आपको ढेर सारा प्यार और ख़ूब ताकत मिलती रहे तीस्ता – Ila Joshi

प्यारी तीस्ता,
ये आपके लिए:
लगभग 3 साल पहले जब पहली बार तीस्ता से आमना सामना हुआ तो मैं बस उन्हें सुनना चाहती थी, कि जितना अभी तक
अख़बार की ख़बरों में उनके बारे में पढ़ा या टीवी पर देखा उससे इतर वो क्या हैं। और अब 3 साल बाद ये किताब पढ़ी तो
इस बीच की सारी मुलाक़ातों और अनुभवों के बाद भी लगा कि कितना कुछ जानने को बाकी है। ये किताब तीस्ता का सफ़र
है जिसमें बहुत से क़िरदार हैं, बहुत से अनुभव हैं, जितने अच्छे उतने ही बुरे भी, जितने ख़ूबसूरत उतने ही भयावह भी।
तीस्ता का नाम जिस किसी ने भी पहली बार 2002 या उसके बाद सुना या पढ़ा वो लोग उनकी भूमिका सिर्फ़ गुजरात दंगों
के परिप्रेक्षय में देखते हैं। उन सभी लोगों के लिए ये किताब पढ़ना और भी ज़रूरी हो जाता है ताकि राष्ट्रवाद की धूल हटाकर
राष्ट्र के लिए ज़रूरी लोगों को भी जान सकें।
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तीस्ता के तीस्ता बनने की कहानी है Foot Soldier of the Constitution, और जैसा नाम से ही साफ़ है उनकी इस
भूमिका की वजह से मौजूदा परिस्थितियों में पहले से भी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ भी रही है। गुजरात दंगों से भी बहुत
पहले से ही तीस्ता, उनके साथी और उनका संगठन (Citizens of Justice and Peace) दंगा प्रभावित इलाकों और
उनके लोगों के लिए काम करते रहे हैं। लेकिन जिस तरह से गुजरात दंगों के बाद कुछ ख़ास तरह के लोगों द्वारा उनके काम
और विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए उससे साफ़ होता है कि लड़ाई इस बार बेहद चालाक और घाघ किस्म के लोगों से है।
एक ही किताब में जहाँ ज़किया जाफ़री, बिलकिस बानो के संघर्ष की कहानी है वहीँ माया कोडनानी और ज़ाहिरा शेख़ जैसे
किरदार भी हैं। और यही तीस्ता के संघर्ष का सार भी है, कि कैसे जीवन के अनुभव कई बार दो ध्रुव पर खड़े होते हैं।
हालांकि हर पीढ़ी और समय को तीस्ता जैसे लोगों की ज़रूरत होती है लेकिन मौजूदा समय में तीस्ता का होना बहुत हिम्मत
देता है। ये भीड़ की सत्ता का समय है, जहां भीड़ ही सत्ता और न्यायपालिका चलाने के अधिकार छीन रही है और ऐसे में
तीस्ता, उनके साथी और उनका संगठन भीड़ को कटघरे में खड़ा करने की ज़ुर्रत करते हैं। जिन लोगों के लगता है कि हम
एक लोकतंत्र और सेक्युलर देश हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि जो भी थोड़ा बहुत लोकतंत्र और सेक्युलर देश बचा है वो
तीस्ता जैसे लोगों के वजह से ही है। और जैसा किसी ने कहा था कि, “You can love your country without
loving your government”, बस इतनी सी बात समझने की ज़रूरत है।
देश में कुछेक संगठनों की ज़रूरत सरकार के काम को मॉनिटर करने की होती है, जिसमें सांप्रदायिक सौहार्द, मौलिक
अधिकार, सूचना के अधिकार, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यकों और मानवाधिकार, क़ानूनी सहायता आदि जैसे मुद्दों पर
सरकार की जवाबदेही तय करना भी आता है। ऐसे में CJP जैसे संगठन जो सरकार को उसकी नाकामी पर सवाल करते हैं,
कटघरे में खड़ा करते हैं, लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करते हैं, वो तो सरकार की आँख की किरकिरी
बनते ही हैं।
ये किताब शुरुआत से लेकर अंत तक हमें तीस्ता से मिलवाती है और बताती है कि सच सिर्फ़ उतना नहीं जितना हमें अभी
तक मालूम है। कि कैसे दंगा पीड़ितों के लिए न्याय की हर कोशिश करने वाली तीस्ता अपनी माँ होने की ज़िम्मेदारी के साथ
भी न्याय करती हैं। कि कैसे तमाम तक़लीफ़ों, अनिश्चितताओं के बावजूद वो सुनिश्चित करती है कि कोई लड़ाई अधूरी न रह
जाए।
मैंने ये किताब 10 दिन पहले पूरी पढ़ ली थी लेकिन अब भी बार बार वापस जाती हूं और सोचती हूं कि हम जो रोज़मर्रा की
तक़लीफ़ों से भी बेहद परेशान हो जाते हैं उन्हें शर्म आनी चाहिए। मैंने हमेशा तीस्ता को मुस्कुराते देखा है, उन दिनों भी जब
मौजूदा सरकार का सरकारी तोता अपनी सरकार के लिए उनसे हर रोज़ पूछताछ करता था।
ऐसी किताबें सिर्फ़ कुछ घटनाओं को दर्ज़ करने के लिए ही ज़रूरी नहीं है बल्कि वो उन लोगों और उनके संघर्ष, उनकी
जीवटता को दर्ज़ करने के लिए ज़रूरी है जिन्हें भविष्य में याद रखना उन घटनाओं को याद रखने से थोड़ा ज़्यादा अहम है।
आपको ढेर सारा प्यार और ख़ूब ताकत मिलती रहे तीस्ता…प्यार
प्यार,
इला
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