पचास दिन पचास रात – बोधिसत्व

 

यह बड़ी पुरानी बात है
कोसल का एक राजा था
एक दिन राजा ने उद्बोधन किया

प्रिय प्रजाजनों
प्रिय संत जनों
राष्ट्र हित में
बस पचास दिन और पचास रात
जो देता हूँ वह दुख सहन करो

वह राजा था इसलिए
उद्बोधन कर सकता था
दुख सुख सब कुछ दे सकता था

भक्त प्रजा ने भजन किया
बस पचास दिन और पचास रात
प्रजा थी तो कर सकती थी
भजन भी
और सहन भी।

जब इक्यावनवाँ दिन आया
राजा ने फिर
नगर ग्राम वीथियों में उद्घोषित करवाया
यदि हो राष्ट्र और राजा से प्रेम तो
सहन करो राष्ट्र राष्ट्र भजन करो
बस कुछ और दिन कुछ और रात
तब तो बनेगी कोई बात

अब प्रजा को कुछ कुछ
समझ में आया
न बनी है न बनेगी इस राजा से कोई बात

राजा था बकता आंय बांय
परजा करती थी सांय सांय

फिर भक्त प्रजा भी ठीक से समझ गई
और जैसे ही प्रजा ने समझा कहीं से
अचानक एक गोली चल गई
फिर दनादन चलने लगीं गोलियाँ

और गोलियाँ चलती थीं तो लगती थीं
गोलियाँ लगती थीं तो लोग मरते थे
प्रजा मर सकती थी
इसलिए मरती रही
गोलियाँ चल सकती थीं तो चलती रहीं

फिर अपने स्वभाविक रूप से प्रजा के सन्न होने तक
चलती रहीं गोलियाँ
कई दिन कई रात

फिर छिटपुट लगी आग
फिर यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ
कई दिन कई रात
लगी रही आग…..

जैसा भी था जितना था राष्ट्र का आकाश
उस पर छा गई
राख से भरी सुनहरी रात
फिर भी बनी नहीं बात

ऐसे ऐसे करके बीत गए कितने पचास दिन
और ऐसे ऐसे करके बीती कितनी पचास रात

वैसे इस घटना से आज का क्या लेना देना
यह तो है बड़ी पुरानी बात

जिसे तब कोटि कोटि आँखें रहीं ताकती
और देखते-देखते
राख हो गए कितने दिन
धूँ धूँ करके सुलगी रात।

ऐसी घटना से
हमको क्या और तुमको क्या
इनको क्या और उनको
उसको क्या और इसको
जब हर एक बात बेमानी
तुम भी सुनों कहानी
हम भी सुनें कहानी।

बोधिसत्व, मुंबई

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