आपके पास असल में कुछ भी नहीं है. ना सब्जी ना गेहूं ना मछली ना दूध ना सोना ना हीरा – Himanshu Kumar

आप शहर में रहते हैं ! आप अमीर हैं. लेकिन ध्यान से देखिये आपके पास असल में कुछ भी नहीं है. ना सब्जी ना गेहूं ना मछली ना दूध ना सोना ना हीरा . आपके पास सिर्फ कागज का रुपया है .आपने कागज के रूपये खुद ही छाप लिये .इस कागज का एक काल्पनिक मूल्य है . जैसे कि एक सौ रूपये के बदले कितना सब्जी,गेहूं ,मछली, दूध ,सोना ,हीरा मिलेगा आदि .

Soni

अब इन कागज के रुपयों को अगर कोई सब्जी,गेहूं ,मछली, दूध ,सोना ,हीरा से ना बदले तो आप के कागज़ी रूपये की कीमत जीरो है . और तब आप अचानक एकदम गरीब हो जायेंगे . इसलिये जब कोई आपका रुपया अपनी असली सम्पत्ति से बदलने से इनकार करता है तो आप उसे मजबूर करने के लिये अपने हथियारबंद सिपाही भेजते हैं . जैसे बस्तर में आदिवासियों ने अपनी असली दौलत ज़मीन को आपकी नकली कागज़ी दौलत से बदलने से मना किया तो आपने अपनी सेना आदिवासियों को मारने के लिये भेज दी .

गाँव गाँव में असली दौलत के मालिक किसानों पर आपकी सेना इसी नकली दौलत को स्वीकार कराने के लिये हमला कर रही है. इसे ही आप मुक्त अर्थव्यवस्था कह्ते हैं . लेकिन यह पूरी तरह से बन्दूक के दम पर ही चलाई जा सकती है . क्योंकि यह पूरी तरह अवैज्ञानिक अर्थव्यवस्था है . आपके पास इसे सही सिद्ध करने के लिये कोई तर्क नहीं है . इसलिये आप इस व्यवस्था को चुनौती देने वाले विचार को आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ी चुनौती कह्ते हैं .

Himanshu

आप पहले तो बंदूक के दम पर लोगों से असली दौलत छीन लेते हैं . फिर आप उन्हें अपने कागज़ी रुपयों के लिये काम करने को मजबूर स्तिथी में ले आते हैं . लोग आपके कागज़ी रूपये के बदले काम करें इसी में आपकी इस व्यवस्था का जीवन है .

यह व्यवस्था करोड़ों किसानो , मछुआरों , खनिकों , मजदूरों की व्यवस्था नहीं हो सकती . यह लुटेरी व्यवस्था है. यह हथियारों के बल पर ही चल सकती है . यह कभी भी अहिंसक नहीं हो सकती . यह कभी भी लोकतांत्रिक नहीं हो सकेगी . इसमें से गरीबी . गैरबराबरी , युद्ध विनाश ही निकलेगा .

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