गांधी, चार्ली, चर्चिल और मशीन -2 (Nitin Thakur)

चार्ली चैप्लिन महात्मा गांधी से मिलना चाहते थे जिसके लिए कैनिंग टाउन में डॉक्टर चुन्नीलाल कतियाल के यहाँ 22 सितम्बर 1931 की शाम का वक्त तय हुआ। खुद चैप्लिन ने इस रोचक मुलाकात को आत्मकथा में सहेजा है। उस वक्त का एक फोटो रिकॉर्ड्स में मिलता है जिसमें गांधी गाड़ी से बाहर आ रहे हैं और उन्हें लोगों ने चारों तरफ से घेर रखा है। जिस घर में उनकी चैप्लिन से मुलाकात तय थी वहीं से चैप्लिन उन्हें देख रहे थे। फोटो भी वहीं से खींचा गया है। गांधी को देखकर लगे नारों का ज़िक्र तो चैप्लिन की आत्मकथा में मिलता ही है, साथ में वो बताते हैं कि कैसे गांधी का पहनावा लंदन के हिसाब से एकदम बेतरतीब था। ज़ाहिर है बाहर ठंड थी और वो भी गीली.. लेकिन गांधी अपनी धोती लपेटे ही हर जगह सहजता से घूम रहे थे। वो जहां ठहरे थे वो भी कोई होटल नहीं था बल्कि एक स्लम था। नीचे फर्श पर ही उनका बिस्तर लगता था। चैप्लिन इस हिंदुस्तानी सादगी को गले से नीचे उतार ही नहीं पा रहे थे। गांधी से बातचीत के पहले चैप्लिन से एक युवती लगातार बात करती जा रही थी। बेचारे चैप्लिन को बहुत कुछ समझ नहीं आ रहा था लेकिन हां-हां करने की उनकी अपनी मजबूरी थी। तभी उस युवती को किसी महिला ने डांट लगाकर चुप कराया। ये शायद सरोजिनी नायडु थीं। आगे की मुलाकात का ब्यौरा चैप्लिन के ही शब्दों में पढ़िए। अनुवाद सूरज प्रकाश का है-
चैप्लिन से मुलाकात के पहले भीड़ के घेरे में गांधी, 1931

मैंने गांधी की राजनैतिक साफगोई और इस्पात जैसी दृढ़ इच्छा शक्ति के लिए हमेशा उनका सम्मान किया है और उनकी प्रशंसा की है। लेकिन मुझे ऐसा लगा कि उनका लंदन आना एक भूल थी। उनकी मिथकीय महत्ता, लंदन के परिदृश्य में हवा में ही उड़ गयी है और उनका धार्मिक प्रदर्शन भाव अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहा है। इंगलैंड के ठंडे भीगे मौसम में अपनी परम्परागत धोती, जिसे वे अपने बदन पर बेतरतीबी से लपेटे रहते हैं, में वे बेमेल लगते हैं। लंदन में उनकी इस तरह की मौजूदगी से कार्टून और कैरीकेचर बनाने वालों को मसाला ही मिला है। दूर के ढोल ही सुहावने लगते हैं। किसी भी व्यक्ति के प्रभाव का असर दूर से ही होता है। मुझसे पूछा गया था कि क्या मैं उनसे मिलना चाहूंगा। बेशक, मैं इस प्रस्ताव से ही रोमांचित था।

 
 
 
चार्ली चैप्लिन-गांधी की अविस्मरणीय मुलाकात, 22 सितंबर 1931
मैं उनसे ईस्ट इंडिया डॉक रोड के पास ही झोपड़ पट्टी जिले के छोटे से अति साधारण घर में मिला। गलियों में भीड़ भरी हुई थी और मकान की दोनों मंज़िलों पर प्रेस वाले और फोटोग्राफर ठुंसे पड़े थे। साक्षात्कार पहली मंज़िल पर लगभग बारह गुणा बारह फुट के सामने वाले कमरे में हुआ। महात्मा तब तक आये नहीं थे; और जिस वक्त मैं उनका इंतज़ार कर रहा था, मैं ये सोचने लगा कि मैं उनसे क्या बात करूंगा। मैंने उनके जेल जाने और भूख हड़तालों और भारत की आज़ादी के लिए उनकी लड़ाई के बारे में सुना था और मैं इस बारे में थोड़ा बहुत जानता था कि वे मशीनों के इस्तेमाल के विरोधी हैं।
आखिरकार जिस वक्त गांधी आये, टैक्सी से उनके उतरते ही चारों तरफ हल्ला गुल्ला मच गया। उनकी जय जय कार होने लगी। गांधी अपनी धोती को बदन पर लपेट रहे थे। उस तंग भीड़ भरी झोपड़ पट्टी की गली में ये अजीब नज़ारा था। एक दुबली पतली काया एक जीर्ण शीर्ण से घर में प्रवेश कर रही थी और उनके चारों तरफ जय जयकार के नारे लग रहे थे। वे ऊपर आये और फिर खिड़की में अपना चेहरा दिखाया। तब उन्होंने मेरी तरफ इशारा किया और तब हम दोनों ने मिल कर नीचे जुट आयी भीड़ की तरफ हाथ हिलाये।जैसे ही हम सोफे पर बैठे, चारों तरफ से अचानक ही कैमरों की फ्लैश लाइटों का हमला हो गया। मैं महात्मा की दायीं तरफ बैठा था। अब वह असहज करने वाला और डराने वाला पल आ ही पहुंचा था जब मुझे एक ऐसे विषय पर घाघ की तरह बौद्धिक तरीके से कुछ कहना था जिसके बारे में मैं बहुत कम जानता था। मेरी दायीं तरफ एक हठी युवती बैठी हुई थी जो मुझे एक अंतहीन कहानी सुना रही थी और उसका एक शब्द भी मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा था। मैं सिर्फ हां हां करते हुए सिर हिला रहा था और लगातार इस बात पर हैरान हो रहा था कि मैं उनसे कहूंगा क्या। मुझे पता था कि बात मुझे ही शुरू करनी है और ये बात तो तय ही थी कि महात्मा तो मुझे नहीं ही बताते कि उन्हें मेरी पिछली फिल्म कितनी अच्छी लगी थी और इस तरह की दूसरी बातें। और मुझे इस बात पर भी शक था कि उन्होंने कभी कोई फिल्म देखी भी होगी या नहीं। अलबत्ता, एक भारतीय महिला की आदेश देती सी आवाज़ गूंजी और उसने उस युवती की बक बक पर रोक लगा दी: “मिस, क्या आप बातचीत बंद करेंगी और मिस्टर चैप्लिन को गांधी जी से बात करने देंगी?”
भरा हुआ कमरा एक दम शांत हो गया। और जैसे ही महात्मा के चेहरे पर मेरी बात का इंतज़ार करने वाले भाव आये, मुझे लगा कि पूरा भारत मेरे शब्दों का इंतज़ार कर रहा है। इसलिए मैंने अपना गला खंखारा। “स्वाभाविक रूप से मैं आज़ादी के लिए भारत की आकांक्षाओं और संघर्ष का हिमायती हूं,” मैंने कहा,”इसके बावज़ूद, मशीनरी के इस्तेमाल को ले कर आपके विरोध से मैं थोड़ा भ्रम में पड़ गया हूं।” मैं जैसे जैसे अपनी बात कहता गया, महात्मा सिर हिलाते रहे और मुस्कुराते रहे। “कुछ भी हो, मशीनरी अगर नि:स्वार्थ भाव से इस्तेमाल में लायी जाती है तो इससे इन्सान को गुलामी के बंधन से मुक्त करने में मदद मिलनी चाहिये और इससे उसे कम घंटों तक काम करना पड़ेगा और वह अपना मस्तिष्क विकसित करने और ज़िंदगी का आनंद उठाने के लिए ज्यादा समय बचा पायेगा।”
“मैं समझता हूं,” वे शांत स्वर में अपनी बात कहते हुए बोले, “लेकिन इससे पहले कि भारत इन लक्ष्यों को प्राप्त कर सके, भारत को अपने आपको अंग्रेजी शासन से मुक्त कराना है। इससे पहले मशीनरी ने हमें इंगलैंड पर निर्भर बना दिया था, और उस निर्भरता से अपने आपको मुक्त कराने का हमारे पास एक ही तरीका है कि हम मशीनरी द्वारा बनाये गये सभी सामानों का बहिष्कार करें। यही कारण है कि हमने प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य बना दिया है कि वह अपना स्वयं का सूत काते और अपने स्वयं के लिए कपड़ा बुने। ये इंगलैंड जैसे अत्यंत शक्तिशाली राष्ट्र से लड़ने का हमारा अपना तरीका है और हां, और भी कारण हैं। भारत का मौसम इंग्लैंड के मौसम से अलग होता है और भारत की आदतें और ज़रूरतें अलग हैं। इंगलैंड के सर्दी के मौसम के कारण ये ज़रूरी हो जाता है कि आपके पास तेज उद्योग हो और इसमें अर्थव्यवस्था शामिल है। आपको खाना खाने के बर्तनों के लिए उद्योग की ज़रूरत होती है। हम अपनी उंगलियों से ही खाना खा लेते हैं। और इस तरह से देखें तो कई किस्म के फर्क सामने आते हैं।”
गांधी की लोकप्रियता दिखाता एक कार्टून, 1931 का हिंंदुस्तान टाइम्स
मुझे भारत की आज़ादी के लिए सामरिक जोड़ तोड़ में लचीलेपन का वस्तुपरक पाठ मिल गया था और विरोधाभास की बात ये थी कि इसके लिए प्रेरणा एक यथार्थवादी, एक ऐसे युग दृष्टा से मिल रही थी जिसमें इस काम को पूरा करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति थी। उन्होंने मुझे ये भी बताया कि सर्वोच्च स्वंतत्रता वह होती है कि आप अपने आपको अनावश्यक वस्तुओं से मुक्त कर डालें और कि हिंसा अंतत: स्वयं को ही नष्ट कर देती है।
जब कमरा खाली हो गया तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं वहीं रह कर उन्हें प्रार्थना करते हुए देखना चाहूंगा। महात्मा फर्श पर चौकड़ी मार कर बैठ गये और उनके आस पास घेरा बना कर पांच अन्य लोग बैठ गये। ये एक देखने योग्य दृष्य था। लंदन के झोपड़ पट्टी वाले इलाके के बीचों बीच एक छोटे से कमरे के फर्श पर छ: मूर्तियां पद्मासन में बैठी हुईं। लाल सूर्य छतों के पीछे से तेजी से अस्त हो रहा था और मैं खुद सोफे पर बैठा उन्हें नीचे देख रहा था। वे विनम्रता पूर्वक अपनी प्रार्थनाएं कर रहे थे। क्या विरोधाभास है, मैंने सोचा, मैं इस अत्यंत यथार्थवादी व्यक्ति को, तेज कानूनी दिमाग और राजनैतिक वास्तविकता का गहरा बोध रखने वाले इस शख्स को देख रहा था। ये सब आरोह अवरोह रहित बातचीत में विलीन हो रहा प्रतीत हो रहा था। गांधी से अपनी मुलाकात के बारे में चैप्लिन इतना ही बताते हैं।
1931 की ये मुलाकात लोगों की नज़र में भले खत्म हो गई हो लेकिन विचारवान चार्ली ने इससे क्या सीखा वो 1936 में तब पता चला जब वो अपनी फिल्म मॉडर्न टाइम्स लेकर पेश हुए। चैप्लिन अपनी फिल्म में मशीनों और मशीनों के पाश में फंसी मनुष्यता की खिल्ली उड़ाते दिख रहे थे। चैप्लिन अपनी आत्मकथा में मानते हैं कि एक पत्रकार के साथ हुई उनकी बातचीत ने भी उन्हें मॉडर्न टाइम्स तक पहुंचने का रास्ता दिखाया। ये दूसरी बात है कि फिल्मों में अपने विषयों के चुनाव की वजह से लोग चैप्लिन के भीतर अब राजनीतिक रुझान ढूंढने लगे थे। पूंजीवाद के साथ कदम मिलाकर चल रहे अंधराष्ट्रवाद और साम्यवाद के बीच अपनी राह पर मस्त चलते चार्ली चैप्लिन को अमेरिका और इंग्लैंड की खुफिया एजेंसियों के राडार पर आना अभी बाकी थी।
क्रमश:
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