एक बच्चा जिसे सब भूल जाते हैं- प्रदीप

 

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एक गड्ढा है जिसमें वह गिर गया है और उसके साथ जो आया है, वह रुकता नहीं उसके लिए. जैसे कई बार आपके सपने में होता होगा, आप गिरते चले जाते होंगे कहीं गहरे और चीख़ते होंगे लेकिन आवाज़…! वह तो अंदर ही कहीं गोल घूम कर रह गयी है. या फिर आपके जीवन में मौजूद आपसे सबसे ज़्यादा प्यार करने का दावा रखने वाले सारे लोग बिल्कुल पास सामने ही खड़े हैं और आप चीख़ रहे हैं लेकिन वे यूँ मुस्कुराते हुए लगातार आपको देख रहे हैं जैसे उन्हें कुछ सुनाई नहीं दे रहा हो. जब अपनों को ही यूँ सुनाई और दिखाई देना बंद हो जाता है, तो एक शख्स के शुतू बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. कैमरा दिखा रहा है कि एक गड्ढा है लेकिन आप क्या बस उसे ही देख रहे हैं ? शुतू कहाँ गिरता चला जा रहा है वह भी तो देखिए.

वह ख़ुद से शर्मिंदा और ख़ुद में हीन एक व्यक्ति है जिसे यूँ तो ख़ुद से कोई दिक्कत नहीं, लेकिन जब आप उसे ललकारते हैं बिना बात बार बार कि वह ख़ुद को साबित करे आपके बराबर, तो आप उसकी रातों की नींद छीनकर उसे कमरों के कोनों में छुपकर रोने के लिए मजबूर कर रहे हैं. बहुत ज़रूरी है कि उसे सूक्ष्मता में देखा जाये.

जैसे एक भरे-पूरे परिवार में शाम को डिनर टेबल पर सबने खाना शुरू कर दिया और एक बच्चा जो कमरे में था इंतज़ार में कि मुझे बुलायेंगे अभी लेकिन उसे बुलाता नहीं कोई. सब भूल जाते हैं और यह भूलना इतना सहज होता है कि उसकी अनुपस्थिति कहीं दर्ज ही नहीं होती. वह आता भी है तो कोई हँसते हुए कहता है अरे तुम कहाँ रह गए थे, हमें ध्यान ही नहीं रहा. आपका भूल जाना और उसपर हँसना भी यक़ीन मानिए काफ़ी है उसे हमेशा के लिए आपसे दूर करने के लिए. एक बच्चा जिसे सब भूल जाते हैं, वह अकेले में बैठकर क्या सोचता है, यह सोचे जाने की ज़रूरत है. वह क्यों सहमा सहमा है. क्यों उसे हिचक रहती है इस बात कि बहुत ज़्यादा कि कहीं किसी का दिल न दुखा दे जबकि उसके आसपास के लोग जान बूझकर ऐसा आसानी से कर जाते हैं. क्या आप देख पाते हैं उसका असहज रहना.

 

ऐसा क्या होता होगा कि हमेशा अव्वल आने वाला कोई बच्चा अचानक फ़ेल होने लगता है. तब आप क्या करते हैं ? कान उमेठते हैं उसके. आप यह देख पाते हैं क्या कि वह चुप रहने लगा है और यह बात मैं यक़ीन से कह सकता हूँ कि यह अचानक नहीं होता. इससे भी बड़ा आघात यह होता है कि कोई पूछे ही नहीं कि कोई दिक्कत तो नहीं बच्चे ? अचानक कटा-कटा क्यों रहने लगा है, हमें बता. लेकिन किसी ने पूछा ही नहीं उससे. शुतू से नहीं, शायद किसी और से या शायद मुझसे.

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क्या आप पहचान पाते हैं उन लोगों को जो दुनिया में रहकर भी कभी उसका हिस्सा नहीं बन पाते. एक पुल होता है जोड़ने वाला अंदर और बाहर को, सब सामान्य रखता है. यदि वह पुल टूट जाए तो, या फिर कभी बना ही न हो, तो रस्साकशी चलती है एक निरंतर, जिसमें जीवन मथता चला जाता है. वह हर दृश्य में हैं लेकिन ठीक उसी समय ख़ुद को उस दृश्य से अलग करके देखने की क़ाबिलियत भी उसमें है और यही क़ाबिलियत उसको स्वयं में मुश्किल बनाती है. वह दिन रात एक संघर्ष में है, वह जूझ रहा है और उम्मीद कर रहा है कि कोई देखे और पहचाने. क्योंकि वह बताएगा क्या जब उसे ख़ुद समझ नहीं आ रहा कि दिक्कत है क्या. कौन सा दर्द है इतना चुप्पा जो चैन से जीने नहीं देता. एक दुनिया है उसकी जो बनती चली जाती है आपकी ही दुनिया के आसपास जिसमें शामिल हो पाती है तो सिर्फ़ वह बच्ची जो उसे वैसा ही स्वीकार करती है जैसा वह है, जिसके साथ वह सहज है.

उसे आप से घृणा है लेकिन वह कर नहीं पाता. प्यार आप उसे करने नहीं देते. वह ठुकराया जा रहा है लगातार. धीरे धीरे जो भी सब सही है ज़िन्दगी में, सब ख़त्म होता जाता है और वह अपनी ही नज़रों में ख़ुद के लिए इतना फ़ालतू हो जाता है कि बन्दूक का ट्रिगर दबाना भी असंभव काम नहीं लगता.

इस व्यवहार को अति-संवेदनशीलता कहना उस दर्द की शिनाख्त करने की कोशिश में एक अश्लीलता भर होगी जिससे वह गुज़र रहा है. कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके दिमाग़ में सोच के जंगल उग आये हैं जिनके पेड़ और पत्तियाँ लगातार एक दूसरे से टकराकर दर्द पैदा कर रहे हैं. उनमें लगने वाले फलों के स्वाद में भी दर्द भरा हुआ है. एक सामानांतर दुनिया में लगातार जीता हुआ वह आपकी दुनिया को समझ ही नहीं पा रहा है या समझ पा रहा है तो उससे होड़ नहीं कर पा रहा. लेकिन आप कहाँ मानेंगे, कहाँ उसे चैन से जीने देंगे यदि वह होड़ नहीं ले पाया तो.

उसे हर किसी की नज़रों में ख़ुद के प्रति हिकारत दिखती है, कुटिल मुस्कान दिखती है, उनके चेहरे पर लिखा दिखता है कि तुम आख़िर हो किस लायक और फिर उसके लिए सब निरर्थक हो जाता है. एक बार झाँक लिया जाता उसकी कातर निगाहों में, तो उन छुट्टियों की याद की तासीर अलग होती

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