थोक में पकडऩा, फिर कुछ को छोड़ देना मुसलमानों के खिलाफ एनआईए की मनोवैज्ञानिक युद्ध रणनीति का हिस्सा

लखनऊ 2 जुलाई 2016। रिहाई मंच ने हैदराबाद से आतंकी संगठन आईएस से कथित तौर पर जुड़े बताकर पकड़े गए तेरह युवकों में से पांच को गिरफ्ततार दिखाते हुए बाकियों को छोड़ने को एनआईए की मुसलमानों के खिलाफ हाल के दिनों में तैयार मनोवैज्ञानिक हमले की रणनीति का प्रयोग बताया है।

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मोहम्मद शुऐब ने कहा है कि हैदराबाद में जिस तरह पकड़े जाने के दौरान ही इंडियन एक्सप्रेस समेत कुछ अखबारों से एनआईए के हवाले से ही यह कह दिया गया था कि इनमें से सिर्फ चार को ही गिरफ्तार दिखाया जाएगा और बाकी को छोड़ दिया जाएगा, वो पूरे घटनाक्रम को संदिग्ध बना देता है। उन्होंने सवाल किया कि आखिर जब ये आईएस जैसे खतरनाक आतंकी संगठन से जुड़े तत्व थे तो फिर चंद घंटों की पूछताछ में ही कैसे तय कर लिया गया कि इनमें से सिर्फ कुछ को ही गिरफ्तार दिखाया जाएगा और बाकी को छोड़ दिया जाएगा। उन्होंने पूछा कि विवेचना में अगर एनआईए या पुलिस को किसी के किसी षडयंत्र में शामिल होेने या ना होेने के कुछ सबूत हाथ आते भी हैं तो उसे कम से कम मीडिया के समक्ष तो तत्काल ही नहीं रखा जाता। कम से कम इस स्तर की जानकारी तो मीडिया को नहीं ही दी जाती है कि इनमें से कितने लोगों को गिरफ्तार दिखाया जाएगा और कितनों को छोड़ दिया जाएगा। यह निर्णय काफी गोपनीय होता है लेकिन इस मामले में तो खुद मीडिया को ब्रीफ करके बता दिया गया था कि इनमंे से चार को गिरफ्तार दिखाया जाएगा और बाकी को छोड़ दिया जाएगा, जो पूरे मामले में एनआईए की प्रोफेशनल भूमिका को ही कटघरे में खड़ा कर देता है और इस बात की सम्भावना को पुष्ट करता है कि यह किसी आतंकी नेटवर्क को ध्वस्त करने से ज्यादा मुसलमानों को आतंकित करने का नाटक था।

रिहाई मंच अध्यक्ष और आतंकवाद के आरोप से कई बेगुनाहों को बरी करवाने वाले वकील मोहम्मद शुऐब ने कहा कि खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों पर    मुसलमानों को आतंकवाद के आरोप में फंसाने के लग रहे आरोपों से निपटने के लिए उनके द्वारा इस नई रणनीति को अपनाया जा रहा है। जिसे यूरोप से आयातित किया गया है। इसके तहत पहले तो थोक में नौजवान पकड़े जाते हैं फिर उनमें से धीरे-धीरे कुछ रेडिक्लाइज्ड तो कुछ हाइली रेडिकलाइज्ड बताते हुए मनोचिकित्सक से काउन्सलिंग करा कर छोड़े जाते हैं और कुछ को आरोपी बनाकर जेल में सड़ने के लिए डाल दिया जाता है। ऐसा करके सुरक्षा एजेंसियां पहले चरण में मुसलमानों में डर और दहशत फैलाकर उन पर प्रेशर बनाती हैं। दूसरे चरण में धीरे-धीरे उन्हें रेडिकल बताकर छोड़ने की प्रक्रिया में प्रेशर रिलीज करती हैं। इस तरह सुरक्षा एजेंसियां बहुसंख्यक गैरमुस्लिम समाज में मुसलमानों के आतंकी होने का हौव्वा भी पैदा कर लेती हैं और कुछ को छोड़ कर मुसलमानों में भी अपने प्रति सहानुभूति पैदा करती हैं और मुस्लिम समाज को खुद ही अपने युवाओं के कथित तौर पर रेडिक्लाइज्ड होने के लिए जिम्मेदार भी साबित कर देती हैं जिससे उनमें आपराधबोध भी पैदा होता है। जबकि पहले खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां थोक में मुसलमानों को पकड़कर अपने प्रति संशय और गुस्सा उत्पन्न कर देती थीं। इस पूरे खेल के बीच मुसलमान युवकों में डीरेडिकलाइजेशन का भी एक बड़ा बाजार निर्मित होता है जिसे सरकार पोषित कुछ कथित धर्मगुरू और एनजीओ संचालित करते हैं।

रिहाई मंच अध्यक्ष ने कहा कि हैदराबाद से पहले दिल्ली और सहारनपुर में दिल्ली स्पेशल सेल ने यही रणनीति अपनाई थी जिसकी शुरूआत मुम्बई में हाइली रेडिक्लाइज्ड के नाम पर कुछ नौजवानों की गिरफ्तारी और फिर मनोचिकित्सक से काउंसिलिंग करा कर उनके छोड़े जाने में हुई थी। उन्होनंे कहा कि मुसलमानों और इंसाफ पसंद अवाम को खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के इस नए मुस्लिम विरोधी युद्ध रणनीति को समझना होगा, तभी इसका मुकाबला किया जा सकता है।

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