकार घिरती जा रही थी।चीफ जस्टिस ने पूछा कि बेल के मामले में क्या हाईकोर्ट को छह हफ्ते का समय देना चाहिए? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने ज़मानत को लेकर एक गंभीर टिप्पणी की थी और आदेश दिया था। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एम एम सुंदरेश ने कहा था कि 

हाईकोर्ट में ज़मानत देने की कोई निश्चित प्रक्रिया नहीं है। जबकि कानून के हिसाब से जेल अपवाद है और ज़मानत नियम है। जब तक दोष साबित नहीं हो जाता है, माना जाता है कि आरोपी निर्दोष है।किसी भी लोकतंत्र में यह धारणा नहीं बननी चाहिए कि यह पुलिस राज्य है। भारत की जेलों में विचाराधीन कैदियों की बाढ़ आ गई है। इनमें से अधिकांश को गिरफ्तार करने की भी ज़रूरत नहीं है।

इसके बाद भी राजनीतिक गिरफ्तारी का सिलसिला बंद नहीं हो रहा है। आल्ट न्यूज़ के मोहम्मद ज़ुबैर के मामले में आपने देखा। किस तरह से दो दो एस आई टी बना दी गई ताकि जांच के नाम पर जेल में रखा जा सके, सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार की बनाई एस आई टी रद्द कर दी।खुद सुप्रीम अदालत कह रही है कि बिना ज़रूरत के गिरफ्तारी हो रही है और ज़मानत के केस की सुनवाई में हफ्तों महीनों लग जाते हैं इसके कारण लोग बिना सज़ा के ही लंबे समय तक जेल में रह जाते हैं।आज चीफ जस्टिस यू यू ललित के सवाल ने फिर से साबित कर दिया कि ज़मानत देने की व्यवस्था मनमानेपन का शिकार हो चुकी है, इसके लिए व्यवस्था और कानून की सख्त ज़रूरत है।

चीफ जस्टिस यू यू ललित ने कहा कि हमें यह बात चिंतित कर रही है कि ये एक महिला का मामला है और हाईकोर्ट ने 6 हफ्ते बाद केस लगाया है, क्या हम आंखें बंद कर लें? अगर हम अंतरिम जमानत दे दें तो। ज़मानत का विरोध कर रहे सोलिसिटर जनरल के पास यही दलील बची थी कि आप हाईकोर्ट को पहले सुनने को कह दें, इसे स्पेशल केस ना बनाएं। शुक्रवार को दोपहर दो बजे सुनवाई होनी है। अब चलते हैं उस खबर पर जिसे लेकर कहीं कोई हलचल नहीं है। 

मध्यप्रदेश के अमरकंटक में इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी है,यहां 4500 छात्र हर साल प्रवेश पाते हैं।आम तौर पर जुलाई से लेकर अगस्त के बीच में नामांकन की प्रक्रिया पूरी हो जाती थी। अगस्त के आखिर से पढ़ाई शुरू हो जाती थी लेकिन इस बार केंद्रीय विश्व विद्यालयों में प्रवेश राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा CUET के ज़रिए हो रहा है, 30 अगस्त को प्रवेश परीक्षा का आखिरी चरण पूरा हो हुआ है,पहली परीक्षा 15 जुलाई को हुई थी। डेढ़ महीने लग गए केवल परीक्षा होने में। अभी नतीजे आने  हैं, नामांकन की प्रक्रिया भी पूरी होनी है। एक राष्ट्र एक परीक्षा टाइप के नारों की दुर्गति पर समाज चुप है। दिल्ली विश्व विद्यालय में तो 15 जुलाई के बाद से पढ़ाई शुरू हो जाया करती थी, ऐसा लग रहा है कि सितंबर भी बिना पढ़ाई के बीत जाने वाला है। कोविड के कारण ऐसे ही पहले के सत्र देरी से चल रहे हैं और उसके बीच में प्रवेश की नई व्यवस्था लाद दी गई है। जिसके कारण तीन महीने का नुकसान हो गया है।

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में भी यही हाल है। जब यह यूनिवर्सिटी अंतर्राज्यीय परीक्षा कराती थी, तब करीब करीब 5 लाख छात्र फार्म भरते थे। इसके बाद भी यह यूनिवर्सिटी अपने स्तर पर जुलाई तक नामांकन की प्रक्रिया पूरी कर लेती थी और पढ़ाई भी शुरू हो जाती थी। छात्रों को छात्रावास वगैरह सब मिल जाता था। लेकिन इस साल कुछ भी नहीं हुआ है। हर साल बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में 16000 छात्र दाखिला लेते हैं। इस साल दाखिला कब होगा, पढ़ाई कब शुरू होगी, किसी को पता नहीं। COVID के बाद से लगभग सभी सत्र अनियमित चल रह है। 

ऐसा लगता है कि देश की प्राथमिकताएं कितनी बदल गई हैं। शिक्षा व्यवस्था लापता हो गई है।15 लाख छात्रों ने इसके लिए फार्म भरे थे, इतनी बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई शुरू होने का इंतज़ार कर रहे हैं, क्या उन परिवारों ने दिन-रात इसकी चर्चा नहीं होती होगी कि ऐसा क्यों हुआ, इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? प्रोपेगैंडा ने जनता के विवेक को नष्ट कर दिया है। इसकी जवाबदेही किसकी है कि तीन महीने में परीक्षा पूरी नहीं हुई? डेढ़ महीने लग गए केवल परीक्षा पूरी होने में। अभी नतीजे नहीं आए हैं, काउंसलिंग नहीं हुई है, नामांकन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। जब पूरी तैयारी नहीं थी तब इस साल से यह व्यवस्था क्यों थोपी गई? और तो और अखबारों को पलिटए तो नई शिक्षा नीति पर गृहमंत्री अमित शाह के बयान ही ज़्यादा मिलने लगे हैं।छपने लगे हैं। क्या इसकी जवाबदेही भी गृहमंत्री की होगी कि तीन महीने में भी इस साल प्रवेश नहीं हुआ?

इस साल मार्च से अगस्त के बीच कई अखबारों में नई शिक्षा नीति को लेकर गृहमंत्री अमित शाह के कई बयान मिलेंगे। जिनसे इन अखबारों ने हेडलाइन सजाई है। टाइम्स आफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, डेक्कन हेरल्ड,हिन्दुस्तान टाइम्स, बिज़नेस स्टैंडर्ड, फाइनेंशियल एक्सप्रेस, अमर उजाला, न्यूज़ऑनएयर। किसी में अमित शाह कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने नई शिक्षा नीति में गांधी के विचारों को शामिल किया है। कहीं कहते हैं कि मोदी सरकार कर्नाटक के लिंगायत मठ की शिक्षा को लागू कर रही है। क्षेत्रीय भाषाओं से शिक्षा में क्रांति आ जाएगी। विश्वविद्यालयों को विचारधारा की रणभूमि नहीं बनना चाहिए। नई शिक्षा नीति भारत को फिर से विश्व गुरु बनाएगी। नई शिक्षा नीति से मोदी ने रखी महान भारत की नींव। 

गृहमंत्री अपने मंत्रालय की रिपोर्ट पर नहीं बोलते कि दो साल में 80,000 दिहाड़ी मज़दूरों ने आत्महत्या की है, उसके क्या कारण रहे होंगे। मगर शिक्षा नीति पर उनके बयान दमदार तरीके से छप रहे हैं। क्या गृहमंत्री के पास इतना वक्त है कि उन्हें पता नहीं होता है कि शिक्षा नीति पर क्यों बुलाया है और वे भोपाल पहुंच भी जाते हैं? दिल्ली से चलने से पहले पता तो होगा कि नई शिक्षा नीति पर बोलने के लिए बुलाया जा रहा है। इसके ठीक 24 दिन पहले नई शिक्षा नीति के दो साल होने के मौके पर उन्होंने दिल्ली के अंबेडकर भवन में लंबा भाषण दिया था और वह नई शिक्षा नीति पर ही था। भोपाल में अमित शाह ने कहा कि भारतीय शिक्षा पद्धति में रिसर्च पर ज़ोर होता था। क्या अमरीका, यूरोप की यूनिवर्सिटी में रिसर्च नाम की कोई बुलबुल चिड़िया भी नहीं होती है? दुनिया की बाकी यूनिवर्सिटी रिसर्च नहीं कर रही हैं तो क्या कर रही हैं।

नई शिक्षा नीति के नाम पर अमित शाह भारतीय भाषाओं में शिक्षा पर ज़ोर देते हैं, नागरिकों के कर्तव्य की बात करने लगते हैं और शिक्षा और राष्ट्रवाद के संबंधों पर बात कर अपनी बात खत्म कर देते हैं।29 जुलाई को दिल्ली के अंबेडकर भवन में नई शिक्षा नीति के दो साल पूरे होने पर एक कार्यक्रम हुआ था। मई में अरुणालच प्रदेश में भी एक स्कूल के स्वर्ण जयंती समारोह में उन्होंने नई शिक्षा नीति पर भाषण दिया था। उनके भाषणों में नई शिक्षा नीति के नाम पर कई अंश ऐसे भी मिलते हैं जो अक्सर कह दिए जाते हैं, जिन्हें हम और आप रटी रटाई बात कहते हैं। वैसे अमित शाह रटे रटाए ज्ञान के सख्त खिलाफ हैं।

नई शिक्षा नीति के भाषण को गौर से सुनिए। उसमें नीति कम होती है, उद्देश्य ज़्यादा होता है। उन उद्देश्यों को बड़ा बताने के लिए चरित्र, चुनौती, चिंतन, निर्णय क्षमता से भाषण का पन्ना भर दिया जाता है। नई शिक्षा नीति का यह दूसरा साल है। हालत यह है कि किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय में नए सत्र की पढ़ाई शुरू नहीं हो सकी है।

यही हाल मेडिकल PG की प्रवेश परीक्षा की भी है।इसकी पिछली परीक्षा की काउंसलिंग भी देर तक चली थी। छात्रों ने कहा कि नई परीक्षा टाल दी जाए मगर सरकार ने नहीं माना। परीक्षा 21 मई को ही हुई। अब नई जानकारी यह है कि नतीजे आने के बाद इसकी काउंसलिंग 1 सितंबर से शुरू होनी थी, जो अब टाल दी गई है। 19 सितंबर से होगी। इतने दिनों के नुकसान की जवाबदेही किसकी है? क्या PG मेडिकल की पढ़ाई इस तरह से चल रही है। शिक्षा जैसे गंभीर मामले में  जवाबदेही तय नहीं होती है और समाज है कि थाली बजाने के मौके तलाशने में लगा है। 

मध्य प्रदेश में यह बच्चा मां की गोद में मर गया क्योंकि अस्पताल में डाक्टर नहीं था। इस बच्चे का नाम ऋषि था।कई घंटों तक डॉक्टर का ही इंतजार होता रहा।हम सब जानते हैं कि अस्पतालों में डाक्टरों की तैनाती का सच क्या है लेकिन इसकी जवाबदेही मंत्री नहीं लेंगे, किसी अधिकारी को निलंबित किया जाएगा। भारत के अखबारों में पुर्तगाल के स्वास्थ्य मंत्री की खबरें छप रही हैं कि एक गर्भवती भारतीय महिला को इलाज नहीं मिला तो उसकी नैतिक ज़िम्मेदारी लेकर पुर्तगाल की स्वास्थ्य मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। हर दिन भारत के राज्यों से इस तरह की तस्वीरें देखने को मिलती हैं, किसी स्वास्थ्य मंत्री को फर्क ही नहीं पड़ता है। 

कोई पहली बार नहीं है जब अनुराग द्वारी ने ऐसी रिपोर्ट भेजी है। अगर संसाधन और रिपोर्टर हों और रिपोर्टिंग की इजाज़त हो तो सैंकड़ों की संख्या में ऐसी खबरें हर राज्य से आने लगेंगी। मगर गोदी मीडिया के दौर में रिपोर्टिंग बंद है।अगर वीडियो वायरल होता हुआ न पहुंचे तो ऐसी खबरें दिखनी ही बंद हो जाएंगी बल्कि जल्दी ही बंद होने वाली हैं। ज़्यादा मुद्दा बनेगा तो सरकार दस बीस एंबुलेंस लाकर उदघाटन कर देगी और हेडलाइन छप जाएगी। सबको पता है कि अस्पताल पहले डाक्टर और इलाज की सुविधाओं से बनता है।एंबुलेंस और बीमा अस्पताल नहीं हैं लेकिन लोग हैं कि थाली बजाने के स्तर से ऊपर ही नहीं उठना चाहते तो आप क्या करेंगे।  
उत्तराखंड में सरकारी भर्तियों में घोटाले को लेकर हर दिन नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं। राज्य सरकार ने जांच के लिए विशेष कार्य दल का गठन किया है लेकिन जिस स्तर का घोटाला है, लगता है कि करोड़ों रुपये का लेन-देन हुआ होगी। बंगाल में इसी तरह के घोटाले की जांच को लेकर ED सक्रिय है। उत्तराखंड में सरकारी भर्ती घोटाले को लेकर मांग हो रही है कि CBI ED से जांच कराई जाए। इस घोटाले से कोई भी विभाग नही बचा है। एक विभाग की भर्तियों में घोटाले की बात सामने आती है तो अगले ही दिन दूसरे विभाग की भर्तियों के घोटालों के राज़ खुलने लग जाते हैं।

इन घोटालों में किसका हाथ नहीं दिख रहा,चुने हुए नेताओं, मंत्रियों अफ़सरोंऔर उनके आसपास चौकड़ी लगाकर बैठे दलालों के नाम सामने आ रहे हैं। उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग UKSSSC में ऐसी ही भर्तियों के घोटाले को लेकर उत्तराखंड हाइकोर्ट में एक याचिका भी दायर कर दी गई है।

राज्य में आए दिन तमाम युवा संगठन इस घोटाले को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।15 जून को राज्य विधानसभा में कांग्रेस विधायक भुवन कापड़ी ने भी ये मु्द्दा उठाया… भुवन काप़ड़ी ने कहा कि कई साल से वन विभाग, शिक्षा विभाग, गृह विभाग, सचिवालय, ग्राम विकास पंचायत अधिकारी जैसी भर्तियो में घोटाले चल रहे हैं। इन भर्तियो के लिए होने वाली परीक्षा के प्रश्न पत्रों के लीक होने का ज़िक्र किया,सबूत भी दिखाए उसके बाद से राज्य के अखबारों में इस घोटाले को लेकर अनेक खबरें छप चुकी हैं। सोशल मीडिया में भी यह मुद्दा छाया हुआ है। राज्य के बेरोज़गार युवा संगठन इस मामले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिले और उन्हें पेपर लीक होने के सबूत दिखाए और नतीजों में गड़बड़ियों को सबूतों के साथ दिखाया तब जाकर उन्होंने एसटीएफ़ से जांच के आदेश दे दिए। शुरुआती जांच में पता चला कि जो उम्मीदवार इंटरमीडियेट की परीक्षा में सिर्फ़ 33 अंक लेकर आया वही चालीस दिन बाद हुई ग्रेजुएट स्तर की परीक्षा में सर्वाधिक 92 अंक ले आया.. इससे शक़ गहरा हुआ. उसका पिछला रिकॉर्ड खंगाला गया तो शक़ पुख़्ता होता चला गया. यही नहीं आयोग की जनरल मेरिट जो पिछले कई सालों से 80 के आसपास आती रही है उसमें इस बार 100 उम्मीदवार 80 से 90 के बीच अंक ले आए. इस मामले की जांच में बीजेपी की एक ज़िला पंचायत के सदस्य हाकम सिंह को गिरफ़्तार किया गया तो  मामले की कई कड़ियां खुलने लगी हैं.

हाकम सिंह के ज़रिए एक ऐसे नेटवर्क का पता चला जिसके सहारे नेता, अफसर और दलाल मिलकर सरकारी भर्तियों में घोटाला कर रहे थे। इसी हाकम सिंह का नाम 2019 में फॉरेस्ट गार्ड के इम्तिहान में ब्लूटूथ से नकल के मामले में भी सामने आया था. ताज़ा मामले में अब तक 30 लोग गिरफ़्तार हो चुके है। इनमें  नौ सरकारी कर्मचारी है।इनमें से कुछ कर्मचारियों ने जांच में माना कि वो खुद भी पिछले कुछ वर्षों में ऐसे ही परीक्षा घोटालों का फ़ायदा लेकर नौकरी पर लगे है और फिर इस गिरोह से जुड़ गए हैं… ऐसे में UKSSSC की छवि का आलम ये है कि लोगों ने अब इस संस्था को उत्तराखंड सगे संबंधी सेलेक्शन कमीशन कहना शुरू कर दिया है.
 उत्तराखंड में बीजेपी का यह दूसरा कार्यकाल है, बीजेपी के कार्यकाल में भी यह घोटाला चलता रहा है, लेकिन यह भी सामने आया कि कांग्रेस की सरकार के दौर में भी इसी तरह से चलता रहा है। सवाल है कि जहां तक इस घोटाले के तार जाएं, वहां तक पहुंचना चाहिए और जिन लोगों ने रिश्वत देकर नौकरी ली है, उनकी नौकरी जानी चाहिए।

2016 में उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की भर्ती से घोटाला खुलकर सामने आता है.. तब ग्राम विकास अधिकारी, ग्राम पंचायत अधिकारी की भर्ती की जो परीक्षा कराई गई, उसमें दो दो बार जांच हुई, गड़बड़ी पाई गई लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। यह तो और भी गंभीर मसला है कि कांग्रेस सरकार के दौर में घोटाला हुआ तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई, क्या इसलिए कि इस रास्ते बीजेपी राज मे भी घोटाले को जारी रखना था? बीजेपी सरकार ने कांग्रेस के दौर के उस घोटाले को सार्वजनिक क्यों नहीं किया? हालत ये है कि अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के पिछले अध्यक्ष एसके राजू ने इस्तीफ़ा देते हुए कहा कि पेपर लीक होना तो एक सामान्य प्रक्रिया है. 

अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के ताज़ा भर्ती घोटाले की अब सीबीआई से जांच की मांग ज़ोर पकड़ने लगी है क्योंकि मामले के तार उत्तराखंड से लेकर उत्तरप्रदेश तक फैले हुए हैं. ऐसा ही आरोप 2020 में बीजेपी की सरकार में सहकारिता विभाग पर भी लगा. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गणेश गोदियाल ने आरोप लगाया कि सहकारिता मंत्री धन सिंह रावत ने UKSSSC के बजाय सैकड़ों पदों पर भर्ती का काम एक निजी एजेंसी को दे दिया. उनके मुताबिक मई, जून में भर्ती इम्तिहान हुआ, उत्तराखड से दूर नोएडा में और वो भी ऐसे समय जब कोविड का गंभीर दौर था. आने जाने पर तमाम तरह की पाबंदियां लगी हुई थीं. उन भर्तियों पर UKSSSC के तत्कालीन अध्यक्ष एस राजू ने भी संदेह जताया था और कहा था कि मेरे कहने के बावजूद एफ़आईआर दायर नहीं की गई. वैसे एस राजू के दौर में हुई कई परीक्षाएं संदेह के घेरे में रही हैं. अभी आयोग के घोटाले ही सामने आ रहे थे. कि विधानसभा के भीतर से भी भर्तियों के घोटाले बाहर आने लगे।

कांग्रेस से लेकर बीजेपी की सरकारों के स्पीकर ने कथित नियमों के नाम पर इतनी भर्तियां कर डाली हैं कि हिसाब नहीं। विधायकों की संख्या 70 है मगर अब यहां काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या 500 हो गई है। जबकि देश की सबसे बड़ी उत्तरप्रदेश विधानसभा जहां 403 विधायक हैं वहां इससे कम कर्मचारी हैं… पड़ोस की 68 विधायकों वाली हिमाचल विधानसभा में तो बहुत ही कम… पिछली विधानसभा के स्पीकर प्रेमचंद अग्रवाल का नाम इस घोटाले में आ रहा है। इस समय अग्रवाल वित्त मंत्री हैं। आरोप हैं कि बिना किसी स्थापित प्रक्रिया के उन्होंने 74 भर्तियां कर डाली हैं। उस समय मुख्यमंत्री  त्रिवेंद्र सिंह रावत थे।रावत का कहना है कि जब उनके पास इसकी फाइल दस्तखत के लिएआई तो उन्होंने नोट लिखा कि भर्तियां योग्यता के मुताबिक हों और लोकसेवा आयोग और अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के जरिए कराई जाएं।

इसके बाद भी ऐसा नहीं किया गया। तब तो वित्त विभाग ने भी यह कह कर मना कर दिया कि नई भर्तियों के लिए बजट नहीं है। इस बीच त्रिवेंद्र रावत की कुर्सी गई और उनकी जगह तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री बन गए, फिर कुछ ही दिन बाद पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री बन गए। राज्य में मुख्यमंत्री बदलते रहे मगर स्पीकर पिछले दरवाज़े से भर्ती को अंजाम देने में लगे रहे। उन्होंने एक नया रास्ता निकाला कि एक प्राइवेट एजेंसी के ज़रिए इन पदों के लिए आवेदन मंगाए जाएं और स्वीकार किया जाए। यही हुआ।54 नियुक्तियों से शुरू हुई ये सख्या अंत में 74 पर जाकर ख़त्म हुईआरोप है कि प्राइवेट एजेंसी ने परीक्षा भी नहीं कराई। चुन चुन कर मुख्यमंत्री के निजी स्टाफ़ में काम करने वाले लोगों के परिजनों से लेकर तमाम मंत्रियों, बीजेपी और आर एस एस के पदाधकारियों और बड़े अफ़सरों के क़रीबियों को नियुक्ति दे दी गई। पत्रकारों के रिश्तेदारों के भी नाम बताए जा रहे हैं। सोशल मीडिया में कई सूची घूम रही है। ये लोग बिना वेतन के काम करते रहे, इस बीच बीजेपी की दोबारा सरकार बन गई और धामी ही मुख्यमंत्री बने। इस बार प्रेमचंद अग्रवाल वित्त मंत्री बन गए। मंत्री बनने के अगले ही दिन ,वित्त विभाग की मूल आपत्तियों को खारिज कर इन पदों पर भर्तियों को मंज़ूरी दे दी. यानी स्पीकर रहते बैकडोर से भर्तियां करवाईं और वित्त मंत्री बनते ही उन पर मुहर लगा दी.

प्रेमचंद अग्रवाल अब अपनी की गई नियुक्तियों को सही ठहराने में लगे हैं. जबकि उनकी ही पार्टी के कई नेता इस मामले में जांच की मांग कर रहे हैं. प्रेमचंद अग्रवाल ने जिस रास्ते से कथित रुप से भर्ती घोटाला किया,उसी रास्ते से हरीश रावत की सरकार के वक्त विधानसभा स्पीकर रहे गोविंद सिंह कुंजवाल पर भी भर्ती करने के आरोप है। जबकि प्रेमचंद अग्रवाल को पिछली भर्तियों को लेकर कार्रवाई करनी चाहिए थी। कांग्रेस के समय के स्पीकर ने तो क्लास टू से लेकर क्लर्क तक की 154 भर्तियां बैकडोर से कर दी थी। यह इतनी छोटी संख्या तो नहीं है कि प्रेम चंद अग्रवाल की नज़र नहीं पड़ी होगी। 
कांग्रेस के स्पीकर ने तो बेटे और बहू समेत कुंजवाल कुल के आठ सदस्यों को नौकरी दे दी।बेटे और बहू को क्लास टू का अफ़सर बना दिया। कुंजवाल ने पहले कहा कि वो इस योग्य थे कि उन्हें क्लास टू अफ़सर बनाया जाए और उन्होंने अपने उसी विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया जिसका इस्तमाल उनके पूर्ववर्ती स्पीकर करते रहे. स्थानीय अख़बारों के मुताबिक अब वो कह रहे हैं कि इस मामले में वो माफ़ी मांगने को तैयार हैं और इस मामले में अपने बच्चों को नौकरी देना नैतिक तौर पर ग़लत फ़ैसला था

हरियाणा के निर्दलीय विधायक रणधीर गोलन के बेटे अमित से बीजेपी के एक नेता ने कथित तौर पर 49 लाख रुपए ठग लिए। संब इंस्पेक्टर की नौकरी दिलाने के नाम पर यह ठगी हुई है। विधायक के बेटे पास रिश्वत में देने के लिए 49 लाख रुपये कहां से आए, यह भी एक सवाल है

इतने साल से नौकरी का मुद्दा राजनीति के केंद्र में हैं फिर भी इसकी पारदर्शी व्यवस्था नहीं बन पाई। रोज़गार के क्षेत्र में युवाओं की हिस्सेदारी घटती जा रही है। ऐसा लगता है कि मान लिया गया है कि हमारे युवा व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के फार्वर्ड मैसेज के आगे सोचना बंद कर चुके हैं। उन्हें जैसा कहा जाएगा, वैसा ही करेंगे लेकिन आप वैसा कभी मत कीजिएगा, ब्रेक ले लीजिए।

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