गांधी, चार्ली, चर्चिल और मशीन -3 (Nitin Thakur)

1931 में जब चार्ली चैप्लिन गांधी से मिल रहे थे तब उन्हें बाज़ार में बढ़ते मशीनीकरण के नुकसानों का उतना अंदाज़ा नहीं था। दुनिया बहुत तेज़ी के साथ मशीनों पर निर्भर होती जा रही थी। पहले विश्वयुद्ध के बाद बर्बाद हुए देश तेज़ी से खड़े होने के लिए मशीनों पर सवार थे और जर्मनी उनमें सबसे आगे था। अंग्रेज़ों ने भी मैनचेस्टर में मशीनों से कपड़ा बनाकर दुनिया में खपा दिया था, नतीजतन भारत में कपड़े बनाने वाले बर्बादी के मुहाने पर खड़े थे। गांधी ने अपनी मुलाकात में चार्ली चैप्लिन को बता दिया था कि वो क्यों मशीन के विरोधी थे। उनके लिए मशीन अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद को मज़बूत करने का टूल थी और गांधी इसी टूल से खफा थे। वहीं टॉल्स्टॉय समेत विश्व के कई चिंतक मशीनों को ऐसा खलनायक मान रहे थे जो इंसान को प्रकृति से दूर कर रही है। चैप्लिन सिनेमा के बदलते स्वरूप के साथ बदल रहे थे और वो भी कमोबेश नई मशीनों पर आधारित था। मोशन फिल्में शुरू हो चुकी थीं लेकिन खुद को नकारे जाने के डर से चैप्लिन अपनी राह चलते रहे। थोड़ी बहुत आवाज़ उनकी फिल्मों में सुनाई तो देने लगी लेकिन चैप्लिन ने उन्हें अभी भी गूंगा ही रखने का फैसला लिया। दुनिया ग्रेट डिप्रेशन से गुज़र रही थी। अमेरिका से शुरू हुआ संकट आगे बढ़ रहा था। साफ दिखने लगा था कि मंदी गहरा रही है। उस दौरान सोचने समझनेवालों के लिए यही हॉट टॉपिक रहा होगा कि अब आगे क्या…
1936 में डोरोथिया द्वारा फ्लोरेंस थॉम्पसन का
खींचा गया मशहूर फोटो, इसे ग्रेट डिप्रेशन का सबसे
ताकतवर प्रतीकात्मक फोटो माना जाता है
और फिर 1934 आ गया। सिटी लाइट्स की कामयाबी ने चैप्लिन को देवता बना दिया था। पैसे और तारीफ ने उन्हें ऐसा बौराया कि वो रात-दिन बस कुछ भी करते लेकिन ना फिल्म करते और ना फिल्म के बारे में बात। एक दिन किसी युवा आलोचक की टिप्पणी ने चैप्लिन को निराश कर दिया। उसने लिखा था कि सिटी लाइट्स बहुत अच्छी फिल्म है लेकिन इसे संवेदनाओं की सीमा रेखा पर बनाया गया है और भविष्य में चैप्लिन को और यथार्थवादी फिल्में बनानी चाहिए। चैप्लिन उससे सहमत थे।
इसी तरह चैप्लिन एक बार किसी युवा पत्रकार से मिले। उसने उन्हें मिशिगन शहर के डेट्रायट के बारे में बताया। वहां किस तरह मज़दूरों से बुरी तरह काम लिया जाता है ये जानने के बाद चैप्लिन का दिमाग घूम गया। आगामी फिल्म मॉडर्न टाइम्स की भूमिका बन चुकी थी। हालात चैप्लिन को मशीन और इंसान की कहानी मॉडर्न टाइम्स बनाने के लिए मजबूर कर रहे थे। मिशिगन में मज़दूरी ऐसे कराई जाती थी कि मज़दूर पागल तक हो जाते थे। बस चैप्लिन ने अपनी फिल्म के मुख्य किरदार ट्रैम्प को भी वैसा ही दिखाना तय कर लिया। गरीब ट्रैम्प को फिल्म में अपनी हिरोइन के साथ मंदी, हड़ताल और बेरोजगारी झेलनी थी। खूबसूरत अभिनेत्री पॉलेट को गरीब नायक की प्रेमिका दिखाने के लिए मुंह पर राख मलनी पड़ी। वो बेचारी रो ही पड़ी, मगर चैप्लिन ने तय किया था कि इस बार गरीबी को इस तरह दिखाना है कि वो सच्ची जान पड़े।
फिल्म मॉडर्न टाइम्स, 1936
दुनिया में उस वक्त पूंजीवाद और साम्यवाद की बहस चल रही थी। कई अखबारों ने छाप दिया कि चैप्लिन की नई फिल्म वामपंथ का समर्थन करती है। चैप्लिन ने ना तो फिल्म को समर्थक कहा और ना ही विरोधी। फिल्म रिलीज़ हुई और पहले हफ्ते दर्शकों ने रिकॉर्ड बना डाला। दूसरा हफ्ता भीड़ थोड़ी कम हुई। घबराए हुए चैप्लिन ने न्यूयॉर्क और लॉस एंजेल्स से दूर होनोलुलू जाने का फैसला कर लिया। ये फैसला चैप्लिन ने बहुत जल्दबाज़ी में लिया और जैसे ही वो समुद्री जहाज से होनोलुलू में उतरे तो हैरत में पड़ गए। बड़े-बड़े होर्डिंग्स और प्रेस उनका वहीं इंतज़ार कर रही थी। कोई जगह नहीं थी जहां मशहूर चैप्लिन जा छिपते। खैर, चैप्लिन दौड़ते -भागते रहे और मॉडर्न टाइम्स कामयाब हो गई। इस फिल्म का एक सीन बेहद यादगार हैै और मैं उसे ब्लॉग में लगा भी रहा हूं। कॉमेडी में ट्रेजेडी का ये नायाब उदाहरण है। इस सीन में चैप्लिन खड़े होकर नट बोल्ट कस रहे हैं। उनके सामने एक बेल्ट चल रही है। बेल्ट की अपनी रफ्तार है और मज़दूर को उसी रफ्तार से काम करना है। किरदार ऐसा करने की कोशिश में मशीन के मुंह में चला जाता है और बड़ी मुश्किल से बाहर आ पाता है। वो बाहर आ तो जाता है लेकिन पागल हो जाता है।
फ्रांस के मशहूर दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र और सिमोन डी बुवा ने आगे चलकर अपने जर्नल का नाम भी उसी फिल्म के नाम पर रखा। अमेरिका में वो दौर भुखमरी और हड़ताल का था। फिल्म कमाई के मामले में सिवाय अमेरिका के हर जगह कामयाब थी। उस फिल्म से पहले भी कई फिल्मों ने मशीनों को इंसान का दुश्मन बताने की कोशिश की थी, लेकिन चैप्लिन की अपील अलग ही थी। लोग जो महसूस कर रहे थे वही स्क्रीन पर देख रहे थे। हालांकि मशीनों के खिलाफ बात करने को वामपंथ ठहरा दिए जाने का खतरा था। तब तक ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी में तो वामपंथियों को देशद्रोही से लेकर ना जाने क्या क्या कहा जाने लगा था। इस बात को समझने के लिए आपको एक अमेरिकी फिल्म लेखक डाल्टन ट्रंबो के बारे में पढ़ना चाहिए। उन पर फिल्म भी बन चुकी है। कैसे उन्हें वामपंथी होने की सज़ा पूरी बेहरमी से दी गई थी जबकि ना वो किसी कत्ल में शामिल थे और ना किसी साज़िश में। इसके आगे बताऊंगा कि कैसे चैप्लिन पर भी वामपंथी होने का शक किया गया। सबको हंसाने वाला वो हीरो किस तरह सबको डरानेवाले हिटलर के सामने ताल ठोक कर खड़ा हो गया। वो किसी तरफ नहीं था, सिर्फ अपनी तरफ था पर सबकी किस्मत में वो वक्त देखना लिखा होता है जब वो अकेला पड़ जाता है। चैप्लिन अपवाद कैसे हो सकते थे भला….
क्रमश:
फिल्म मॉडर्न टाइम्स का भुला ना सकने वाला एक दृश्य
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