बेटियों से मुँह चुराते प्रधानमंत्री पर एक सांस्कृतिक चिट्ठा -कश्यप किशोर मिश्र

मर्दानगी क्या होती है ? यह जनाना या स्त्रैण से कितनी अलग होती है ? हाँलाकि यह एक सामाजिक सवाल है पर इसके राजनीतिक जवाब की तलाश करें तो तलाश की सुई भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर मुड़ जाती है ।

राजनीतिक मर्दवाद को सामाजिक मर्दवाद की मर्यादा बना देने का उदाहरण इस मुल्क नें जय गंगा मईया को नमामि गंगे और जै सियाराम नारे को जय श्री राम नारे में तब्दील होते देखा और महसूस किया है ।

क्या आपको यह पता है कि भारतीय जनता पार्टी के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महापुरुषों की सूची में राम कब शामिल हुए ?

बात पुरानी है, आजादी के पहले की, महात्मा गाँधी एक बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय संघ प्रमुख से मुलाकात के लिए गए थे । बापू नें संघ मुख्यालय में लगी तस्वीरों को देखकर संघ प्रमुख से सवाल किया कि क्या वजह है कि संघ मुख्यालय में खूब सारे महापुरुषों की तस्वीरें लगी हैं पर प्रभु राम की कोई एक भी तस्वीर नहीं लगी है ?

संघ प्रमुख नें राम की कोई भी तस्वीर न होने की वजह राम का चरित्र बताया । संघ प्रमुख के अनुसार “राम का चरित्र और आचरण स्त्रैण है, जो युवाओं को कमजोर कर देगा लिहाजा संघ राम को आदर्श मानने की बजाय राणा प्रताप और शिवाजी जैसे लड़ाको को अपना आदर्श मानने पर जोर देता है ।”

यह इस मुल्क का दुर्भाग्य रहा कि राम को स्त्रैण मान उसकी उपेक्षा करने वाली राजनीतिक विचारधारा राम के कंधे पर चढ़कर सत्तारूढ़ हुई पर इसका मतलब यह नहीं है कि राम को स्त्रैण मानकर उपेक्षित करने वाली विचारधारा बदल गई । इस विचारधारा नें जन जन के मन में बसे राम को बदल दिया ।

राम मंदिर आंदोलन के पूर्व इस मुल्क के जनमानस में बसनें वाले कोमल-भुज,सुमधुर, सुकोमल, सुलोचन, शांत राम को “आक्रामक धनुर्धर सुडौल कंधों और बलिष्ठ भुजबल वाले राम” में बदल दिया गया । राम मंदिर आंदोलन के दौरान राम मंदिर की तस्वीरों के साथ साथ जिस राम की छवि मजबूत बनाने की सांस्कृतिक कवायद की गई वह छवि इस मुल्क के मन में बसे राम की नहीं उस श्री राम की बनाई गई जो संघ की राजनीतिक विचारधारा को पोषित करती थी ।

यह कतई आश्चर्यजनक नहीं कि अपने फायदे के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते एक विचारधारा कब धर्म और संस्कृति को मिला देती हो और कब अलग कर देती हो इसको समझना कठिन हो जाए ।

ऐसा इसलिए है, क्योंकि संघ की विचारधारा सांस्कृतिक विरासत और इसके प्रतीकों का इस्तेमाल इन्हें सहेजनें के लिए नहीं बल्कि इस्तेमाल करो और कूड़े में फेक दों की अवधारणा से करती है । संघ की विचारधारा को संस्कृति, विरासत, इतिहास या सामाजिक बोध से कोई लेना देना नहीं ।

यह ध्यान रखना तब और जरूरी हो जाता है जब इस मुल्क का प्रधानमंत्री इस मुल्क की सांस्कृतिक विरासत की राजधानी से खुद को गंगा का बेटा के नारे का छलावा देते चुना गया था ।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि मुल्क के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में लड़कियों को छेड़छाड़ से सुरक्षित रखने की बजाय, एक लड़की को सुरक्षा के बुनियादी अहसास उपलब्ध करानें की बजाय लाठी डंडो से खदेड़ा जा रहा है ।

ऐसा क्यों है ? ऐसा इसलिए है कि मुल्क के प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री के लिए व्यक्तिगत तौर पर महिलाएँ त्याज्य संबंध हैं ।

मोदी के जसोदाबेन के त्याग को, उनके समर्थक अक्सर बुद्ध के यशोधरा के परित्याग से जोड़कर देखते हैं । पर जैसा कि संघ की विचारधारा प्रतीकों को उनके सहज अर्थ में न लेकर अपने अर्थ बुनती है, यशोधरा और गौतम के प्रतीक के अर्थ भी बदल दिए गए ।

तथागत बुद्ध होने के बाद यशोधरा के पास गए थे । तथागत नें यशोधरा से अत्यंत दीन होकर कहा “मैं जो पहले था, वह तुम्हारा स्वीकार था, वही था जो तुमने स्वीकारा था, पर मेरा आज, तुम्हारा स्वीकार नहीं, तुमसे मुँह छुपा कर एक कायर की तरह भागने का विस्तार है, मैं तब तक बुद्ध नहीं हो सकता, तब तक सन्यस्त नहीं हो सकता जब तक तुम इसे स्वीकार नहीं करती, मेरे संन्यास को स्वीकार करो, मुझे त्राण दे दो, यशोधरा !”

बुद्ध की माँगी भीख में वही प्रेम था, ठीक वही मनुहार थी, वैसी ही आतुरता थी, वही अपनापन था जो संन्यास पूर्व गौतम के प्रणय निवेदन में होता था और यशोधरा नें अवरुद्ध कंठ से पूछा था “तुम्हारे आज को मैं किस भाँति स्वीकार सकती हूँ ?”

बुद्ध नें शांत भाव से कहा “एक संन्यासी को भिक्षा दे दो, यह मेरे आज को तुम्हारा स्वीकार होगा ।”

यशोधरा नें अपने एकमात्र बेटे को बुलाया और तथागत से कहा “तुम से प्रिय मुझे कुछ भी नहीं था, तुमसे विछोह मेरे लिए अकल्पनीय था और तुम्हारे आज को स्वीकार करने का अर्थ तुम्हें हमेशा को खोना है, पर मैं तुम्हें स्वीकार करती हूँ, तुम जो भी हो, जैसे भी हो, मैं तुम्हें स्वीकार करती हूँ और अपना सर्वस्व तुम्हें दान करती हूँ, मेरे पास अपना कहने को सिर्फ हमारा बेटा बचा है, लो यह दान किया ।”

गौतम बुद्ध नें अपने वंश के आखिरी चिराग को भीख में स्वीकार किया था और वह भी संन्यासी बन गया ।

मोदी नें बेशक जशोदा बेन का त्याग किया पर बुद्ध की तरह वापस लौटने का साहस उनमें कतई नहीं है ।

…यह कायरता बनारस में भी प्रबल हो उठी और मोदी जी में इस मुल्क की बेटियों का सामना करने का साहस न हुआ ।
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कश्यप किशोर मिश्र

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