आश्रम की चारदिवारी में रहते हुए जिस समाज को पाप कह दिया जाता है उसी समाज में दरअसल मोक्ष छिपा है- Rakesh Pandey

बाबा राम रहीम अपनी किसी शिष्या का यौन- शोषण करने से पहले कहता था कि वह उसे दुनियावी पापों से मुक्त कर रहा है। और यह कि जिस बाहरी दुनिया में वह रहकर आई है वह तो पापों से भरा था। बाबा की बातों में यह सन्निहित होता था कि वह शिष्या स्त्री होने के नाते चेतना की एक निम्न अवस्था है इसलिए दुनियावी पापों की ज्यादा बड़ी कैरियर है जिसे उच्च चेतना बाबा के हाथों मुक्त होने की आवश्यकता है।

यह एक उदाहरण है कि आध्यात्मिकता के सिद्धांतों का कैसे मनमाना उपयोग संभव है। चेतना की मुक्ति और चेतना के उद्विकास के सिद्धांतों का हमारे समाज में ऐसा मनमाना उपयोग हुआ है कि अधिक चेतना- संपन्न से कम चेतना- संपन्न की कल्पित अवधारणाओं के आधार पर पुण्य और पाप की अवधारणाएं विकसित कर साधारण जनता पर नियंत्रण और शोषण के तंत्र विकसित किए गए। वर्ण और जाति का दार्शनिक आधार यही प्रस्तुत किया जाता है कि उच्च वर्ण और जाति चेतना की उच्च अवस्थाएं हैं।

भारत में इस बात का उत्तर ठीक से नहीं ढूंढा गया कि चेतना की बौद्धिक परंपरा के अंतर्गत सामाजिक- आर्थिक आधार पर अधिक शक्ति संपन्न व्यक्ति या वर्ग को ही क्यों लगभग स्थिर रूप से चेतना की उच्च अवस्था माना गया। यद्यपि साधु- संतों की वह परंपरा भी भारत में मिलती है जो मानती है कि दुनिया में रहकर दुनिया के प्रश्नों से रोजमर्रा साक्षात्कार कर चेतना की उच्च अवस्था की ओर जाया जा सकता है और एक साधु को राजा और रंक में कोई अंतर नहीं करना चाहिए यानि सामाजिक शक्ति में भिन्नता के आधार पर चेतना की अवस्था में कोई अंतर कभी नहीं मानना चाहिए- पर यह परंपराएं गौण रही। हिंदू परंपरा के बहुलतावाद का प्रतिनिधित्‍व करने वाले छोटे मोटे स्‍थानीय प्रभाव वाले पंथ भी अंतत: चेतना के उन्‍हीं सिद्धांतों में सुर में सुर मिलाते मिलते हैं। प्रधान रूप से तो भारत में यही हुआ कि बड़े बाबा लोग वह हैं जो बड़े लोगों को आध्यात्मिकता सिखा रहे हैं, और अपनी आध्यात्मिकता के चाबुक से साधारण लोगों को पापी बताकर नियंत्रित कर रहे हैं और अंधभक्त शिष्य बना रहे हैं।

दूसरी ओर, नैतिकता के आधुनिक और संविधानवादी सिद्धांत सही या गलत या पाप सा पुण्य के आधार पर व्यक्ति को उच्च या ओझा नहीं बनाते। यहां नैतिकता की अवधारणा अधिक ऑर्गेनिक है जिसमें हर बड़ा छोटा व्यक्ति अपने वैयक्तिक और सामाजिक अस्तित्व को लेकर औचित्य और न्याय के लिए संघर्ष करता है जिस क्रम में नैतिकता विकसित होती है। इसलिए बाबाओं के शिष्यों और शिष्याओं को समझना चाहिए कि आश्रम की बंद चारदिवारी में रहते हुए जिस समाज को पाप और उन्हें पापी कह दिया जाता है उसी समाज में दरअसल उनका मोक्ष छिपा है।

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