भंगी का उद्भव : कब और कैसे? -कँवल भारती

प्रोफेसर श्यामलाल की पुस्तक ‘Ambedkar and The Bhangis’ से
भंगी का उद्भव : कब और कैसे?

‘The Bhangi : The Lowest of the Low Untouchable Castes’ शीर्षक पहले अध्याय में प्रोफेसर श्याम लाल ने भारत के अलग-अलग प्रान्तों में मैला उठाने वाले लोगों को किन-किन नामों से जाना जाता है, इसका वर्णन करते हुए यह पता लगाने की कोशिश की है कि वे भंगी कैसे बने? एक तरह से यह अध्याय भंगी शब्द की उत्पत्ति पर प्रकाश डालता है. इसलिए इन पंक्तियों के लेखक भी इस शब्द का प्रयोग क्षमायाचना के साथ कर रहा है.
श्यामलाल जी यह मानते हैं कि सफाई करने वाले लोग हर सभ्यता में थे. प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में भी पुलकस, श्वपच और चंडाल के नाम मिलते हैं, जो सफाई का गंदा काम करते थे. हर सभ्यता में नगरों में रहने वाले लोगों को न केवल शौच के लिए एक ख़ास स्थान की जरूरत पड़ती थी, बल्कि मल को उठाकर फेंकने वालों की भी जरूरत पड़ती थी.

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इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि प्राचीन भारत के लोग सफाई कर्मचारी के नाम से परिचित नहीं थे. हालाँकि उस काल में भी इस कार्य को एक ख़ास वर्ग या समुदाय के लोग ही करते थे. किन्तु वे भंगी कहलाते थे या नहीं, यह जानने के लिए जी लेखक ने कुछ रोचक अध्ययन किए हैं. उसने बी. एन. श्रीवास्तव, एन. आर. मलकानी और बिन्देश्वर पाठक के मुस्लिम मत का भी विश्लेषण किया है, जो कहते हैं कि स्वच्छकार का औपचारिक पेशा मुस्लिम काल में आया. उनके अनुसार, मुसलमान अपने साथ कुछ स्त्रियों को लेकर आए थे, जो बुरका पहिनती थीं. अत: उनके लिए परदे वाले ख़ास किस्म के शौचालय बनवाए गए थे, जिन्हें साफ़ करने और मल को उठाकर फेंकने के लिए भी आदमी नियुक्त किए गए थे. यह काम उन्होंने युद्ध-बंदियों से कराया, क्योंकि उनके सजातीय आदमी यह काम नहीं कर सकते थे. इस तरह उन्होंने एक अलग भंगी जाति का निर्माण किया, जिसे बाद ने बादशाह अकबर ने मेहतर का नाम दिया था. श्रीवास्तव के अनुसार ब्रिटिश काल में सेना की छावनियों और नगरपालिकाओं का गठन हुआ, जहाँ दैनिक आधार पर बड़ी संख्या में स्वच्छकारों को रखा गया. उनकी जातियों के नामों से पता चलता है कि उन्हें विभिन्न जातियों और विभिन्न सामाजिक वर्गों से भर्ती किया गया था. पाठक के अनुसार, इनमें न केवल क्षत्रिय, बल्कि पुल्कस और चंडाल जैसे लोग भी थे, जो प्राचीन काल से मानव-मल उठाने का काम कर रहे थे, और वे भी शामिल थे, जो युद्धबंदी बनाए गए थे. उनके अनुसार वे लोग ही आज के भंगी और मेहतर हैं. 1931 की जनगणना में इन स्वच्छकारों की संख्या 19,57,460 थी, जिनमें 10,38,678 पुरुष और 9,18,782 स्त्रियाँ थीं. यही वर्ग आगे चलकर भारतीय समाज में स्वच्छकारों का पुश्तैनी वर्ग बन गया. चूँकि मानव-मल उठाना बहुत ही गंदा काम था, इसलिए समाज में इनको सम्मानित स्थान नहीं मिला और वे सबसे निम्न वर्ग बन गए. [पृष्ठ 18]

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यहाँ प्रोफेसर श्याम लाल ठीक ही सवाल उठाते हैं कि ये लोग भंगी के रूप में कैसे माने गए? क्या उन्हें पहले जाति-बहिष्कृत किया गया, और बाद में उन्हें गंदा काम करने के लिए बाध्य किया गया, या वे शुरू से ही यही काम कर रहे थे और इसी आधार पर सबसे नीच कहलाए? अगर इस सवाल का जवाब यह है कि वे शुरू से गन्दा काम नहीं कर रहे थे, बल्कि बाद में उन्हें यह काम करने के लिए बाध्य किया गया था, तो यहाँ एक दूसरा सवाल यह पैदा होता है कि फिर इसके कारण क्या हो सकते हैं? लेखक ने इसके कुछ संभावित कारणों को कुछ सिद्धांतों में तलाश करने की कोशिश की है.

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इनमें पहला मिथकीय सिद्धांत है. वे लिखते हैं कि हिन्दू धर्म शास्त्रों और स्मृतियों से जिस जाति को भंगी के अर्थ में सबसे ज्यादा उद्धृत किया जाता है, वह चंडाल जाति है. मनु के अनुसार, चंडाल ब्राह्मण माँ और शूद्र पिता की संतान है, जिसका काम लाशों को ढोना और जल्लाद का काम करना था. कुछ स्रोतों में उसकी और भी अपमानजनक उत्पत्ति मिलती है, जिनमें से एक के अनुसार वह मुसालिया पिता और धींवर स्त्री, जो रोज सुबह सड़क बुहारने, लाशें ढोने और मानव-मल उठाने का काम करती थी, के संसर्ग से पैदा हुआ था. एक दूसरे स्रोत में उसे डोम की संतान कहा गया है, जिसका पिता निषाद और माँ सूद्र थी. प्रोफेसर लिखते हैं कि धर्मशास्त्रों के आधार पर कोई भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकता. यहाँ यह सवाल उठता है कि क्या चंडाल शब्द से उसी जाति का बोध होता है, जो भंगी जाति से होता है? दूसरे शब्दों में क्या ये एक ही वर्ग के लोगों के अलग-अलग नाम हैं? वे कहते हैं कि धर्मशास्त्र इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकते. [पृष्ठ 16-19]

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इसके बाद लेखक अपने अभीष्ट के लिए इतिहास में प्रवेश करता है. वह 400 ईसवी में चन्द्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत आए चीनी यात्री फाह्यान (Fa-Hien) के यात्रा विवरण को देखता है, जिसे डा. आंबेडकर ने भी अपने ग्रन्थ ‘The Untouchables’ में उद्धृत किया है. फाह्यान ने अपने नगर-वृतांत में चंडाल का जिक्र किया है, भंगी का नहीं. इसका अर्थ है फाह्यान के समय में भारत में भंगी शब्द नहीं था. आंबेडकर के अनुसार उस समय तक अस्पृश्यता भी अस्तित्व में नहीं आई थी. फाह्यान के बाद 629 ईसवी में दूसरा चीनी यात्री युआन च्वांग (Yuan Chwang) भारत आया और यहाँ सोलह साल तक रहा. उसने नगरों का वर्णन करते हुए लिखा है कि कसाई, धोबी, मछुआरे, नट-नर्तक, वधिक, और स्वच्छकार की बस्तियों को एक ख़ास चिन्ह से पृथक किया गया है. उन्हें नगर के बाहर बसने के लिए बाध्य किया गया है, और जब कभी उन्हें किसी के घर के पास से गुजरना होता है, तो वे बायीं ओर झुककर निकलते हैं.
श्यामलाल जी कहते हैं कि इस विवरण में गौर करने लायक बात यह है कि युआन च्वांग ने चांडालों के सिवा कुछ अन्य समुदायों का भी जिक्र किया है. इसमें यही एक महत्वपूर्ण बिंदु है, जो यह बताता है कि युआन च्वांग के समय भारत में अछूत वर्गों और छुआछूत का विकास हो चुका था. इसी के आधार पर डा. आंबेडकर ने भी यह निष्कर्ष निकाला था कि 200 ईसवी तक अस्पृश्यता का अस्तित्व नहीं था, परन्तु 600 ईसवी तक इसका जन्म हो गया था. डा. आंबेडकर का अध्ययन इस विषय पर था कि अछूत कौन थे और वे अछूत कैसे बने? उन्होंने किसी विशेष अछूत जाति के संदर्भ में शोध नहीं किया था. किन्तु श्यामलाल जी के समक्ष प्रश्न यह है कि अछूतों में भी अछूत भंगी कौम कैसे बनी? वे इसे एक जटिल समस्या मानते हैं. उनके अनुसार नस्ल, आक्रमण, और भारतीय इतिहास में विभिन्न काल-खंडों की संस्थाओं और सरकारों ने जाति पर अपनी छाप छोड़ी है. इसलिए वे समझते हैं कि भारत में भंगियों के उद्गम को समझने के लिए ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की आवश्यकता है. पर वे ‘अनार्य’ या ‘द्रविड़ियन’ सिद्धांत पर भी सवाल करते हैं कि आज जाति इतनी विशाल बन गई है कि सिर्फ इस आधार पर कि आर्यों ने मूलनिवासियों को दास बनाया और उनसे स्वच्छता के गंदे काम कराए गये, कोई सही निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.
इसके बाद वे मानव-विज्ञान (Anthrpological) और आचार-विज्ञान (Ethological) के सिद्धांतों को कसौटी पर कसते हैं. इस सम्बन्ध में उन्होंने जी. एस. घुर्ये के मत को उद्धृत किया है, जो उन्होंने अपनी किताब ‘कास्ट एंड क्लास इन इंडिया’ (1957) में दिया है कि संयुक्त प्रान्तों का ब्राह्मण शारीरिक रूप से पंजाब के चूहड़ा और खत्री के ज्यादा समानता है. श्यामलाल जी लिखते हैं कि निसंदेह यह हो सकता है कि किसी समय ब्राह्मण और चूहड़ा (भंगी) दोनों एक ही लोग रहे हों. विजेता लोग पराजितों को अपनी अधीनता में रखते थे, और उनसे नीच काम कराते थे, और अवश्य ही वह नीच काम केवल मल उठाने का ही हो सकता था. स्टैनली राइस ने भी बहिष्कृत लोगों (अछूतों) को विजेताओं का ही अधीनस्थ माना है. लेखक के अनुसार उत्तर भारत की भंगी जाति से इन बदलावों की पुष्टि की जा सकती है. वे क्रूक के हवाले से कहते हैं कि कुछ भंगियों का रंग गहरा काला और चमकीली ऑंखें डोम से मिलती हैं. कुछ मानव-विज्ञानी विद्वान् यह मानते हैं कि कुछ वर्ग व्यवस्था के बदलाव के साथ अपनी अस्मिता और प्रतिष्ठा को बनाए रखने में असमर्थ थे, जिसके परिणामस्वरूप वे निम्नतम स्तर पर चले गए. शायद इसलिए उनमें बहुत से गोत्र समान पाए जाते हैं. उदाहरण के लिए चौहान, सोलंकी, गहलोत, परिहार, राठोड़, पंडित और कल्ला राजपूत और ब्राह्मण गोत्र हैं, लेकिन ये गोत्र भंगियों में भी मिलते हैं. [पृष्ठ 22]
लेखक ने बताया है कि 1911 में चंडाल जाति ने जनगणना अधिकारी से यह अपील की थी कि उनकी गणना ब्राह्मण में की जाए, क्योंकि वे ब्राह्मण माँ से जन्मे हैं. वे कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं कि चंडाल गंदगी साफ़ करने का काम करते थे, लेकिन उन्होंने स्वयं को ब्राह्मण के रूप में दर्ज कराने की कोशिश समृद्ध होने के बाद की. स्पष्ट है कि मानव-मल साफ करने वाले लोग सिर्फ एक जाति के नहीं थे. इन समानताओं के संदर्भ में लेखक कहता है कि अगर ये सही हैं, तो यह कहना तर्कसंगत होगा कि किसी समय भंगियों का सामाजिक स्तर ऊँचा रहा होगा. [पृष्ठ 22]
लेखक के अनुसार उत्तर भारत के भंगियों के उच्च जातीय होने के कुछ प्रमाण धर्मांतरण और धर्म-बहिष्कार के सिद्धांतों में भी मिलते हैं. इस तरह के काफी साक्ष्य हैं कि सामाजिक नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों का धर्म से बहिष्कार कर दिया जाता था, और वे अछूत घोषित कर दिए जाते थे. ऐसे बहिष्कृत लोगों के पास जीविका का कोई साधन नहीं रह जाने के कारण एक ही रास्ता बचा होगा, कि वे या तो भूखे मर जाएँ, या फिर गंदे कामों से अपनी जीविका चलायें. और उन्होंने दूसरा रास्ता ही विवश होकर अपनाया होगा. वे एन. प्रसाद को उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि बंगाल में हिन्दू शासन के पतन के बाद जो लोग न ब्राह्मणधर्म को स्वीकारते थे, और न इस्लाम को, और अपने पुराने धर्म में ही बने रहते थे, वे ही आज के अछूत बनाए गए. इसलिए भंगियों के संदर्भ में वे मलकानी के इस मत से सहमत हैं कि भंगी आवश्यक रूप से नगरीय जीवन का आधुनिक उत्पाद है. जिसे पहले मुसलमानों ने और बाद में अंग्रेजों ने निर्मित किया था, जो आनुवंशिक बन गया. [पृष्ठ 23-24]
लेकिन इस सम्बन्ध में वे यह भी स्वीकार करते हैं कि भंगियों के बारे में किसी प्रामाणिक और लिखित साक्ष्य के अभाव में शोधकर्ता को मौखिक परम्पराओं और किंवदन्तियों से ही काम चलाना होगा. इसलिए आगे वे इस अध्याय में मौखिक परम्पराओं का विश्लेषण करते हैं, जिसमें पहली मौखिक परम्परा वाल्मीकि ऋषि का वंशज होने की है. इस परम्परा पर लेखक ने ठीक ही विमर्श किया है, क्योंकि आज वाल्मीकि ही भंगी जाति की मुख्य पहिचान बन गई है और सत्तर के दशक में जन्मा एक ‘वाल्मीकि धर्म’ भी उनके बीच स्थापित हो गया है, जिसके जनक स्वामी रत्नाकर थे. इन पंक्तियों के लेखक ने उनके साथ पत्राचार किया था. उन्होंने एक पत्र में मुझे लिखा था कि वह पहले बौद्ध भिक्षु थे, और अब उनका लक्ष्य वाल्मीकि धर्म स्थापित करना है. श्याम लाल जी ने वाल्मीकि धर्म की घटना को नजरअंदाज किया है, उनका जोर वाल्मीकि ऋषि पर रहा है, जिसकी कहानी उन्हें एक नीच जाति का बताती है, और यह भी कि वह डाकू थे. संभवतः वाल्मीकि के इस घृणित कर्म की वजह से ही उन्हें स्वच्छकार का दर्जा दे दिया गया. पौराणिक कथा का यह अवशेष अभी भी भंगियों में प्रचलित है. भंगी के उद्गम की एक कथा वे 1891 की मारवाड़ जनगणना से उद्धृत करते हैं. उसके अनुसार, एक दिन ब्रह्मा ने मिटटी को रगड़कर आदमी बनाया, और महिथर नाम दिया. यह महिथर ही मेहतर हुआ. बाद में उन्हें भंगी कहा जाने लगा, क्योंकि उनके बच्चे मृतक पशुओं का मांस खाते थे, और मातंगी देवी के मन्दिर में बिना नहाए जाते थे. इससे कुपित होकर देवी ने उन्हें हमेशा सफाई का काम करने और मानव-मल उठाने का शाप दे दिया. उसी समय से वे भंगी हो गए. [पृष्ठ 25]
भंगी-उद्गम पर आगे बढ़ते हुए प्रोफेसर ने क्रूक के हवाले से एक किंवदंती का जिक्र किया है, जिसके अनुसार एक बार हज़रत पैगम्बर और मेहतर (Saint) एलियास ख़ुदा (Almighty God) के दरबार में हाजिर हुए. एलियास को खांसी आई, पर उन्हें वहाँ थूकने के लिए कोई कमरा नहीं मिला. उन्होंने ऊपर को मुंह करके थूका, तो वह पैगम्बरों के ऊपर गिरा. उन्होंने इसे अपमान महसूस किया, और खुदा से शिकायत की, और खुदा ने तुरंत एलियास को हुक्म दिया कि अब वह दुनिया में स्वीपर के रूप में काम करेंगे. इलियास ने हुकुम क़ुबूल किया पर प्रार्थना कि उनकी हिफाजत के लिए कुछ पैगम्बर और पैदा कर दिए जाएँ. खुदा ने एक पैगम्बर ‘लाल बेग’ को पैदा कर दिया.
किन्तु, श्यामलाल जी इन कथाओं के बारे में लिखते हैं कि ये किंवदन्तियाँ भंगियों के उद्गम को नहीं बताती हैं, बल्कि सिर्फ यह बताती हैं कि कैसे कुछ लोग स्वीपर वर्ग में धकेल दिए गए.
अंत में लेखक की भंगी जाति के उद्गम की यात्रा व्युत्पत्ति सिद्धांत में समाप्त होती है. वह संस्कृत के शब्द ‘भांग’ से भंगी का उद्गम मानते हैं. भांग का नशा करने वाले— भंगेड़ी को भंगी कहा गया. किन्तु भांग के सेवन के आदी लोग मानव-मल उठाने वाले भंगी कैसे हो गए, यह गुत्थी अभी भी बनी हुई है, और लेखक ने भी इसे सुलझाया नहीं है. उनके अनुसार भंगी का अर्थ हत्या करना भी है, और समाज से भंग किया हुआ अलग वर्ग भी है. वे भंग और बहिष्कृत लोग हैं, जिनका मुख्य काम मानव-मल उठाकर फेंकना है.
(18/11/2017)

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