बेटों को समझाएं ताकि शोषण के अपराध में लिप्त पुरुषों की संख्या कम हो सके – Dipesh Pant

Humans of Bombay के पेज पर Dipesh Tank का ये अनुभव मैंने पढ़ा और चूँकि मैं चाहती हूं कि ऐसे अनुभव ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे तो इस पोस्ट का हिंदी अनुवाद आप सबके साथ साझा कर रही हूं| किसी समस्या के समाधान का पहला चरण स्वीकार्यता होती है जिसमें अपनी ज़िम्मेदारी के एहसास का अहम रोल है| दीपेश ये कर सके, बाकी ज़्यादातर तो मानने को ही तैयार नहीं कि ऐसी कोई दिक्क्त है भी|- Ila Joshi

“मेरी परवरिश मुंबई की एक झुग्गी में हुई| बचपन से ही पिता की ख़राब स्थिति की वजह से मैंने अपनी माँ को घर चलाने के लिए संघर्ष करते देखा| उन्होंने अपना ख़ुद का केटरिंग का बिज़नेस शुरू किया और अक्सर दिन में 12 घंटे से ज़्यादा काम करने की वजह से उनके देर रात घर लौटने को लेकर आस पड़ोस के लोगों ने उन्हें भला बुरा कहा, जिसकी वजह से मेरे मन में उनकी इज़्ज़त और बढ़ती ही गई| 16 साल की उम्र में माँ को मदद करने के उद्देश्य से मैंने पढ़ाई छोड़ दी और ऑफिस बॉय के तौर पर अपनी पहली नौकरी शुरू की| मेरा काम कम्प्यूटर्स ठीक करना था और सबसे पहले दफ़्तर पहुंचना और सबसे आख़िर में वहां से निकलने वाला मैं ही होता| मेरी कोशिश हमेशा ज़्यादा से ज़्यादा सीखने के रही|

वक़्त के साथ नौकरी में तरक्की हुई और अंततः मुझे सेल्स की नौकरी मिली| कुछ ही सालों में एक प्रतिष्ठित एड एजेंसी की नौकरी के साथ जीवन संघर्ष का चक्र पूरा हुआ|

इसी दौरान एक ऐसा घटनाक्रम घटा जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल कर रख दी| रोज़ की ही तरह मैं अपने सफ़र के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचा जब मैंने पुरुषों के एक समूह को महिला डब्बे में चढ़ती औरतों को परेशान करते देखा| मैं उनसे अकेले नहीं लड़ सकता था, इसलिए मैं पुलिस के पास गया जिन्होंने शुरुआत में मुझे नज़रअंदाज़ किया| थोड़ा समझाने बुझाने के बाद एक अफसर मेरे साथ आया लेकिन तब तक वो पुरुष जा चुके थे| इस घटना का मुझ पर बड़ा असर हुआ और मैंने सोचा कि काम की वजह से अक्सर देर रात घर लौटती मेरी माँ को जब कोई इस तरह परेशान करता तो क्या मैं इसी तरह प्रतिरोध न करता? मैं इसे बिल्कुल भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था|

मैंने और मेरे एक दोस्त ने थोड़ी खोजबीन शुरू की और कई रेलवे स्टेशनों पर नज़र रखी तो पाया कि ऐसे सैंकड़ों पुरुष हर जगह मौजूद थे और 85 फ़ीसदी से ज़्यादा सफ़र करने वाली औरतों को इस तरह की दिक्क्तों का सामना करना पड़ता था|

मैंने एक जोड़ी सनग्लासेस ख़रीदे जिसके अंदर एक HD कैमरा था| मैं महिला डब्बे की तरफ़ वाले एक कोने में खड़ा होकर मेरी नज़रों के सामने से गुज़रने वाली हर गतिविधि को रिकॉर्ड कर लेता| इस पूरी प्रक्रिया ने मुझे भीतर तक झिंझोड़ दिया और मुझे सभी औरतों द्वारा रोज़ झेले गए इस शोषण का भी पता चला| ये सारे सबूत हमने पुलिस इंस्पेक्टर के सामने रखे और उनका इस समस्या की गंभीरता से परिचय करवाया और ग़नीमत रही कि इस बार वो समझ गए| चालीस पुलिस ऑफिसर्स की टीम ने हमारे साथ काम करना शुरू किया और हर रोज़ हम लोग दो स्टेशनों के बीच सफ़र करते| मेरी लाइव रिकॉर्डिंग से वो सब अपराधी कैमरे में क़ैद हो जाते जिससे जब तक वो अगले स्टेशन पर पहुँचते वहां पर मौजूद पुलिस ऑफिसर्स उनको पकड़ पाते| 6 महीने के अंदर ही हमने 140 ऐसे अपराधियों को जेल भिजवाया| और हमारी लड़ाई अभी भी जारी है जहां अब मैं ज़्यादातर डोमेस्टिक वायलेंस और किन्हीं भी परिस्थितियों में असुरक्षित महसूस कर रही औरतों की हर संभावित मदद के लिए प्रयासरत हूं|

मैं जानता हूं कि इस कदम को उठाने की मेरी बड़ी वजह ये रही कि पुरुषों के इस घिनौने व्यवहार के लिए मैंने निजी तौर पर ख़ुद को ज़िम्मेदार पाया| लगभग हर जगह पुरुषों को इसी घिनौनी मानसिकता वाला मानने की बड़ी वजह वो कुछ लोग हैं जो ऐसे अपराधों में लिप्त होते हैं और मैं चाहता था कि इस स्थिति को बेहतर बनाया जाए| मैं औरतों की बहुत इज़्ज़त करता हूं और इसकी शुरुआत मेरे अपने घर से हुई, क्यूंकि मैंने अपनी माँ से सीखा था और सबसे ज़्यादा इज़्ज़त भी उन्हीं की करता रहा| और शायद यही सन्देश औरों तक भी पहुंचना चाहिए कि वो अपने घर के बेटों को समझाएं ताकि दुनिया में शोषण के अपराध में लिप्त पुरुषों की संख्या कम हो सके|”

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