जब अंग्रेज़ देश छोड़कर जा रहे थे तब आरएसएस कबड्डी खेलनेवाले हिंदू लड़कों के गिरोह से ज़्यादा कुछ नहीं था – Nitin Thakur

जब अंग्रेज़ देश छोड़कर जा रहे थे तब आरएसएस कबड्डी खेलनेवाले हिंदू लड़कों के गिरोह से बहुत ज़्यादा कुछ नहीं था। खेल के बहाने उनमें हिंदू पहचान का इंजेक्शन भरा जा रहा था। घर वाले संस्कार पढ़ाने और सेहत बनाने के लिए बच्चों को शाखा भेजते रहे और वही बच्चे वापसी में ‘कुछ अधिक हिंदू’ होने का दंभ दिमाग में भरे आते रहे। तब हिंदुओं का ठेकेदार अकेला संघ नहीं था.. और भी स्टेकहोल्डर थे जो पूर्व कांग्रेसी डॉ हेडगेवार जी से अधिक बड़े हिंदूवादी थे। इनमें से एक सावरकर भी थे। हेडगेवार से बहुत सीनियर और बहुत अधिक ज्ञानी। हिंदुत्व की राजनीति में अगर डॉक्टर साहब ग्रेजुएट थे तो सावरकर पीएचडी रखते थे लेकिन वो खुद संघ के नहीं हिंदू महासभा के अंग थे।

 

उन्हें कभी संघ नहीं भाया। वजह संघी आज भी बता नहीं पाएंगे। कई साल पहले जब मैं हिंदू राजनीति के संपर्क में आया तब अक्सर पश्चिमी यूपी के एक बड़े हिंदूमहासभाई मघानंद मुझे पत्र लिखा करते थे। उन्हें संघ से नफरत थी। लिखते थे कि संघ दोगला है, सत्तालोलुप है और मुस्लिमों के प्रति उसकी कोई एक नीति नहीं। महासभा जो कहती है कम से कम खुलकर कहती है। यहां तक कि गांधी की हत्या में संघ से ज़्यादा हाथ महासभा का माना गया।

Golwalker

नाथूराम ने दिल्ली की रवानगी से पहले अपने गुरू सावरकर का आशीर्वाद भी लिया था। अधिक जानकारी के लिए उनके छोटे भाई गोपाल गोड़से की किताब ‘गांधी वध क्यों’ और ‘गांधी वध और मैं’ पढ़ें। किताब पढ़कर भी आसानी से समझा जा सकता है कि सावरकर की भूमिका गांधी की हत्या में उतनी भी गौण नहीं थी जितनी बाद में सज़ा के डर से बना दी गई। आखिरकार ये वही ‘वीर’ सावरकर थे जिन्होंने बढ़ती सज़ा के डर से अंग्रेज़ों को माफीनामा लिख मारा था और बाद में बेइज्ज़त होने से बचने के लिए बहाने बनाए। सावरकर खुद अपनी मौत तक गांधी की हत्या में खुद को सार्वजनिक तौर पर दूर करते रहे जबकि अनुयायियों के सामने नायक बने रहे। एक बात बहुत साफ है।

बिना किसी चेहरे के ना कोई आंदोलन बड़ा होता है और ना ही कोई संगठन। संघ के पास अपना कोई ‘महापुरुष’ नहीं था। देश के स्वीकार्य महापुरुष अपने मूल में सर्वधर्म समभाव की भावना को मानते थे और खुद संघ उस विचार के उलट काम कर रहा था। ज़ाहिर है कि संघ ने उन महापुरुषों को देश का मानने के बजाय कांग्रेस खेमे का नायक अधिक माना। बाद में नायकों का टोटा पड़ने के चलते उसने ज़रूरत के मुताबिक दो काम किए। एक तो ये कि किसी समविचारी को जबरन नायकत्व ओढ़ा दो या फिर जिस शख्सियत को अपने खेमे का आदमी बताने की गुंजाइश निकले उसे प्रोपेगेंडा करके अपना महापुरुष घोषित कर दो। पहले वाली चाल सावरकर को हीरो बनाती है और दूसरी वाली में पटेल और भगत को फांसने की कोशिश चल ही रही है।

ये दीगर है कि खुद हिंदू महासभा विनायक सावरकर का नाम उतना कैश नहीं कर सकी जितना कि संघ ने किया जबकि सावरकर उस महासभा के नेता थे जिसे संघ कभी फूटी आंख नहीं सुहाया। आज भी महासभा संघ के खिलाफ जाकर बीजेपी के विरुद्ध अपने प्रत्याशी कई जगह उतारती है। लगे हाथ बता दूं कि गोरखपुर और उसके आसपास आज के यूपी सीएम ऐसे कई महासभाई प्रत्याशियों का बीजेपी के खिलाफ जाकर समर्थन करते रहे हैं।

Savarkar's Mercy Petition

जानकारी के लिए दिमाग लगाइए और ऊर्जा भी। हिंदू महासभा और गोरक्षधाम पीठ का पुराना संबंध रहा है क्योंकि दोनों ही संघ के मुकाबले बहुत पहले जम चुके थे। बहरहाल 1937 में हिंदू महासभा ही थी जिसने अजमेर में हिंदू और मुसलमानों को दो अलग राष्ट्र माना था। 1938 में अध्यक्ष भाई परमानंद ने खुलेआम जिन्ना से सहमति जताते हुए कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोला था जो उस वक्त धर्म के आधार पर किसी भी बंटवारे के खिलाफ ताल ठोके खड़ी थी इसलिए जिन्ना और महासभा दोनों को खटकने लगी थी। इस वाक्य में आप कांग्रेस से गांधी को भी रिप्लेस करके पढ़ सकते हैं। कालांतर में गांधी से नफरत और हत्या की वजह भी यही सब बनता गया। कुछ और बातें बाद में जुड़ ही गईं। दुख इस बात का है कि भारत का पहला आतंकवादी हिंदू निकला जबकि हिंदू बहुल भारत के आंगन में आतंक की कभी कोई जगह नहीं थी। सावरकर उस आतंकवादी के गुरू थे और ये बात खुलकर और छिपकर हर तरह से हमेशा मानी गई। गांधी लाख बुरे हों मगर कभी खून नहीं बहाया। गांधी की हत्या में सक्रिय या मूक सहमति किसी को भी हिंदुस्तान की नज़रों में गिराने के लिए काफी है। मैं नहीं जानता कि सावरकर या गोड़से को पलक पर बैठाने से आप कितने बड़े हिंदू साबित होते हैं, मगर कम से कम सच्चे हिंदुस्तानी तो बचे नहीं रह सकते।
#इतिइतिहास

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