भारत की वंचित जातिः बेतिया के डोम-मेहतर ज़िंदगी गुज़ारने के लिए बांस की बिनाई और मानव मल की सफ़ाई करते हैं

बिहार के बेतिया में दलितों का जीवन जातिवादी नीच काम और भेदभाव के बीच फँसा हुआ है जो सरकार द्वारा उनपर थोपा गया है।

डब्लू मलिक पैसा कमाने के लिए शहर जाते हैं और वहाँ सफ़ाई कर्मचारी के रूप में काम करते हैं। बांस से बनी अपनी झोपड़ी के अंदरूनी हिस्से को दिखाते हुए डब्लू मलिक कहते हैं, “हमारे दादा 50 साल पहले परसौना गांव से यहां आए थें। यह मेरे नाना की संपत्ति है। यहाँ मैं एक ईंट भी नहीं जोड़ सकता हुँ; मैं ग़रीब हूँ। यहाँ तक कि ये बांस की झोपड़ी बनाने में भी 20,000 रुपये ख़र्च होते हैं।”

वे कहते हैं उनके पिता मानसिक रूप से बीमार हैं और उनके पास उनके इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। आगे कहते हैं, “जब भी हम सरकारी अस्पताल में जाते हैं, वे ड्रिप लगा देते हैं … जैसे ही यह ख़त्म होता है, हमें जाने के लिए कहा जाता है।” वे कहते हैं, “मैं अनपढ़ हुँ, लेकिन बेवकूफ़ नहीं। ड्रिप से मानसिक बीमारी का इलाज कैसे किया जा सकता है?”

छह लोगों के परिवार को चलाने के लिए सफ़ाई का काम ही डब्लू के लिए आय का एकमात्र स्रोत है। डब्लू की तरह बेतिया की डोम टोली में डोम और मेहतर के 300 से अधिक परिवार हैं जिनके लिए पारंपरिक बांस के काम और सफ़ाई के काम के अलावा कुछ भी नहीं है।

विधवा कांति देवी कहती हैं, “बांस के काम करिन लें। उहे से लइका के खिअइने। अब इहे मडई टटी सहारा बा। वे कहती हैं, “एक बांस की कीमत 250 रुपये है। मैं एक बार में एक बांस खरीदती हुँ; मैं इससे अधिक ख़रीद नहीं सकती हुँ।”

विधवा कांति देवी जीवन यापन के लिए बांस की बिनाई करती हैं 35 वर्ष की कांति बांस की बिनाई से रोजाना ज्यादा से ज्यादा 200 रुपये कमाती हैं। वह बिचौलिए से उत्पाद बेचती हैं जो फिर उसे शहर के बाज़ार में बेचता है। उनके चार बच्चे हैं- दो लड़कियाँ और दो लड़के। उन्होंने कुछ साल पहले अपनी बड़ी बेटी की शादी 18 साल से कम उम्र में की थी। वे कहती हैं, “एक अकेला अभिभावक चार बच्चों की जरूरतों को पूरा कैसे कर सकता है?” उनकी छोटी बेटी रूति कुमारी पास के एक सरकारी स्कूल में 5वीं कक्षा में पढ़ती है। उनके बेटे पवन और प्रेम पांचवीं और तीसरी कक्षा में पढ़ते हैं।

कृषि विभाग के कार्यालय में कांति एक अस्थायी सफ़ाई कर्मी थीं। वे कहती हैं, “मैंने 15 साल तक काम किया लेकिन मुझे स्थायी कर्मचारी नहीं बनाया गया। वे महीनों तक मेरा भुगतान नहीं करते थे।” आगे कहती हैं,” मैंने विभाग में कई साहब को कई आवेदन दिए लेकिन किसी ने मेरी आवेदन पर ध्यान नहीं दिया। एक दिन मैंने अपना वेतन बढ़ाने के लिए कलक्टर को आवेदन लिखने का साहस जुटाया।” जैसे ही उन्होंने ज़िलाधिकारी को आवेदन लिखा उनका बक़ाया [कुछ महीनों का 700 रुपये प्रति माह के हिसाब से वेतन दिया गया] का भुगतान किया गया लेकिन शिकायत करने के लिए उनको काम से हटा दिया गया[विभाग के बाहर इस मुद्दे को उजागर करने के चलते]।

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कांति ने अपना वेतन बढ़ाने के लिए कई बार अधिकारियों को आवेदन दिया। कांति की पड़ोसी शांति देवी की आर्थिक स्थिति भी बेहतर नहीं है। शांति उच्च जाति के परिवारों के यहाँ सफ़ाई का काम करती हैं। शांति बताती हैं, “जहाँ मैं काम करती हुँ वहाँ मैं उन परिवारों से छिपाती हूँ कि मैं एक अछूत हूँ।” वे कहती हैं, “हम डोमों को हिंदुओं [उच्च जाति] के अंतिम संस्कार में भोज में खाने के लिए बुलाया जाता है, वे कहते हैं कि हम मोक्ष के द्वार हैं। लेकिन भोज के बाद हम फिर से अछूत हो जाते हैं।”

अपने पोते को अपनी गोद में लिए हुए शांति बोलती हैं, ”एकनी के का होई, कइसे पढ़ियें सन ई गरीबी में।” उनके शादीशुदा बेटे भी पारंपरिक बांस की बिनाई का काम करते हैं।

अनुराधा देवी जो अपने घर पर बेना (हाथ के पंखे) बिन रही हैं हमें बताती हैं कि एक बांस से 25 बेना बनाई जा सकती हैं। वे कहती हैं, “प्रत्येक बेना की क़ीमत 10 और 20 रुपये की बीच होती है। ये मांग के हिसाब से होता है।”आगे बताती हैं, “शहर में कई लोगों के पास बिजली पंखे के लिए बिजली का बैकअप होता है, इसलिए हाथ के पंखे की मांग कम हो गई है।”

डोम टोली की दो गलियाँ एक गंदे नाले द्वारा अलग हो जाती हैं। उष्मी देवी जिनकी झोपड़ी का दरवाजा इस नाले के सामने है वे कहती हैं, ‘जब बारिश होती है तो ये भर कर उपर से बहने लगती है। शौचालय की सफ़ाई के लिए म्युनिसिपलिटी से कोई नहीं आता है; यह हमारे लिए छोड़ दिया जाता है क्योंकि यह हमारी जाति का काम है।” इस लेन में केवल एक सार्वजनिक शौचालय है जहाँ 50 से अधिक डोम परिवार हैं। डोम टोली में नाला एक अहम मुद्दा है। लोगों का कहना है कि म्युनिसिपलिटी से कोई भी इसकी सफ़ाई करने नहीं आता है।

उष्मी की विवाहित बेटी राजवंती देवी उनके साथ रहती हैं। राजवंती कहती हैं, “मेरे पति का परिवार मेरा सम्मान नहीं करता है।” वे कुछ साल पहले पंजाब के खेतों में मज़दूर की तरह काम कर रहे थे। मेरे बच्चों के जन्म के बाद उन्हें अकेले संभालना काफ़ी मुश्किल था इसलिए मैं वापस आ गई।”

28 वर्षीय सुजीत मलिक बांस की गठरी खोल रहे हैं जिसे उन्होंने 1,800 रुपये में ख़रीदा था। वैसे एक हज़ार रुपये फ़ायदे की उम्मीद करते हैं। “अभी रोज़ का नाली- मोरी का काम है, कल से इसमें हाथ लगायेंगे”। सुजीत 350 रुपये कमाते हैं जिसके बारे में वे कहते हैं कि ये सबसे ज़्यादा है। वे कहते हैं कि कोई भी बांस की बिनाई के कारोबार से इतना कमा सकता है। वह अपने उत्पादों को बेचने के लिए छपवा जैसे आस-पास के ब्लॉक में जाते हैं।

60 वर्षीय रामसोमारी मलिक बांस चीर रही हैं। वे कहती हैं, “हमें मेहतर कहा जाता है। हम पीढ़ियों से मल की सफ़ाई कर रहे हैं और बांस की बिनाई कर रहे हैं।” वे आगे कहती हैं घर स्थिति बेहतर नहीं है, अब भी इस टोली में कुछ ही पक्के के मकान हैं।वे कहती हैं, ” यह दशकों पहले इंदिरा आवास योजना के तहत बनाया गया था।”

रामसोमारी के पति को लकवा मार गया है। उनकी तीन बेटियाँ हैं; उनमें से दो बिनाई में उनकी मदद कर रही हैं। रामसोमारी की सबसे छोटी बेटी चुलबुल कुमारी सागर पोखरा के एक सरकारी स्कूल में कक्षा 6 में पढ़ती है। वह कहती है, ” जब मैं अपनी माँ को काफ़ी मेहनत करते हुए देखती हूँ तो मैं निराश हो जाती हूँ। चूंकि गर्मी की छुट्टी है इसलिए मैं उनकी मदद कर सकता हूँ।” वह कहती है,” बांस की बिनाई आसान नहीं है, यह काफ़ी मुश्किल है। मैं नहीं चाहती कि ये पारंपरिक कला मेरे परिवार से ग़ायब हो जाए।”

वृद्धा अवस्था पेंशन और आवास योजना काफ़ी मुश्किल, रामसोमारी कहती हैं, मुखिया (ग्राम प्रधान)  वृद्धावस्था पेंशन को मंज़ूरी नहीं देते हैं। मुखिया रवींद्र कुमार रवि उर्फ़ रवि पेंटर उस समय गांव छोड़ कर चले गए जब उन्हें पता चला कि गांव में कोई न्यूज़ रिपोर्टर आया है; उन्होंने फ़ोन कॉल का भी जवाब नहीं दिया।

डोम टोली में कोई भी नहीं जानता है कि इस स्कीम के तहत बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में उन लोगों के लिए पेंशन राशि 400 रुपये कर दी है जिनकी उम्र 60-79 के बीच हैं, जबकि 80 वर्ष से अधिक आयु वालों को पेंशन के रूप में 500 रुपये प्रति माह मिलना है।

रीता देवी कहती हैं, ” राशन के चाउर एतना खराब देवेला कि सुअरो न खाई।” वे बताती हैं कि राशन दो महीने में एक बार मिलता है। डोम टोली में ज़्यादातर परिवार लकड़ी की आग पर खाना बनाते हैं क्योंकि वे हर महीने गैस सिलेंडर का ख़र्च नहीं उठा सकते।

रीता ने 15,000 रुपये पिछले साल अवास योजना फ़ंड जारी करने के लिए मुखिया को दिया लेकिन कोई रसीद नहीं दी गई। उन्होंने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। वे कहती हैं, “मैं आज भी नगर पालिका में गई और उन्होंने हमें आश्वासन दिया कि हमारी राशि एक सप्ताह के भीतर जारी कर दी जाएगी। ये मुश्किल है। अगर हम हर दिन नगरपालिका जाते हैं तो हमारे बांस का काम कौन करेगा?”

रीता कहती हैं, “केतना साल से सुन तानी सनकि इंदिरा अवास पास होई, पास होई, लेकिनकुच्छु नइखे भइल।“ उन्हें डर है कि मीडिया से बात करने पर राशि जारी होने में परेशानी हो सकती है।

डोम टोली में कई अन्य लोगों की तरह शिवकली का जीवन भी बांस की बिनाई से चलता है। शिवकली मलिक के बेटे रमा मलिक की मौत लंबी बीमारी के बाद हो गई।शिवकली कहते हैं, “हम अस्पताल गए और उन्होंने हमें कुछ गोलियाँ दीं; रमा उस वक़्त ठीक हो गया। एक दिन उसकी हालत ख़राब हो गई जो हमसे दूर चला गया।” वे कहते हैं, “इस दीवार को देखिए दो दिन पहले बारिश के झोंका के कारण ईंटें ज़मीन पर गिर गईं। सरकार घर के निर्माण के लिए राशि जारी नहीं कर रही है।”

बेटे की मौत के बाद घर की सभी ज़िम्मेदारी शिवकली और उनके बहु के कंधे पर है अपने घर के सामने बांस की गांठ की सफ़ाई करते हुए बदलोल मलिक कहते हैं, “हम ग़रीब हैं, हम उन्हें आवास योजना के लिए कैसे रिश्वत दे सकते हैं।” आगे कहते हैं, “इहे नून रोटी बा(बांस हमारे लिए आजीविका है।)”

गुड्डू मलिक कहते हैं, “हमारे पास 1 लाख रुपये का पशु [सूअर] था। अनजान बीमारी के चलते कुछ महीने पहले सभी की मौत हो गई। प्रत्येक वयस्क सूअर कम से कम 8,000 रुपये में बेचा जाता है। वे कहते हैं, “पोर्क की क़ीमत अब 200 रुपये प्रति किलो हो गया है। अगर सूअर होते तो हमारी आर्थिक स्थिति बेहतर होती।”

मेहतर और डोम पारंपरिक रूप से यहाँ सूअर पाल रहे हैं। कई पोर्क स्टॉल और सूअर वध केंद्र हैं।

पोर्क का कारोबार करने वाले चंदन मलिक कहते हैं, “बरका लोग के मकान पे मकान बनता अउरी डोम-मेहर-धनगर-मुसहर सन भूखे मर तार सन।” आगे कहते हैं, अंगुलियों के निशान सही नहीं होने के चलते कई लोगों का आधार कार्ड जारी नहीं किया गया था क्योंकि बायोमेट्रिक डिवाइस उन्हें पंजीकृत नहीं कर रहा था। “मैं ईपीआईसी [वोटर आईडी] के लिए काफी बेहतर हूं लेकिन आधार के लिए नहीं।”

चंदन कहते हैं कि हम वोट करने के लिए बिल्कुल ठीक हैं लेकिन राशन के लिए नहीं। चंदन का राशन कार्ड जारी नहीं किया गया है। चंदन को कोई भी राशन प्राप्त हुए तीन साल हो चुके हैं।

पन्ना देवी सड़क पर दउरा (बिहारी की शादियों में इस्तेमाल होने वाली टोकरियाँ) बिन रही हैं। उन्होंने नाले के पानी में कुछ बांस डुबा रखा है। वह कहती हैं, “हमारे पास पीने के लिए साफ़ पानी भी नहीं है, हम बांस के रेशे को पतला करने के लिए पानी की व्यवस्था कैसे करेंगे।”

पन्ना दउरा की बिनाई कर रही हैं जो बिहार के विवाह समारोह में खासतौर से इस्तेमाल किया जाता है

प्रत्येक दउरा का बाज़ार मूल्य 40 रुपये है जिसे तैयार करने के लिए कम से कम एक घंटे की आवश्यकता होती है। पन्ना छह घंटे का कमा करने के बाद 150 रुपये कमा पाती हैं। उन्हें लगता है कि बांस की बिनाई के काम में पैसे कम मिलते हैं, वह भी इस काम को छोड़ने के बारे में सोचती है लेकिन परंपरा के समाप्त होने का डर उन्हें सताता है। “यह हमारा पुश्तैनी काम है, हम इसे कैसे छोड़ सकते हैं?”

डोम टोली के एक छोर पर एक बेहतर मकान है जो किशोर मलिक है, वे हमें बताते हैं कि उनके दादा ने इसे सरकारी नौकरी से मिले वेतन से बनाया था। उनके लिए जाति वर्ग से स्वतंत्र है। अपेक्षाकृत बेहतर होने के बावजूद छुआछूत के अनुभव के बारे में पूछे जाने पर किशोर कहते हैं, “हाँ!, कभी मैं अरेराज मलाही गया था और मुझे मेरी जाति का पता चलने के बाद उच्च जाति के लोगों द्वारा हैंड पंप को छूने से रोक दिया गया था।” आगे कहते हैं, “वे छठ के पवित्र त्योहार के लिए हमसे दउरा और सुपली ख़रीदते हैं, लेकिन हमें अपना हैंड पंप छूने नहीं देते हैं। वे कुछ दूरी से हमारे हाथों में पानी डालते हैं। कुछ गांवों में हमें पानी पीने के लिए दलित बस्ती में जाने के लिए कहा जाता है।” किशोर ने कहा, “अगर हम दलित अमीर बन भी जाते हैं तो भी हमें अपनी जाति के कारण अक्सर नीच व्यवहार किया जाएगा।”

सौजन्य से :न्यूज़ किलिक

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