क्या है नेहरू के पुरखों को मुसलमान बताने का मक़सद और असलियत !

सोशल मीडिया की बढ़ती धमक के साथ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की वल्दियत को लेकर सवाल उठाए जाने लगे। विकीपीडिया में संपादन की खुली सुविधा का लाभ यह हुआ कि उनके पितामहों में किसी गयासुद्दीन गाज़ी का नाम जोड़ दिया गया और फिर उसे ‘प्रमाण ‘बतौर पेश किया जाने लगे। बाद में यह झूठ साबित हुआ और जिस कंप्यूटर से ऐसा किया गया वह पीएम मोदी के दरबार का निकला। सोचने की बात यह है कि ऐसा क्यों किया गया। मोहम्मद अली जिन्ना का परिवार चंद पीढ़ी पहले हिंदू थी, इससे उनकी राजनीति में क्या फ़र्क़ पड़ा, लेकिन हिंदुत्ववादी राजनीति का मूल कर्म ही मुसलमानों के प्रति नफ़रत फैलाना है, सो नेहरू के कर्म और विचार के सामने निहायत बौने नज़र आने वालों ने उनकी वल्दियत बदलकर ‘दरअस्ल मुसलमान’ बताने का अभियान चलाया। संविधान बदलने की उनकी मंशा किसी केंद्रीय मंत्री की ज़बान से भी छलक पड़ती है, नेहरू का वंशवृक्ष बदलना उसी कोशिश का हिस्सा है। कोशिश यह भी है कि इससे उनके पुरखों की अंग्रेज़ों के तलवे चाटने की कहानी छिप जाएगी। पढ़िए नेहरू ख़ानदान के बारे में कुछ जानकारियाँ, अशोक कुमार पाण्डेय की क़लम से-संपादक 

 

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अशोक कुमार पाण्डेय

मोतीलाल नेहरू का परिवार मूलतः कश्मीर घाटी से था। अठारहवीं सदी के आरम्भ में पंडित राज कौल ने अपनी मेधा से मुग़ल बादशाह फरुखसियार का ध्यान आकर्षित किया और वह उन्हें दिल्ली ले आये जहाँ कुछ गाँव जागीर के रूप में मिले, हालाँकि फरुखसियार की हत्या के बाद जागीर का अधिकार घटता गया लेकिन राज कौल का परिवार दिल्ली में ही रहा और उनके पौत्रों मंसाराम कौल और साहेबराम कौल तक ज़मींदारी अधिकार रहे। मंसाराम कौल के पुत्र लक्ष्मीनारायण कौल दिल्ली के मुग़ल दरबार मे ईस्ट इंडिया कंपनी के पहले वक़ील हुए। लक्ष्मीनारायण के पुत्र गंगाधर 1857 में विद्रोह के समय दिल्ली में एक पुलिस अधिकारी थे।

1857 के बलवे में गंगाधर ने दिल्ली छोड़ दी और अपनी पत्नी जेवरानी तथा दो पुत्रों, बंशीधर और नंद लाल व बेटियों पटरानी और महारानी के साथ आगरे आ गए जहाँ 1861 में 34 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के तीन महीने बाद मोतीलाल नेहरू का जन्म हुआ। बंशीधर आगरे की सदर दीवानी अदालत में नौकर हुए और उप न्यायधीश के पद तक पहुँचे। नंदलाल राजस्थान के खेतड़ी रियासत में पहले शिक्षक हुए और वहाँ से राजा फतेह सिंह के दीवान के पद तक पहुँचे। 1870 तक वहाँ रहने के बाद वह राजा की मृत्यु के बाद आगरा लौट कर वक़ालत करने लगे। मोतीलाल का लालन पालन उन्हीं के यहाँ हुआ और अपनी कुशाग्रता से 1883 में वक़ालत की परीक्षा में सबसे अधिक अंक हासिल कर पहले कानपुर के पंडित पृथ्वीनाथ की सरपरस्ती में कानपुर में वक़ालत की और फिर इलाहाबाद पहुँचे और देश के सबसे बड़े वक़ीलों में जाने गए।

यह कहानी कोई मैने नहीं ढूंढी है। वर्षों पहले लिखी बी आर नन्दा की किताब “द नेहरूज़” में है और भी अनेक जगह।

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पुनःश्च :

1- कौल नेहरू कैसे हुए इसे लेकर आमतौर पर यही माना गया है कि नहर के किनारे रहते उनके नाम मे नेहरू जुड़ा। हालांकि एक कश्मीरी इतिहासकार का कहना है कि वे मूलतः कश्मीर के नौर गाँव के निवासी थे इसलिए नोरू और फिर नेहरू नाम पड़ा। अपनी अगली किताब में यह सब विस्तार से दूँगा।

2- यह मुसलमान वाला किस्सा जहाँ तक मुझे समझ आता है सेकुलर और लिबरल मोतीलाल नेहरू के ख़िलाफ़ हिन्दू महासभाई मदन मोहन मालवीय आदि के दुष्प्रचार से उपजा है। उन पर ‘बीफ़ ईटर’ और विधर्मी होने के आरोप उस समय लगाये गए थे जिन्हें लगता है कि अफ़वाह फै़क्ट्रियों ने मनमाना विस्तार दिया।

(कवि -लेखक अशोक कुमार पाण्डेय की इतिहास में गहरी रुचि है। उनकी हालिया प्रकाशित किताब ‘कश्मीरनामा:इतिहास और समकाल’ की काफ़ी चर्चा है। )

 



 

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