चैनलों को ‘सिंगल आउट’ करके मीडिया को यह संकेत दिया गया है कि उन्हें ‘समय के साथ’ कैसे चलना चाहिए! – QW Naqwi

असम के भी एक चैनल पर एक दिन की रोक लगायी गयी है.
यात्रा पर हूँ, इसलिए देर से लिख रहा हूँ. हालाँकि देखा कि इस मुद्दे पर सोशल मीडिया में ज़्यादा कुछ नहीं कहा गया.
लेकिन मामला गम्भीर है और NDTV के मामले की ही अगली कड़ी है.
अब यह साफ़ हो गया है कि जिस तरह की ‘संवेदनशील’ जानकारियाँ उजागर करने के लिए NDTV पर कार्रवाई की गयी, वह सारी जानकारियाँ अख़बारों और वेबसाइटों में 48 से 24 घंटे पहले ही आ चुकी थीं. NDTV के प्रसारण के ठीक पहले सेना की प्रेस कान्फ्रेन्स में सार्वजनिक तौर पर लगभग वही जानकारियाँ दी गयी थीं. लेकिन सरकार ने निशाना सिर्फ़ NDTV को बनाया.
असम के न्यूज़ चैनल पर बैन किसी राष्ट्रीय सुरक्षा के कारण नहीं लगाया गया है. उसका दोष यह है कि एक उत्पीड़ित नाबालिग़ घरेलू सहायक की रिपोर्ट दिखाते समय चैनल ने उसकी पहचान उजागर कर दी थी. जब सरकार ने चैनल पर कार्रवाई की, तो चैनल ने सरकार को बताया कि ऐसी ही कवरेज दूसरे न्यूज़ चैनलों ने भी की है. इस पर मामले की दुबारा पड़ताल की गयी. बाक़ी चैनलों को चेतावनी दे कर छोड़ दिया गया, लेकिन इस चैनल पर कार्रवाई की गयी क्योंकि इस पर दो और आरोप थे. एक आरोप था शव के वीभत्स विज़ुअल का और दूसरा आरोप था कि चैनल के एक कार्यक्रम में महिलाओं को लेकर अशोभनीय प्रस्तुतीकरण करने का. चैनल को इन तीनों मामलों में एक-एक दिन के बैन की सज़ा मिली, लेकिन यह तीनों सज़ाएं एक साथ चलेंगी, इस तरह चैनल पर एक दिन का बैन लगेगा.
सवाल यहाँ भी यही है कि बाक़ी चैनलों पर उसी फ़ुटेज दिखाने पर वैसी कार्रवाई नहीं हुई, जैसी एक चैनल पर हुई.
सही है कि जो तीन आरोप चैनल पर लगे हैं, वह अगर सही हैं तो चैनल ने ग़लत किया और उस पर कार्रवाई होनी चाहिए. मैंने वह कंटेंट देखा नहीं है, जो इस चैनल ने चलाया, इसलिए कह नहीं सकता कि क्या ये मामले वाक़ई इतने गम्भीर थे कि ‘बैन’ जैसी कार्रवाई की जाये!
जो ख़बरें छपी हैं, उसके मुताबिक़ महिलाओं से सम्बन्धित कार्यक्रम के लिए चैनल को सरकार की ओर से निर्देश दिया गया था कि वह खेद व्यक्त करे और क्षमा माँगे. लेकिन चैनल ने ऐसा नहीं किया. तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई क्या केवल इसी कारण की गयी?

ज़ाहिर है कि कार्रवाई करने के मामले में चैनलों को ‘सिंगल आउट’ करके मीडिया को यह संकेत दिया गया है कि उन्हें ‘समय के साथ’ कैसे चलना चाहिए!

इसलिए NDTV और असम, यह दोनों मामले समान रूप से गम्भीर हैं. और अगर यह सिलसिला ऐसे ही जारी रहा तो कहीं रुकेगा भी नहीं.

मुद्दे की बात यह है कि मीडिया के लिए एक नियामक तंत्र होना चाहिए, क्योंकि मीडिया ग़लती करे या ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हरकत करे, तो उसकी नकेल तो कसी ही जानी चाहिए. निरंकुश स्वतंत्रता किसी के लिए भी अच्छी नहीं है, मीडिया के लिए भी नहीं.

लेकिन मीडिया नियमन का तंत्र हर प्रकार से स्वतंत्र, सरकारी और राजनीतिक दख़ल से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए, यह सबसे ज़रूरी शर्त है. नियमन तंत्र दो हिस्सों में अलग-अलग होना चाहिए. मीडिया कारोबार के लिए अलग और कंटेंट के लिए अलग. दूसरी बात यह कि प्रिंट और टीवी के लिए अलग-अलग नहीं, बल्कि प्रिंट, टीवी, वेब सबको मिला कर एक मीडिया काउंसिल जैसी चीज़ होनी चाहिए. इसका स्वरूप क्या हो, अधिकार क्या हों, यह विस्तार से चर्चा और बहस का विषय है.

लेकिन लगातार बढ़ते मीडिया के लिए कोई सक्षम, स्व-नियमन के सिद्धाँत पर काम करनेवाला, सरकारी या राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त और स्वतंत्र नियामक तंत्र होना चाहिए.

मीडिया नियमन का काम सरकार के ज़िम्मे छोड़ने के नतीजे घातक होंगे, सरकार चाहे जिस भी पार्टी की हो.

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