सुबह सवेरे – Neelabh Ashk

सुबह सवेरे – 1

इधर कुछ दिनों से, जब से हमने लम्बी बीमारी के बाद किसी क़दर सेहतयाब होने की तरफ़ क़दम बढ़ाना शुरू किया है, हम अपने मकान के चौबारे में कुर्सी पर बैठ कर मंजन करते हैं. वक़्त चार का भी हो सकता है, इससे कुछ आगे-पीछे का भी. फिर उठ कर ज़िन्दगी के कारोबार शुरू करने के लिए हिम्मत बांधते हुए हम साने नज़र आते ख़ामोश नज़ारे को देखते हैं.
निहायत ही सुकून-आमेज़ फ़िज़ा. पीली रौशनी सुनहरे सफ़ूफ़ की तरह झरती हुई और नज़ारे में दिल्ली के दिल में कानपुर, फ़तेहपुर, इलाहाबाद के आऊटर की बस्तियों जैसा बनाती हुई. और दिल में दुख पैदा करती हुई कि यह रहने वाला नहीं है, कुछ साल बाद अपर्ट्मेण्ट और फ़्लैट इस सुकून-आमेज़ फ़िज़ा की जगह ले लेंगे, आंख में चुभने वाली सुफ़ैद, सस्ती सी.एफ़.एल.ए साथ, जो हमें यकसर नापसन्द है.

आज हम कुछ देर और बैठे रह गये. वजह एक मंज़र. सबसे ऊंचे पेड़ के ऊपर लगे बल्ब की रौशनी नीचे की पत्तियों के कसे हुए झुरमुट पर यूं पड़ रही थी, कि एक पुरुष का चेहरा उभर रहा था. इतना साफ़, मानो किसी ने सोच कर बनाया हो. 35-40 की उम्र, भरा-भरा चेहरा कामुकता का आभास देता हुआ, होंट गोल, मानो सीटी पर कोई धुन बजाते हुए, जिसकी वजह से दोंनों गाल फूले हुए. आंखों पर नफ़ीस काला चश्मा. देर तक बैठा इस नज़ारे का आनन्द लेता रहा. तब तक पूरब के करोबारी का काम जारी था. हमने भी लम्बी सांस भरी और उठ खड़े हुए.

सुबह सवेरे – 2

एन.डी.पी.एल., नासपीटी, ख़ुदा की मार तुझ पर, तेरा कदी भला ना होवे.

आज जब हम सारे कील-कांटे दुरुस्त करके, अपने सेमी-प्रोफ़ेशनल निकोन कैमरे की बैटरी चार्ज करके और 16 जी.बी. का मेमरी कार्ड फ़ौरमैट करके, पूरी तैयारी के साथ अपने चौबारे पर पहुंचे तो बिजली कम्पनी का वह सारा रहस्यमय जादूई तिलिस्म सिरे से नापैद था. हमारा सीटी बजाने वाला विलासी छैला अगल-बग़ल के जाने किन दो अज्ञातकुलशील सायों से राह-रस्म बढ़ाये बैठा था. ख़ैर, क़िस्सा-कोताह यह कि तबियत काफ़ी झन्त हुई. माफ़ कीजिये, ख़ालिस इलाहाबादी ज़बान का लफ़्ज़ है, अपने जज़्बात और ख़यालात ज़ाहिर करने में जिससे बेहतर और कोई ज़बान नहीं, गो मण्टो ने “शहीदसाज़” के मुख्य किरदार से काठियावाड़ी के बड़े गुन गवाये हैं. मगर जनाब ऐसे नाज़ुक मौक़े पर ज़बानों का झगड़ा क्या ? इलाहाबादी हो या काठियावाड़ी !

हम मुंह लटकाये मंजन करते रहे और पूरब की जानिब हसरत-भरी निगाहों से ताकते रहे. धुर पूरब में, क्षितिज पर हल्की-ह्ल्की लाली छिटकी हुई थी. हमें नवीं क्लास में पढ़ी अंग्रेज़ी की लोकोक्ति याद आयी — “रेड स्काई ऐट मौर्निंग, शेपहर्ड्स वौर्निंग / रेड स्काई ऐट नाइट, शेपहर्ड्स डिलाइट.” यानी सुबह आसमान में लाली हो तो गरेड़ियों को होशियार रहना चाहिये, आंधी-पानी के आसार हो सकते हैं. अल्बत्ता, शाम के वक़्त लाली हो तो गरेड़ियों के लिए फ़िक्र की कोई बात नहीं.

हम समझ गये कि हमें नवीं क्लास की वादियों में ले जा कर हमारा अवचेतन हमारी ख़ातिर दिलासे का इन्तेज़ाम कर रहा है. दिमाग़ी लौलीपौप !

अभी हम उठने वाले थे कि स्मृति के जाने किस गह्वर से दो और वाक़ये उबर आये, जिनमें से एक तो बिलकुल मौज़ूं था. हुआ यह कि 1936 के आस-पास की बात है, क्लौड फ़ेट्रिज नाम के रेडियो इन्जीनियर ने देखा कि दक्षिणी कलिफ़ोर्निया के सान जुआन कैपिस्ट्रानो मिशन से अबाबीलों के झुण्ड-के-झुण्ड हर साल 23 अक्तूबर को अपने शीतकालीन दक्षिणी प्रवास पर रवाना होते हैं और 19 मार्च को लौटते हैं. लिहाज़ा क्लौड फ़ेट्रिज को ख़याल आया, क्यों न इस उड़ान को रेडियो पर सारे देश के लिए प्रसारित करके एक इवेण्ट बना दिया जाये. चुनांचे, उन्होंने अपनी कम्पनी के आगे प्रस्ताव रखा. कम्पनी के अफ़सर राज़ी हो गये और काफ़ी ख़र्च करके मिशन पर सारे उपकरण लगा लिये गये. आख़िरकार, 23 अक्तूबर का दिन भी आ पहुंचा. सारा देश सांस रोके अबाबीलों के परों के सामूहिक फड़फड़ाने की आवाज़ सुनने का इन्तज़ार कर रहा था. पता चला कि अबाबीलें उस साल शुद्ध नटखटपने में एक दिन पहले ही रवाना हो गयी थीं. आप कल्पना कर सकते हैं कि मियां फ़ेट्रिज पर क्या बीती होगी.

बस यहीं से फ़ेट्रिज का नियम बना कि कोई बात उस समय नहीं होगी जब आप उसकी ताक में होंगे और जब आपको किसी बात का इम्कान भी न होगा तो वह घटित हो जायेगी. मसलन आपके बेटे ने “पापा” कहना सीख लिया और दिन भर “पापा, पापा” की रट लगाये रखता है. शाम को कोई पारिवारिक मित्र आते हैं. आप सिर पट्क कर रह जाते हैं कि बेटे बोलो “पापा” और बेटे जी हैं कि दुनिया-भर की आवाज़ें निकालते हैं, मगर “पापा” कह कर नहीं देते. फिर जैसे ही मेहमान दहलीज़ के बाहर क़दम रखते हैं, बेटे राम आपको देख कर बड़े प्यार से कहते हैं — “पापा”

दूसरा वाक़या भी कम मज़ेदार नहीं, मगर कल.

(सुबह इण्टर्नेट ने बहुत धोख द
दिया इसलिए सुबह की पोस्ट शाम को.)

सुबह सवेरे -३
एसके के लिए
Eskay Sharma
——————

प्यारे एसके,
मेरे मामूली-से पोस्ट पर कुछ दिन पहले “Nature sanctifies” जैसे शब्द लिख कर तुमने दिमाग़ में ख़यालों की ऐसी हलचल पैदा कर दी है, जैसी आदिम सागर (primeval sea) में तत्वों के सिलसिले की शक्ल में रही होगी. बहरहाल, जो ख़यालों का सिलसिला शुरू हुआ, मैं तब से रह-रह कर उसी के बारे में सोचता रहा. क्या सचमुच प्रकृति sanctify करती है ? सैन्क्टिफ़ाई जिसके अनेक अर्थ और अभिप्राय हैं — पवित्र करना, शुद्ध करना, पाप-मुक्त करना. क्या प्रकृति के पीछे कोई “सोचने वाली” शक्ति है ? क्योंकि ये तीनों क्रियाएं अकर्मक नहीं हैं ?

क्य तुमने सोचा है कि आज से लाखों साल पहले जब आदिम प्रागैतिहासिक सागर में तत्वों की ज़बरदस्त हलचल चल रही थी, तब वह कौन-सी रहस्यमय प्रक्रिया थी जिससे “प्राण” अस्तित्व में आया. और अस्तित्व में ही नहीं आया, उसने कालान्तर में लाखों रूप ग्रहण किये ? क्या कुदरत जब “प्राण” नामक इस चीज़ को पैदा कर रही थी, तब क्या वह “सोच” रही थी ? किसी योजना के तहत “पवित्र करना, शुद्ध करना, पाप-मुक्त करना” जैसे कर्म “प्राण’ से जुड़े हैं ?जबकि हम जब कुदरत के आहार-क्रम को देखते हैं तो हमें लाखों “प्राण” दीगर “प्राणों” को खाते दिखायी देते हैं और इसके पीछे कुदरत का महज़ एक उद्देश्य है — कोई “प्राण” अस्तित्व न खो बैठे. यह तो हम हैं, जिन्होंने प्रकृति पर “सोच” जैसी चीज़ आरोपित कर दी है, जबकि प्रकृति को इससे कोई वास्ता नहीं. भूख लगने पर छिपकली कीड़े का शिकार करेगी ही करेगी, वह रुक कर यह नहीं सोचेगी कि वह “प्राण” नष्ट कर रही है.

एक क़दम और आगे बढ़ें, एसके, क्या तुमने सोचा है कि प्रकृति का दूसरा अटल नियम कौन-सा है ? “प्राण” को हर क़ीमत पर बचाये रखना ! ग़ौर से देखोगे तो दोनों नियमों में कोई अन्तर्विरोध नहीं है. हम इसे दूसरे शब्दों में कहते आये हैं — कुदरत अपनी प्रजाति को हर क़ीमत पर जीवित रखती है. पहली बात तो यह है कि उसने प्रजनन के “मौसम” तय कर दिये हैं. दुनिया के 99 फ़ीसदी जीव नियत समय पर एक-दूसरे से सम्भोग करते-ही-करते हैं ताकि प्रजाति जारी रहे. सिर्फ़ इतना ही नहीं, कुदरत ने प्रजनन-प्रक्रिया में बेपनाह लज़्ज़त भर दी है, ताकि हर तरफ़ से हर प्रजाति के जीवों का परस्पर सम्भोग सुनिश्चित रहे. इसके अलावा कहीं कोई चूक न रह जाये, प्रकृति ने इफ़रात के उसूल से काम लिया है. एक-एक बीज से लाखों बीज निकलते हैं. इस तरह कुदरत पक्का करती है कि कुछ बीजों के अनुर्वर निकल जाने या अनुकूल स्थितियां न पा कर बंजर साबित हो जाने, या उस बीज के किसी शिकारी द्वारा खा लिये जाने पर भी प्रजाेति चलती रहे और ये बीज अपनी मंज़िल तक पहुंचें इसके लिए वह कच्चे बीज के साथ उसका आहार एक आवरण के रूप में रख देती है और इसी के समाप्त होन्र पर अंकुर निकलता है. तो समझे प्यारे एसके, ग़ालिब के शब्दों में —

दाम-ए-हर मौज में है हलक़:-ए-सद-काम-ए-नहंग
जाने क्या गुज़्रे है क़तरे पे गुहर होने तक

(हर लहर के जाल में एक-एक दायरा/घेरा है जिसमें सौ मुंह वाले मगरमच्छ मुंह बाये मौजूद हैं, क़तरे/बीज को ज़िन्दा बच निकलने तक जाने क्या-क्या मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा ?)

आज बस. कल हम प्रकृति के इन अटल नियमों के ख़िलाफ़ मनुष्य के संघर्ष के कुछ ब्योरों पर नज़र डालेंगे और यह सब तुम्हारे उन अबोध, दो शब्दों — Nature sanctifies –की बदौलत.

 

(Photo Courtesy: Mukul Dube)

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