राम की राजधानी से बापू के संदेश -कृष्ण प्रताप सिंह

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अब इसे विडम्बना कहा जाये, संयोग या कुछ और, लेकिन जिन राम के राज के अपने सपने को साकार करने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने यावत्जीवन कुछ उठा नहीं रखा, उनकी राजधानी या कि जन्मभूमि अयोध्या वे सिर्फ दो बार पहुंच सके। अलबत्ता, अपने संदेशों से इन दोनों ही यात्राओं को महत्वपूर्ण बनाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।

10 फरवरी, 1921 को उनकी पहली यात्रा के समय, कहते हैं कि, अयोध्या व उसके जुड़वा शहर फैजाबाद में उत्साह व उमंग की ऐसी अभूतपूर्व लहर छायी थी कि लोग उनकी रेलगाड़ी आने के निर्धारित समय से घंटों पहले ही रेलवे स्टेशन से लेकर सभास्थल तक की सड़क व उसके किनारे स्थित घरों की छतों पर जा खड़े हुए थे। हर कोई उनकी एक झलक पाकर धन्य हो जाना चाहता था। फैजाबाद के भव्य चैक में स्थित ऐतिहासिक घंटाघर पर शहनाई बज रही थी-हमें आजाद कराने को श्री गांधी जी आते हैं।

सभा फैजाबाद व अयोध्या के संधिस्थल पर जालपा नाले के पश्चिम और सड़क के उत्तर तरफ स्थित मैदान में होनी थी। इस मैदान की खासियत यह थी कि 1918 में अंगे्रजों ने प्रथम विश्वयुद्ध में अपनी जीत का जश्न भी इसी मैदान पर मनाया था। कांगे्रसियों ने गांधी जी की सभा के लिए जानबूझकर इसको चुना था ताकि अंगे्रजों को उनका व गांधी जी का फर्क समझा सकें।

लेकिन रेलगाड़ी स्टेशन पर आयी और तिरंगा लहराते हुए स्थानीय कांगे्रसियों के दो नेता-आचार्य नरेन्द्रदेव व महाशय केदारनाथ-गांधी जी के डिब्बे में गये तो उनका बड़ी ही अप्रिय स्थिति से सामना हुआ। पता चला कि गांधी जी ने गाड़ी के फैजाबाद जिले में प्रवेश करते ही डिब्बे की अपने आसपास की सारी खिड़कियां बंद कर ली हैं और किसी से भी मिलने जुलने या बातचीत करने से मनाकर दिया है।

दरअस्ल, वे इस बात को लेकर नाराज थे कि अवध में चल रहा किसान आंदोलन खासा उत्पाती हो चला था और उसूलों व सिद्धांतों से ज्यादा युद्धघोष की भाषा समझता था। उसके लिए अहिंसा कोई बड़ा मूल्य नहीं रह गई थी। खासकर फैजाबाद जिले के किसान तो एकदम से हिंसा के रास्ते पर चल पड़े थे और बिडहर में बगावती तेवर अपनाकर उन्होंने तालुकेदारों व जमीनदारों के घरों में आगजनी व लूटपाट तक कर डाली थी। यह स्थिति गांधी जी की बरदाश्त के बाहर थी, लेकिन अनुनय विनय करने पर उन्होंने यह बात मान ली कि वे सभा में चलकर लोगों से अपनी नाराजगी ही जता दें।

उनके साथ अबुल कलाम आजाद के अतिरिक्त खिलाफत आंदोलन के नेता मौलाना शौकत अली भी थे जो लखनऊ कांगे्रस में हिन्दू मुस्लिम एकता पर बल, असहयोग और खिलाफत आन्दोलनों के मिलकर एक हो जाने के बाद के हालात में साथ-साथ दौरे पर निकले थे। मगर गांधी जी मोटर पर सवार होकर जुलूस के साथ चले तो देखा कि खिलाफत आन्दोलन के अनुयायी हाथों में नंगी तलवारें लिए उनके स्वागत में खड़े हैं। उन्होंने वहीं तय कर लिया कि वे अपने भाषण मंे हिंसक किसानों के साथ इन अनुयायियों की भत्र्सना से भी परहेज नहीं करेंगे।
सूर्यास्त बाद के नीम अंधेरे में बिजली व लाउडस्पीकरों से अभाव में उन्हें सुनने को आतुर भारी जनसमूह से पहले तो उन्होंने हिंसा का रास्ता अपनाने के बजाय खुद कष्ट सहकर आन्दोलन करने को कहा, फिर साफ व कड़े शब्दों में किसानों की हिंसा व तलवारधारियों के जुलूस की निन्दा की। कहा: हिंसा बहादुरी का नहीं कायरता का लक्षण है और तलवारें कमजोरों का हथियार हैं।

गौरतलब है कि उन्होंने देशवासियों को ये दो मंत्र देने के लिए उस अयोध्या को चुना जिसके राजा राम के राज्य की कल्पना साकार करने के लिए वे अपनी अंतिम सांस तक प्रयत्न करते रहे। रात में वे जहां ठहरे वहां ऐसी व्यवस्था की गई कि वे विश्राम करते रहें और उनका दर्शन चाहने वाले चुपचाप आते व दर्शन करके जाते रहें। हजारों की संख्या में किसानों ने उस रात आंखों में पश्चाताप के आंसू लिये अपने मुक्तिदाता के सामने मूक क्षमायाचना की। सुबह सरयू स्नान के बाद गांधी जी अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ गये तो भी किसानों द्वारा ‘आन्दोलन को धक्का पहुंचाने व शर्मिन्दगी दिलाने वाली’ हिंसा उनको सालती रही। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से इन भटके किसानों को सही राह दिखाने को कहा।

यह तब था जब नेहरू ने उक्त हिंसा के एक दो दिन में ही हिंसक किसानों की सभा आयोजित कर उनसे सार्वजनिक रूप से गुनाह कुबूल करा लिया था और अनेक किसानों ने अपनी गलती स्वीकारते हुए खुद को कानून के हवाले कर लम्बी-लम्बी सजायें भोगना स्वीकार कर लिया था। इस घटना से पता चलता है कि वे स्वतंत्रता के संघर्ष में सत्य व अहिंसा जैसे मूल्यों व नैतिक सैद्धांतिक मानदंडों के कितने कठोर हिमायती थे। यह बात तो सारा देश जानता है कि चैरी-चैरा कांड के बाद उन्होंने समूचा असहयोग आन्दोलन ही स्थगित कर दिया था।

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गौरतलब है कि बापू अयोध्या आये तो ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ के उद्घोषक बाल गंगाधर तिलक का निधन हो चुका था और देश के स्वाधीनता आन्दोलन को नये सिरे से संजोने की जिम्मेदारी उन पर आ पड़ी थी। सो, 10 फरवरी, 1921 को वाराणसी में काशी विद्यापीठ का शिलान्यास करके उसी दिन वे ट्रेन से फैजाबाद पहुंचे तो अयोध्या के साधुओं के बीच जाकर उनको आन्दोलन से जोड़ने को भी यात्रा के उद्देश्यों में शामिल कर रखा था। यह इस अर्थ में बहुत महत्वपूर्ण था कि तब तक तुर्की की स्वाधीनता और इस्लाम की धार्मिक संस्थाओं की स्वतंत्रता की बाबत ब्रिटिश प्रधानमंत्री के वायदों के संदर्भ में शुरू हुए खिलाफत आन्दोलन को हिन्दू मूुस्लिम एकता को मजबूत करने के बड़े अवसर में बदलने की उनकी कोशिशें रंग लाने लगी थीं। इस वक्त वे न सिर्फ खिलाफत को अपने ढंग के आन्दोलन में ढाल रहे थे बल्कि अंगे्रजों द्वारा इस एकता की राह में डाले जा रहे रोड़े भी बुहार रहे थे।

इन रोड़ों में सबसे प्रमुख था गोहत्या का मसला, जिसे अंग्रेज लगातार साम्प्रदायिक रंग दे रहे थे। स्वाभाविक ही था कि गांधी जी अयोध्या में इस मसले पर खुलकर बोलते। यकीनन, उन्होंने जिस तरह गोहत्या के लिए अंग्रेजों को कठघरे में खड़ाकर गोरक्षा के लिए हिन्दू मुस्लिम एकता को अपरिहार्य बताया, वह सिर्फ और सिर्फ वे ही कर सकते थे और हां, ऐसा करते हुए उन्होंने जहां स्वतंत्रता संघर्ष के दूसरे पहलुओं की कतई अनदेखी नहीं की, वहीं तथाकथित रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद का कतई संज्ञान नहीं लिया। भले ही यह उनके आराध्य राजा राम की जन्मभूमि व राजधानी की उनकी पहली यात्रा थी। इससे पहले 1915 में कल्कत्ता से हरिद्वार के कुम्भ मेले में जाते हुए वे वहां से गुजरे जरूर थे लेकिन उसकी धरती पर उतरे नहीं थे।

देर शाम फैजाबाद की सभा को सम्बोधित कर वे 11 फरवरी की सुबह अयोध्या के सरयूघाट पर पंडित चंदीराम की अध्यक्षता में हो रही साधुओं की सभा में पहुंचे तो शारीरिक दुर्बलता और थकान के मारे उनके लिए खड़े होकर बोलना मुश्किल हो रहा था। इसलिए उन्होंने सबसे पहले अपनी शारीरिक असमर्थता के लिए क्षमा मांगी, फिर बैठे-बैठे ही साधुओं को सम्बोधित करने और आईना दिखाने लगे। उन्होंने कहा, ‘कहा जाता है कि भारतवर्ष में 56 लाख साधु हैं। ये 56 लाख बलिदान के लिए तैयार हो जायें तो मुझे विश्वास है कि अपने तप तथा प्रार्थना से भारत को स्वतंत्र करा सकते हैं। लेकिन ये अपने साधुत्व के पथ से हट गये हैं। इसी प्रकार से मौलवी भी भटक गये हैं। साधुओं और मौलवियों ने कुछ किया है तो केवल हिन्दुओं तथा मुसलमानों को एक दूसरे से लड़ाया है। मैं दोनों के लिए कह रहा हूं।….यदि आप अपने धर्म से वंचित हो जायें, विधर्मी हो जायें और अपना धर्म समाप्त कर दें, तब भी ईश्वर का कोई ऐसा आदेश नहीं हो सकता जो आपको ऐसे दो लोगों के बीच शत्रुता उत्पन्न करने की अनुमति द,े जिन्होंने एक दूसरे के साथ कोई गलती नहीं की है।’

वे यहीं नहीं रुके। आगे कहा, ‘मैंने हरिद्वार में साधुओं से कहा था कि यदि वे गाय की रक्षा करना चाहते हैं तो मुसलमानों के लिए अपनी जान दें। अंगे्रज हमारे पड़ोसी होते तो मैं आपको परामर्श देता कि आप उनसे भी प्रार्थना करें कि उनके धर्म में गाय की हत्या तथा उसका मांस खाने का निषेध नहीं है, तो भी वे हम लोगों के लिए उसे बन्द कर दें।…परन्तु वे हाथ उठाते हैं और कहते हैं कि वे शासक हैं और उनका शासन हम लोगों के लिए रामराज्य है!…मैं साधुओं से अपील करता हूं कि यदि वे गाय की रक्षा करना चाहते हैं तो खिलाफत के लिए जान दे दें।…वे गाय की रक्षा के लिए मुसलमानों की हत्या करते हैं तो उन्हें हिन्दू धर्म का परित्याग कर देना चाहिए। हिन्दुओं को इस प्रकार के निर्देश कहीं भी नहीं दिये गये हैं।’

आगे उन्होंने ऐसी ही और नसीहतें दीं। कहा, ‘आजकल हिन्दू नगरपालिका द्वारा गोवध बन्द कराना चाहते हैं। मैं इसे बेवकूफी समझता हूं। इस मामले में कुछ नासमझ परामर्शदाताओं के बहकाने पर कल्कत्ता के हमारे मारवाड़ी बन्धुओं ने मुझसे कसाइयों के हाथों से दो सौ गायों की रक्षा के लिए कहा। मैंने कहा कि मैं एक भी गाय की रक्षा नहीं करूंगा, जब तक कसाइयों को यह न बता दिया जाये कि वे बदले में कौन-सा दूसरा पेशा अख्तियार करें क्योंकि वे जो करते हैं, हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहंुचाने के लिए नहीं करते।….बम्बई में क्या हुआ? वहां कसाइयों के पास सैकड़ों गायें थीं। कोई भी हिन्दू उनके पास नहीं गया। खिलाफत कमेटी के लोग गये और कहा कि यह ठीक नहीं है। वे गायों को छोड़ दें और बकरियां खरीदें। कसाइयों ने सब गायें समर्पित कर दीं। किसी को भी एक पैसा नहीं देना पड़ा। इसे गाय की रक्षा कहते हैं।’

उन्होंने साफ किया कि गाय की रक्षा का तात्पर्य किसी जानवर की रक्षा से नहीं है। ‘इसका तात्पर्य निर्बल एवं असहाय की रक्षा से है और ऐसा करके ही भगवान से अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना करने का अधिकार मिल सकता है। भगवान से अपनी रक्षा की प्रार्थना करना पाप है, जब तक कि हम कमजोरों की रक्षा नहीं करते।…हम लोग इस तरह प्यार करना सीखें, जैसे राम सीता से करते थे। जब तक हम अपने धर्म का पालन सेवा और निष्ठा से नहीं करेंगे, तब तक हम लोग इस राक्षसों की सरकार को नष्ट नहीं कर सकेंगे। न स्वराज्य प्राप्त कर सकेंगे और न ही अपने धर्म का राज्य। यह हिन्दुओं की शक्ति से बाहर है कि वे पुनः रामराज्य वापस ले आयें।’

अपने भाषण का समापन उन्होंने यह कहकर किया, ‘मैं अधिक नहीं कहना चाहता। संस्कृत के विद्यार्थी यहां आये हुए हंै। मैं उनसे कहता हूं कि वे अपने मुसलमान भाइयों के लिए जीवन का बलिदान करें।….हर विद्यार्थी जो निर्वाण हेतु ज्ञान उपार्जन करना चाहता है, वह समझ ले कि अंगे्रजों से ज्ञान उपार्जन करना जहर का प्याला पीना है। इस जहर के प्याले को स्वीकार मत कीजिए। सही रास्ते पर आइए।….यहां एक मूर्ति है, जिसे विदेशी वस्त्र अर्पित किये जाते हैं। यदि आप स्वयं विदेशी वस्त्र नहीं चाहते तो इस प्रथा का अंत कर दीजिए। आप स्वदेशी हो जाइये। अपने भाइयों तथा बहनों द्वारा काते हुए धागों का प्रयोग कीजिए। मैं आशा करता हूं कि यहां के साधुओं के पास जो कुछ है, उसका कुछ अंश वे मुझे दे देवेंगे।….साधु पवित्र माने जाते हैं और वे जो कुछ दे सकें, दे देवें। स्वराज्य के लिए यह सहायक होगा।’

गांधी जी के इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार में संरक्षित है, जो तत्कालीन गोपनीय श्रेणी के अभिलेखों में से एक है। इस भाषण से पहले वे फैजाबाद की सभा में दक्षिण अफ्रीका में अपने सत्याग्रह पर प्रकाश डालकर लोगों से अंगे्रजी सरकार से शांतिपूर्वक असहयोग करने, विदेशी वस्त्रों को त्यागने, सरकारी सहायताप्राप्त विद्यालयों का वहिष्कार करने और चरखा चलाने व सूत कातने का आह्वान कर चुके थे। अयोध्या की सभा में उन्होंने यह कहकर इस आह्वान को नहीं दोहराया था कि आज मैं उस विषय पर नहीं बोलना चाहता जिस पर कल रा़ित्र बोला था।

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1929 में वे अपने हरिजन फंड के लिए धन जुटाने के सिलसिले में एक बार फिर अपने राम की राजधानी आये। फैजाबाद शहर के मोतीबाग में हुई सभा में उन्हें उक्त फंड के लिए चांदी की एक अंगूठी प्राप्त हुई तो वे वहीं उसकी नीलामी कराने लगे। ज्यादा ऊंची बोली लगे, इसके लिए उन्होंने घोषणा कर दी कि जो भी वह अंगूठी लेगा, उसे अपने हाथ से पहना देंगे। एक सज्जन ने पचास रूपये की बोली लगाई और नीलामी उन्हीं के नाम पर खत्म हो गई। तब वायदे के मुताबिक उन्होंने वह अंगूठी उन्हें पहना दी। सज्जन के पास सौ रूपये का नोट था। उन्होंने उसे गांधी जी को दिया और बाकी के पचास रूपये वापस पाने के लिए वहीं खड़े रहे। मगर गांधी जी ने उन्हें यह कहकर लाजवाब कर दिया कि हम तो बनिया हैं, हाथ आये हुए धन को वापस नहीं करते। वह दान का हो तब तो और भी नहीं। इस पर उपस्थित लोग हंस पड़े और सज्जन उन्हें प्रणाम करके खुशी खुशी लौट गये।

इस यात्रा में गांधी जी धीरेन्द्र भाई मजूमदार द्वारा अकबरपुर में स्थापित देश के पहले गांधी आश्रम भी गये थे। वहां ‘पाप से घृणा करो पापी से नहीं’ वाला अपना बहुप्रचारित संदेश देते हुए अंगे्रज पादरी स्वीटमैन के बंगले में ठहरे और आश्रम की सभा में लोगों से संगठित होने, विदेशी वस्त्रों का त्याग करने, चरखा चलाने, जमीनदारों के जुल्मों का अहिंसक प्रतिरोध करने, शराबबंदी के प्रति समर्पित होने और सरकारी स्कूलों का वहिष्कार करने को कहा। फिर तो अवध के उत्पाती किसानों ने भी न सिर्फ हिंसा का रास्ता त्याग दिया बल्कि पुलिस के जुल्मों व ज्यादतियों को अविचलित रहकर सहना और गोरी सरकार को फौज की सहायता से अपने दमन का औचित्य सिद्ध करने के बहाने देने से मना कर दिया।

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