एक लम्बी यात्रा की संक्षिप्त कथा – Shyam Anand Jha

एक लम्बी यात्रा की संक्षिप्त कथा
1989 में दरभंगा से जब दिल्ली के लिए रवाना होने की तयारी कर रहे थे, मन में तब भी यह बात थी कि लौटकर यहीं आना है। पिछले 26 सालों में जब भी रात दो रात के लिए, गांव आना हुआ, यही लगा कि अपनी खोई हुई दुनिया में फिर से लौट आया हूँ। कबीर को दरभंगा -ब्रह्मपुरा कभी पसंद नहीं आया इसलिए हमें इन सालों की छुट्टियां पहाड़ों और रेगिस्तानों के चक्कर काटते बिताई। निवेदिता को मेरा गांव पसंद था लेकिन दरभंगा के बारे में उसके विचार कबीर से कुछ अलग नहीं थे। इसलिए बीच बीच में लौटकर दरभंगा आने का विचार जैसे ही फुदककर बाहर आता वैसे ही गायब भी हो जाता।

पिछले साल लोकसभा चुनाव के दरम्यान दरभंगा में एक साथ तीन महीने से ज्यादा रहने का मौक़ा मिला। शहर में 26 साल बाद फिर से ठहर कर सांस ली । यहाँ के चापाकलों का पानी पिया। मटन और चावल खाए, यूनिवर्सिटी कैंपस घूमे, पुराने शिक्षकों से मुलाक़ात की, अगली सुबह और अगली शाम होने का इंतज़ार किया। यह सब करते हुए लगा जैसे हम पिछले पच्चीस साल के गुजर चुके समय को लांघने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उन गुजरे हुए समयों को कैसा लांघा जाता!

दरभंगा पहले से भी ज्यादा पुराना लगा था मुझे। इसकी हर चीज पहले से ज्यादा मैली हो चुकी थी। तालाब भी और कीचड भी। कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी। कॉलेज जाने वाले छात्रों के कपडे तक ज्यादा मैले दिखे मुझे। और मुझे लगा दरभंगा में फिर से रहना मुश्किल होगा।

मैं दरभंगा से दिल्ली लौट आया था।

डॉ रमण कुमार, अजित मिश्रा, जैसे कुछ दोस्तों ने एक दो बार गंभीरता पूर्वक यह कहा था कि दरभंगा को आज आप के जैसे लोगों की ज़रुरत है। मैंने इन बातों को उतना ही महत्व दिया जितना सामान्य शिष्टाचार के नाते देना चाहिए।

दिल्ली में रहना चाट सा लग रहा था। सामने वाली फ्लैट की मिसेज़ मनचन्दा को पता नहीं क्यों हम सक्रिय रूप से घृणा करने लगे थे। यदा कदा दरभंगा ब्रह्मपुरा की याद आती, उसके स्कूल, हस्पताल, पंचायत, स्त्रियों की शौच की समस्या का ख्याल आता। मन खट्टा हो जाता। फेसबुक और गंगा ढाबे के मित्रों के साथ अक्सर इन उबाऊ मसले पर सैद्धांतिक बहस करते। और सोचते अगली ट्रेन पकड़ कर चला जाऊं दरभंगा।

एक ऐसी ही शाम निवेदिता ने कहा, मैं नौकरी करते करते थक गई हूँ। अब नौकरी नहीं करुँगी। मैंने पुछा, क्या करोगी? उसने कहा, किसी छोटी जगह जाकर गरीब बच्चों के लिए स्कूल चलाने का मन कर रहा है।

“क्या तुम दरभंगा में ऐसा स्कूल खोल सकती हो?” मैंने पुछा।
“दरभंगा में????”
हमने रात भर बातें की। सो नहीं पाए।

अगली सुबह हमने कबीर को भाई के पास रहने को छोड़ आए और अपनी कार में दरभंगा के लिए रवाना हो गए कि चलकर दरभंगा को एक बार फिर से देख आते हैं।

हमने योजना में कुशीनगर, वैशाली, और राजगीर घूमने को भी रखा, ताकि स्कूल खोलने के लिए अगर दरभंगा उपयुक्त न भी लगा तो गर्मी में उस खर्चीली यात्रा का ज्यादा अफ़सोस न हो।

दरभंगा आए। दरभंगा का माहौल देखकर हम दोनों विस्मित। रेलवे स्टेशन से लेकर मिर्ज़ापुर चौक, मिसरटोला, दिग्घी, दोनार से होकर भटियारी सराय, नाक 5, रहमगंज, अल्लपट्टी, बंगाली टोला, जहाँ गए, साइकिलों पर सवार हर उम्र और और वर्ग के विद्यार्थियों का हुजूम देखा। एक कोचिंग से दूसरे कोचिंग के लिए जाते इतने सारे छात्र एक साथ सड़कों पर मैंने कभी नहीं देखे थे।

शहर की तंग सड़को पर पसीने में लथपथ साइकिल चलाते उन बच्चों में से ज्यादातर कुपोषित थे, ज्यादातरों के कपड़ों से उनकी गरीबी टपक रही थी। उनके चेहरे पर पढाई विद्या या मेधा का कोई तेज नहीं था। उनके आचरण में महान मैथिल परम्परा के कोई लक्षण नहीं थे। सड़क पर चलते हुए वे यातायात के सामान्य नियमों का पालन नहीं कर पा रहे थे। लेकिन वे बच्चे और बच्चियां हमें अच्छे लगे।

हमने एक दूसरे से कहा हम दरभंगा में स्कूल खोलेंगे।

School

School 2School 3

निवेदिता को अपनी नौकरी से इस्तीफा देना था, कबीर के लिए एक अच्छे बोर्डिंग स्कूल की तलाश करनी थी। साथ ही 1 अक्टूबर से स्कूल की शुरुआत भी।

दोस्तों यह एक लम्बी यात्रा की शुरुआत की अति संक्षिप्त कथा है। शिक्षालय का सेंटर फॉर इंग्लिश लर्निंग की शुरुआत 1 अक्टूबर से हो चुकी है। पहले बैच में 11 बच्चे हैं। जिनको निवेदिता अगले तीन महीने में अंग्रेजी भाषा सिखाएगी। सिर्फ बोलना नहीं, शुद्ध बोलना और शुद्ध लिखना। इन 11 बच्चों में से 6 स्कॉलरशिप वाले हैं, अर्थात उन्हें उनकी प्रतिभा और उनकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए पूर्णत: निःशुल्क शिक्षा दी जाएगी। 3 बच्चे शुल्क देंगे, मगर अभी नहीं, कुछ दिनों बाद। एक ने आधा शुल्क दिया है, एक आज कल में जमा करेगा। कई बच्चे आना चाहते हैं, लेकिन उनके लिए हमारा स्कूल दूर है। हम कोशिश में हैं कि हम उन तक शीघ्र पहुंचे

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One thought on “एक लम्बी यात्रा की संक्षिप्त कथा – Shyam Anand Jha

  1. श्याम जी, आप की यह संक्षिप्त कथा संक्षिप्त होकर भी बहुत कुछ कह रही हैं। रोजगार की तलाश में हम महानगरों की ओर अग्रसर रहे हैं किन्तु हमारी संस्कृति और सभ्यता हमें अपने जन्मभूमि से जोड़े रखती हैं। अतः हमें अपने प्रदेश को आगे बढ़ाने की ओर प्रयासरत होने की आवश्यकता हैं।

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