काँग्रेस+समाजवादी+वामपंथी- रामचंद्र गुहा की ‘फैंटेसी’ में छिपा भविष्य का रास्ता – Pankaj Srivastava ————————————————————–

 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के नीम अंधेर कमरे में पहली बार यह शब्द-पद कान में पड़ा था- अमूर्त प्रत्यय !

वह बीए प्रथम वर्ष की कोई शुरुआती कक्षा थी। विज्ञान के विषयों से इंटरमीडिएट करके आने वाले मेरे जैसे छात्र के लिए इसका ठीक अर्थ समझने में कई साल लग गए। और जब थोड़ा- बहुत समझ आया तो पाया कि यह अपने किसी काम का नहीं है। बदलाव के लिए अमूर्त नहीं, ठोस समझ और कार्रवाइयों की ज़रूरत होती है।

एनडीटीवी पर कल शाम इतिहासकार रामचंद्र गुहा से सुनी उनकी ‘फैंटेसी’ दिमाग़ में घर कर गई है। गुहा ने मौजूदा राजनीतिक हालात के मद्देनज़र सलाह दी कि नेता विहीन काँग्रेस और पार्टी विहीन नीतीश कुमार को साथ आ जाना चाहिए (ज़ाहिर है, राहुल गाँधी के बारे में उनकी राय अच्छी नहीं है।)

हाँलाकि गुहा ने इसे अपनी ‘फैंटेसी’ बताकर साफ़ कर दिया कि इस संभावना के हक़ीक़त में बदलने की कोई उम्मीद उन्हें भी नहीं है, लेकिन फिर भी इस टिप्पणी के ज़रिए एक गंभीर सूत्र तो वे दे ही गए। राष्ट्रीय परिदृश्य पर नज़र डालें तो कभी ग़ैरकाँग्रेसवाद के पुरोधा रहे तमाम समाजवादियों और काँग्रेस के बीच कोई वैचारिक अंतर नहीं रह गया है। ऐसे में अगर देश सचमुच फ़ासीवादी ख़तरे के मुहाने पर है (या उसमें फँस गया है) तो फिर समाजवादियों की काँग्रेस में वापसी में हर्ज़ ही क्या है।

कभी काँग्रेस समाजवादी पार्टी (सीएसपी) काँग्रेस के अंदर ही समाजवादियों का मंच था। डॉ.लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव जैसे दिग्गज इसी के ज़रिए काँग्रेस को समाजवादी रंग में रँगना चाहते थे। नेहरू और सुभाषचंद्र बोस काँग्रेस ही नहीं, समाजवादी नेता बतौर भी दुनिया भर में जाने गए थे। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के 1931 के कराची अधिवेशन में ‘समाजवादी ढर्रे के विकास’ को भविष्य के भारत का लक्ष्य घोषित किया था।

लेकिन काँग्रेस के अंदर मौजूद दक्षिणपंथियों के दबाव की वजह से तमाम समाजवादियों ने 1948 में काँग्रेस छोड़ दी (यह दोहरी सदस्यता पर सवाल का पहला मामला था)। लेकिन समाजवादियों का दबाव ही था कि 1955 में काँग्रेस के अवाडी अधिवेशन में देश को समाजवादी ढर्रे पर ले जाने का प्रस्ताव फिर पारित हुआ जिसे बाद में भारतीय संसद ने नीति के बतौर स्वीकार किया।

बहरहाल, काँग्रेस के हाहाहूती प्रभाव के दौर में समाजवादियों ने एक प्रतिपक्ष गढ़ने की ज़रूरी कोशिश की लेकिन इसके ज़रिए गाँधी के हत्यारों के रूप में चिन्हित राजनीतिक धारा को भी पैर ज़माने का मौक़ा मिल गया। आज उस धारा से बहकर आया ज़हर, तमाम विविधिताओं को गूँथकर एक राष्ट्र बनाने की ‘हिंदुस्तान’ नाम की अनोखी परियोजना की हत्या पर उतारू है।

काँग्रेस बिहार में नीतीश कुमार की सरकार में शामिल है। समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ चुकी है। ऐसे में मौजूदा फ़ासीवादी ख़तरे को देखते हुए अगर तमाम समाजवादी काँग्रेस में लौट आएँ तो यह कोई फैंटेसी नहीं है, इतिहास से सबक लेना भी होगा । अतीत में फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ ऐसी मोर्चेबंदी हो चुकी है।

यही बात वामपंथियों पर भी लागू होती है। ज़ाहिर है, वे कम्युनिस्ट पार्टियाँ काँग्रेस के समानांतर आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय रहीं और वर्गीय प्रश्न को केंद्रीय बनाने का प्रयास करती रही, काँग्रेस से उनका वैसा रिश्ता नहीं रहा जैसा समाजवादियों का था। क्रांति की लाइन या भारतीय समाज की समझ को लेकर उनमें कई विभाजन हुए, लेकिन आज उनके एक ना हो पाने की कोई वजह नहीं रह गई है। अगर माओवादियों को छोड़ दें (जो आज भी हथियारबंद गुरिल्ला युद्ध के ज़रिए दिल्ली पर कब्ज़ा करने का अर्थहीन सपना देख रहे हैं और बचे-खुचे सघनवन क्षेत्रों में सिमटे हैं) तो संसदीय रास्ते पर चल रहीं बाक़ी कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता समय की स्वाभाविक माँग है !

इस बात में कोई संदेह नहीं कि समाजवादियों की शक्ति से ओतप्रोत काँग्रेस और एकीकृत वामपंथी दल का साझा मोर्चा मोदी-शाह चुनौती से निपटने का कारगर फार्मूला हो सकता है।
यह सिर्फ़ चुनावी चुनौती से निपटने का मामला नहीं है..साँप्रदायिक फुफकार से धरती को बंजर करने वालों के ख़िलाफ़ ‘सद्भाव की नहरें खोदने का राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करना होगा।

आर्थिक नीतियाँ…? प्रश्न महत्वपूर्ण है, लेकिन किसके पास कोई वैकल्पिक मॉडल है ? पूँजीनिवेश का रास्ता खोलने वाली काँग्रेस, उसी पर एक्सप्रेस वे बनाने वाले समाजवादी और टाटा के लिए गोली चलवा बैठे वामपंथियों के पास कौन सा वैकल्पिक मॉडल है, देश जानना चाहता है !

स्वदेशी के नारे को दफ़ना कर कॉरपोरेट के दुलरुआ बनने वाले संघियों के पास ही कौन सा वैकल्पिक मॉडल है ?

लेकिन आर्थिक नीतियों के लगभग समान होने के बावजूद तीन साल के अंदर हम जान गए हैं कि काँग्रेस और बीजेपी एक नहीं है। दोनों एक हैं- इस पर अकादमिक पर्चे लिखे जा सकते हैं, लेकिन गली-गली शिकार हो रहे अल्पसंख्यक समुदाय के बेगुनाह लोगों की जान नहीं बचाई जा सकती।

इतिहास में कुछ ऐसे दौर आते हैं जब पुरानी मान्यताओं से चिपके रहने या पोलिटकिली करेक्ट होने की मजबूरी से बाहर आकर वह बोलना ज़रूरी हो जाता है, जो महसूस होता है। इस बात का कोई मतलब नहीं कि चुनाव में पर्चे छपवाकर कहा जाए कि देश बचाने के लिए किसको हराना ज़रूरी है। किसे जिताया जाए–अगर यह बता पाने का सामर्थ्य नहीं है तो फिर राजनीति में दिमाग़ लगाना बंद कर देना चाहिए।

‘भारत’ नाम की अनोखी और मानव सभ्यता को नई ऊँचाई पर ले जाने वाली ‘परियोजना’ को बचाने और सँवारने के लिए युद्ध अवश्यम्भावी हो गया है जिसके लिए संयुक्त मोर्चा ज़रूरी है।

हैरान ना हों कॉमरेड… मुझे पता है कि आप भी मन ही मन काँग्रेस या बीजेपी विरोधी दलों की जीत पर ख़ुश होते हैं। मैं भी पागल नहीं हूँ..बस मुझे ‘अमूर्त प्रत्यय’ आज भी समझ नहीं आता है।

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