जेल के नाम रवीश कुमार का एक प्रेम पत्र

प्रिय जेल,

चौंक गई ! क्या जेल को प्रिय नहीं पुकारा जा सकता । जब हम प्रेम में गिरफ़्तार हो सकते हैं तो जेल से प्रेम क्यों नहीं कर सकते । लोगों ने जेल से किताबें लिखीं, जेल में रहते हुए पुत्री के नाम पत्र लिखे लेकिन किसी ने जेल को पत्र नहीं लिखा । दुनिया में जेल को प्रिय पुकारने वाला प्रथम पुरुष मैं ही हूँ ।  हिरासत की विरासत क्या कम है कि कोई तुमसे हमेशा हिक़ारत से ही देखे । अच्छा बताना तुम्हें हवालात क्यों कहा जाता है ? क्या वहाँ लात मिलती है ? हवा तो हर जगह है लेकिन लात के पहले हवा क्यों है ? अब तो हवा मिलती नहीं है, लातों की हवा चल रही है ।

तुम्हें ज़माने ने कालकोठरी भी कहा है । काल का संबंध युग से भी है और बुरे वक्त से भी है । कोठरी तो तुम होगी ही । जेल न हो तो इस धरती पर सज़ा बेमानी हो जाएगी । सज़ा न हो तो जेल तुम क्या करोगी । तुम्हारे यहाँ कैसे कैसे भेजे गए । जिनके बोलने से ज़माना भड़क गया, जिनके लिखने से सरकार सनक गई, जिनके सड़कों पर उतरने से सरकारें घबरा गईं । बाकी चोर, हत्यारे, गिरहकट, उठाईगीर, मनचले, हुड़दंगी, दंगाई, बलवाई तो आते ही रहे ।

प्रिय जेल अब तुमने हँसोड़ कलाकारों को भी बुलाना शुरू कर दिया है । कोई किसी नाइट में हँसता हँसाता है उसे पकड़ लाई हो । उसका जेल जाना भी लतीफ़ा बन गया है । लोग हंस रहे हैं । सरकार ने तुम्हारा इस्तमाल कर लिया है । तुम्हारे भरोसे सरकारों का प्रेम क़ायम रहता है । तुम जब से राज्य की दाहिनी बनी हो तब से राज्य वैसा ही है । डरपोक । तुम आधुनिक राज्य की एक असफल गाथा हो । सुधारक की जगह तुम उसकी लठैतन हो । किसी ने किसी का मज़ाक़ उड़ाया और वो किसी ने किसी को वोट दिलवाया लिहाज़ा जिस किसी ने उस किसी का मज़ाक़ उड़ाया उसे तुम्हारे आलिंगन में भेज दिया गया । मज़ाक़ क्या सरकार की ललाट है जिसे उड़ाया नहीं जा सकता ? और क्या सरकार में बैठे कई लोग कई बार अपने आप में मज़ाक़ नहीं होते ।

मूर्खता के इस दौर में जेल तुम विद्वता हो । तुम्हीं बताओ कमेडीयन क्या करे ? खुले में जाए या कमोड पर बैठ जाए ? हँसना हँसाना उसका काम है लेकिन उसके हँसाने पर उसे हवालात में बंद कर हगाया जाएगा तो ये दुनिया कैसी रह जाएगी । जेल तुम अब खुद को आज़ाद घोषित कर दो। सबसे कह दो । आ जाओ जो भी आहत हैं और वो भी जो आफत हैं । दरवाज़ा सबके लिए खुला है । बस दीवारें बंद हैं । उन पर पहरा है । नीचे संतरी है और सबसे ऊपर मंत्री है । आदेश ही आस्था है । मेरा इन सबसे क्या वास्ता है ।

जेल, तुम्हीं बताओ ये कमेडीयन क्या करेंगे ? क्या किसी की सत्ता, किसी का प्रभाव तभी तक क़ायम है जब तक उसे लेकर हँसा नहीं जा सकता ? क्या श्रद्धा रखने वाले अगर आहत के प्रति इतने संवेदनशील हैं तो वे आस्था के प्रति कब गंभीर हैं ? थाने में जाकर शिकायत करना और थाने का सीधा घर तक चले आना । अगर हम कमेडीयन के लिए भी हम्बूराबी कोड बना देंगे तो क्या ये दुनिया बोझिल नहीं हो जाएगी ।

जानती हो जेल, बाहर की दुनिया में आस्था आफत होती जा रही है । कब कौन खुद को आस्था का प्रहरी घोषित कर दे और एक लतीफे मात्र से घायल हो थाने चला आए, कोई नहीं जानता । आस्था भी एक जेल है । जैसे तुम एक जेल हो । चारों तरफ से दीवारें ही नज़र आती हैं । आस्था अपने आप में पोलिटिकल पार्टी है और हर पार्टी की अपनी अपनी आस्था है । उसके लोग इन आस्थाओं की रक्षा में बावले हुए जा रहे हैं । उसके लिए आस्था ही संसार है और आस्था की अवस्था से ही वोट की व्यवस्था है ।

मेरे इस लेख को किकू शारदा से न जोड़ा जाए । मूर्खता के इस दौर में किसी चीज़ को किसी से भी जोड़ा ही जाएगा इसलिए जोड़ने को ही तोड़ना समझा जाए । तोड़ना ही अब जोड़ना है । तोड़ तोड़ कर सब अपने लिए वोट जोड़ रहे हैं ।

जेल तुम एक तमाशा हो । सरकारों की बताशा हो । आज से हँसने पर पाँच तोले सोने और पाँच दिन की क़ैद का एलान किया जाता है । हर तरफ जेल बनेगी और हर कोई जेल में होगा । क़ैदियों के इस संसार में खुली जगह न तो है और न रहेगी । हम सब गुलाम ही तो है । आस्था की ग़ुलामी में ही मुक्ति है । मुक्ति का नाम कुर्सी है । सरकारें अब अलग अलग आस्थाओं की रक्षा करेंगी । हर धर्म में तरह तरह की आस्थाएँ हैं । हर धर्म अपने आप में वोट बैंक है । धर्म का नया वजूद वोट बैंक है । वोट बैंक की ताकत न हो तो धर्म में कोई ताकत नहीं है। उसके दम पर आस्था शक्तिमान है । थाना से लेकर किसी की जान सब बेमानी हैं ।

प्रिय जेल, तुम्हारा भय ही प्रेम है । मैं तुमसे प्रेम करता हूँ । मैं तुम्हारा कमेडी तो कर सकता हूँ न ! या तुम भी आस्था हो गई हो ! कहीं मेरे इस प्रेम पत्र से आहत न हो जाना , थानेदार को न बुला लाना ।

तुम्हारा,

रवीश कुमार

(Courtesy: http://naisadak.org/jail-ke-naam-ravish-kumar-ka-ek-prem-patra/)

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