मेरे सवाल आप से हैं, आप चुप क्यों हैं? – आपके नाम रवीश की चिट्ठी

फासीवाद की खासियत है कि हर विरोध करने वाले को ही नहीं, हर तर्क करने वाले को ख़तरा समझा जाता है। उसका दमन होता है और इसकी शुरुआत धमकी, गाली-गलौज और फिर मिथ्या प्रचार या छवि खराब करने से होती है। फासीवादी शासक जानते हैं कि छवि खराब करना, हत्या करने से ज़्यादा प्रभावी और आसान तरीका है। लम्बे समय से टीवी पत्रकार रवीश कुमार के खिलाफ यही खेल सोशल मीडिया पर जारी है…उनके खिलाफ मिथ्या प्रचार और धमकियां तैर रही हैं। ऐसे में आहत-आक्रोशित रवीश ने यह चिट्ठी आम लोगों के नाम लिखी है, पढ़ना और समझना ज़रूरी है कि हमारे समय के सबसे ईमानदार और रीढ़वाले पत्रकार के मन पर इस बचकाने रवैये से क्या बीत रहा है…

दोस्तों,

मैं 2013 से इस बारे में लिख रहा हूँ । अपने टीवी शो में बोल रहा हूँ । इस प्रक्रिया को समझने का प्रयास करता रहता हूँ । मैंने सोचा था अब इस विषय पर नहीं लिखूँगा । आज आप सबके फोन आए तो लगा कि मैं अपनी बात फिर से रखूँ । मेरे ब्लाग क़स्बा की उतनी हैसियत नहीं है कि वो हर किसी के पास पहुँच जाए इसलिए हो सके तो आप मेरी बात आगे बढ़ा दीजियेगा । मैं अपनी बात का पर्चा छपवाऊँगा और आम लोगों में बाटूँगा । आप जानते हैं कि मैंने फेसबुक बंद कर दिया है । ट्वीटर पर लिखना बंद कर दिया है ।

मेरे कई दर्शकों ने सलाह दी कि आनलाइन गुंडागर्दी को दिल पर मत लीजिये । यह सब चलता रहता है । यह आपके सेलिब्रेटी होने की क़ीमत है । मैं सेलिब्रिटी नहीं हूँ और हूँ भी तो यह कब तय हो गया कि मुझे अनाप शनाप गाली खाली खानी पड़ेगी । मेरे परिवार और बच्चों तक को गाली दी जाएगी । मुझे क्यों गालियाँ और अनाप-शनाप आरोप बर्दाश्त करने चाहिए ? जब मैं कमज़ोर लोगों की तकलीफ़ बर्दाश्त नहीं कर सकता, तो अपने साथ हो रही इस नाइंसाफी को क्यों बर्दाश्त करूँ । मुझे लगता है कि इस आनलाइन गुंडाराज के ख़िलाफ़ मुझे भी बोलना चाहिए और आपको भी । पूरी दुनिया में ऑनलाइन बुली यानी गुंडागर्दी के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ हो रहा है, भारत में क्यों चुप्पी है ?

मुझे पता है कि इसका निशाना राजनेताओं और प्रवक्ताओं को भी बनना पड़ता है । प्रवक्ताओं ने इसे क्यों मंज़ूरी दी है ?  पत्रकारों को ख़ासकर कई महिला पत्रकारों को गालियाँ दी गईं । ये कौन सा समाज है जो गालियों के गुंडाराज को स्वीकार कर रहा है । बीते दौर की गुंडागर्दी और इस गुंडागर्दी में क्या अंतर है ? मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन शिकार हो रहा है ?  सोशल मीडिया में आए दिन किसी का भी चरित्र हनन हो रहा है ? कहीं से कोई कुछ भी बोल दे रहा है । वो क्या यूं ही हो जाता है । क्या यह संगठित काम नहीं है ।

आनलाइन गुंडाराज राजनीतिक संस्कृति की देन है । अब यह तमाम दलों की रणनीति का हिस्सा हो गया है लेकिन अफवाह फैलाना और बिना किसी तथ्य के किसी को बदनाम करना ये कब से मान्य हो गया । एक बात समझ लीजिये इस गुंडाराज को बढ़ावा देने में भले ही कई दल शामिल हैं और दलों के बनाए हुए असंख्य संगठन यह काम कर रहे हैं लेकिन मामला बराबरी का नहीं है । इसमें गुंडई उसकी चल रही है जिसकी ताकत ज्यादा है और जिसकी सत्ता पर पकड़ है । यह सारा मामला संसाधनों का है ।

यह एक भयावह संस्कृति पसरती जा रही है और जिसे मोटी चमड़ी वाला मध्यमवर्ग, जिसकी सत्ता से साँठ गाँठ है , सहन कर रहा है और दूसरों को सहने की सलाह देता है । इस खेल ने सत्ता का काम आसान कर दिया है । इस ग्लोबल जगत में सरकार पर आँच न आए इसलिए गुमनाम संगठन या दलों के आनलाइन मीडिया सेल के इशारे पर यह काम हो रहा है । ऐसे पेश किया जाता है जैसे समाज शामिल है । किसी के पक्ष और विपक्ष में ट्रेंड कराना भी राजनीतिक गुंडई है ।

लिखने बोलने वाले लोग और कई लड़कियाँ शिकायत करती हैं कि वो गालियों के डर से नहीं लिखतीं । कई लोग डरने लगे हैं । लड़कियों को यह समझ लेना चाहिए कि ऐसी भाषा और प्रतीकों के दम पर मर्द उन्हें इस जगह से भी बेदख़ल कर देना चाहते हैं । अगर ये जारी रहा तो मेरी दोस्तों आप जिस पद पर जितनी बार पहली महिला बन जाओ लेकिन इस बेदख़ली से आपको वहीं पहुँचा दिया जाएगा जहाँ से आप चली थीं । सोशल मीडिया रचनात्मक, अनौपचारिक और मौजमस्ती की जगह है , यहाँ नेताओं ने घुस कर विरोधियों को खोजना पहचानना शुरू कर दिया है । बचाइये इस सोशल मीडिया को ।

लोकतंत्र के नाम पर सोशल मीडिया के पब्लिक स्पेस में माँ बहन की गालियाँ दी जा रही हैं । इन नेताओं ने ऐसा क्या कर दिया है कि सब चुप हैं ।गली मोहल्लों के गुंडों से परेशान लड़कियाँ और महिलाएँ जो इस मुल्क का भविष्य हैं, आनलाइन गुंडागर्दी क्यों सहन कर रही हैं ?  क्या हमारे नौजवान लड़के अपने आस -पास पनप रही ऐसी संस्कृति के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलेंगे ? वे क्यों चुप हैं ? जो कमज़ोर है उसके लिए इस संस्कृति में कहाँ जगह बचेगी ?

यह एक रणनीति है । तर्क या तथ्य की गुज़ाइश खतम कर दो और धारणा बनाओ, बदनाम करो । प्रचार और प्रोपेगैंडा से धारणा बना दो । हम एक ऐसी जानलेवा भीड़ को मान्यता दे रहे हैं जिसकी चपेट में बारी बारी से सब आने वाले हैं । आप इसके ख़तरों को समझना चाहते हैं तो अमरीका की मोनिका लेविंस्की के अनुभव को इंटरनेट से निकाल कर पढ़ लीजिएगा । आनलाइन बुली कुछ और नहीं सिर्फ गुंडाराज है । क्या हम जवाबदेही से बहस का माहौल नहीं बना सकते ।

मीडिया में समस्या है । वो समस्या व्यक्ति की है और संस्था की भी । आप व्यक्ति को गाली देकर संस्था के सवाल को नकार नहीं सकते । उन सवाले के जवाब पत्रकार के पास नहीं हैं । वो कब तक देता रहेगा । लोग फिर क्यों उस कारोपोरेट के ख़िलाफ़ चुप रहते हैं जिनके हाथ में मीडिया है और जो नेता के साथ बैठकर विकास बन जाता है और उसके मीडिया में काम करने वाला पत्रकार दलाल हो गया ? ये किस तराज़ू पर तौल रहे हो भाई । तंत्र देखो, व्यक्ति नहीं ।

मैंने पहले भी कहा है कि इस सवाल पर खुल कर बहस हो । वे कौन से पत्रकार हैं जो राज्य सभा और विधान परिषद के सदस्य बने और अख़बार और चैनल भी चलाते हैं ? वे कौन से पत्रकार हैं जो दो दलों में शामिल होने के बीच भी संपादक बन जाते हैं ? ये कैसे स्वीकृत हो जाते हैं ? मीडिया पर राजनीतिक नियंत्रण आपके लिए मुद्दा क्यों नहीं है ? ऐसे लोगों के साथ तो नेता मंत्री खूब नज़र आते हैं तब ये गाली देने वाले गुंडे किधर देख रहे होते हैं । पार्टियाँ बतायें कि उनके भीतर कितने पत्रकार शामिल हैं ? पत्रकारिता में संकट है तो उसके लिए दो चार को गाली देने से क्या होगा ।

मेरे काम का भी हिसाब कीजिये । निकालिये मेरी एक एक रिपोर्टिंग और उसकी आडिट कीजिए । मैं नालियों और गलियों के किनारे कांग्रेस या बीजेपी के फ़ायदे नुक़सान के लिए नहीं गया । लोगों के लिए गया । चैनल चैनल बदलकर अपने होने की क़ीमत नहीं वसूली । काम ही किया । जितना कर सकता था किया । मुझे सफाई नहीं देनी है । मुझे आपका पक्ष जानना है ?

मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे कोई यह लिखे कि वो मेरी लाद फाड़ देना चाहता है । मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है कि मैं गाली सुनूँ और आप या समाज सुनने सहने की सलाह दें । आप उनसे लड़िये जो गुंडाराज की सेना तैयार कर रहे हैं । मेरे बारे में अनगिनत अफ़वाहें फैलाई गईं हैं । आप मेरी नहीं अपनी चिन्ता करें क्योंकि अब बारी आपकी है । आप सरकारों का हिसाब कीजिये कि आपके राज में बोलने की कितनी आज़ादी है और प्रेस भांड जैसा क्यों हो गया है ?

यह मज़ाक़ का मसला नहीं है । मैं जानना चाहता हूँ कि समाज का पक्ष क्या है ? मैं आम लोगों से पूछने जा रहा हूँ कि आप इसके ख़िलाफ़ बोलेंगे या नहीं ? आप मीडिया के आज़ाद स्पेस के लिए बोलेंगे या नहीं ? आप किसी पत्रकार के लिए आगे आएँगे या नहीं ? अगर नहीं तो मैं युवा पत्रकारों से अपील करता हूँ कि वे इस समाज के लिए आवाज़ उठाना छोड़ दें । यह समाज उस भीड़ से मिल गया है । यह किसी भी दिन आपकी बदनामी से लेकर हत्या में शामिल हो सकता है ? पत्रकारों ने हर क़ीमत पर समाज के लिए लड़ाई लड़ी है, बहुत कमियाँ रही हैं और बहुतों ने इसकी क़ीमत भी वसूली लेकिन मैं देखना चाहता हूँ कि समाज आगे आता है या नहीं ।

अरविंद केजरीवाल जब दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब मैंने खुलेआम दर्शकों से एक बात कही थी । आज के बाद से आप नागरिक बन जाइये । अब आप मतदाता नहीं है । अपनी चुनी हुई सरकार को लेकर सख्त हो जाइये । तटस्थ हो जाइये और किसी का फैन मत बनिये । क्योंकि फैन लोकतंत्र का नया गुंडा है जो विरोध और असहमति की आवाज़ को दबाने के खेल में साझीदार बनता है ।

आपका

रवीश कुमार


Ravish Kumarरवीश कुमार वरिष्ठ हिंदी पत्रकार हैं, सम्प्रति एनडीटीवी इंडिया में प्राइम टाइम के एंकर के रूप में देश भर में लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और अपनी बात को अपनी तरह से कहने में संकोच न करने के लिए पसंद किए जाते हैं।

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18 thoughts on “मेरे सवाल आप से हैं, आप चुप क्यों हैं? – आपके नाम रवीश की चिट्ठी

  1. रवीश के सवाल

    जीवन के साध्य काल में व्यक्ति बहुतेरी चीज़ों से किनारा कर लेता है ( या उसे किनारा कर ही लेना पड़ता है)। मैंने अंतर द्वंद्व को काग़ज़ पर उकेरने या उड़ेलने से किनारा कर लिया !

    पर, रवीश ने बहुत गहरे कुरेद दिया।
    ज़माना तो रवीश ने ही रज़्यादा देखा होगा क्योंकि पत्रकार है, पर उम्र मेरी ज़्यादा है और इन्हीं मसलों के जवाब तलाशते मेरी भी खासी उम्र गुज़र चुकी है।

    क्या लोक तंत्र भी परोक्ष गुंडाराज नहीं बन चुका है? किस मुल्क की बात या उदाहरण देना चाहोगे जो इससे परे हो। कही कम तो कही ज़्यादा ।
    कहॉ , किस मुल्क में शासन तंत्र के निर्माण में पैसा सर चढ़ कर नहीं बोलता?
    कौन सा तंत्र गुंडा तंत्र नहीं है , या नहीं था ।

    राजतंत्र ? वह भी तो कुल मिला कर बर-जोरी ही तो थी।

    तथाकथित समाजवाद भी अंततः क्या साबित कर पाया?
    सैनिक शासनों का हाल भी सबने देखा।

    हाँ, फ़िल हाल दिल्ली में एक जन तांत्रिक प्रयोग चल रहा है, जिन लोगों की अंतर आत्मा जीवित है वे सास रोके इस प्रयोग के नतीजों का इंतज़ार कर रहे है।

    विचारों के साथ जूझने वालों की नियति क्या है ?
    क्या ईसा ने ख़ुद अपने ही काँधे अपना सलीम ढो कर लाइन सवालों का जवाब नहीं दे दिया था।

    फिर इन प्रश्नों का जवाब तंग दस्त ज़माने से क्यों माँग रहे हो रवीश भाई!

    विजय सिंह

  2. Aap hamesa Sarkar se Sawal Uthate Rahiye Ravish babu. aap hi jaise logon ke patrakarita par hame Garv hai. Aap Bihar ki Saan hai , Aap ke upar Patrkarita jagat ko naaj hai.

  3. मित्र रविश। कैसी दुविधा की बेड़ियों को जन्म दे रहे हो ? जिन लोगो के चेहरे नहीं, जिनकी कोई हैसियत नही उनसे हार रहे हो ? तुम हमारे जीतने की आशा हो। हमारे उस विश्वास का प्रतीक हो जिसने मेरे जैसे गवई को दिल्ली जैसे शहर में पिछले 15 सालो से अंगद के पैर की तरह जमा रखा है। सोचो की तुम चंद गालियों से हार मान रहे हो और मैं उस औरत के बारे में सोच रहा हूँ जो पिछले 3 साल से जंतर मंतर पर बैठी है ताकि उसके बलात्कारियो को सजा मिले। पलायन का अधिकार नहीं है तुम्हारे पास। रणछोड़ ना बनो।

  4. ३ साल से ऑनलाइन गुंडागर्दी मैं भी देख रहा हूँ. मेरे कुछ मित्रों के दिमाग बत्ती तो गुल थी ही, अब तो उनके फुस्स बल्ब भी चोरी हो चुके हैं. विचारों का अभाव हो चुका है. जो उनको परोस के दे दिया जाता है, फटाक से “शेयर” दबा देते हैं. आएं देखा न बाएं बस भेज दो आगे. एक तरफ़ा, तथ्यहीन मैसेज एक बंद कमरे में बनते हैं, लाखों लोगों में बांटते हैं और हज़ारो लोग साझा करने में लग जाते हैं. जो सहमत न हो उसका तो जीना हराम.
    पहले भी लिख चुका हूँ और आज फिर लिखता हूँ, सोशल मीडिया को सही से इस्तेमाल कीजिए. ऐसा लिखिए की १० साल बाद आपकी संतान आपकी समयरेखा पर जा कर फख्र करे , आपकी भाषा से प्रेरित हो , आपसे अच्छा लिखे। कहीं ऐसा न हो कि बेशर्मी के कारण आपको अपना प्रोफाइल ही मिटाना पड जाये. हाँ कुछ कुटिल जुगाड़ वाले मित्र अपनी समयरेखा को “बर्बाद” नहीं करते और दूसरों के पेज/पोस्ट पर जाकर रायता फैलाते हैं. भूल है उनकी, क्योंकि संसार का नियम ही है – जो बोओगे वो काटोगे. कभी न कभी आप या फिर देर हो जाए तो आपकी संतान को भी वही भाषा का सामना (ऑनलाइन bullying ) करना पड़ सकता है. इसे सिर्फ आप और हम ही संभाल सकते हैं. फैसला हमें-आपको ही करना है की भविष्य का सोशल मीडिया कैसा हो.
    एक ज़माना वो भी था जब तेज तर्रार पत्रकार, SP सिंह जी उपहार सिनेमा कांड की रिपोर्टिंग के वक़्त लाइव शो में ही रो दिए थे। अफ़सोस इस काण्ड ने उनके दिल को ऐसा कमज़ोर किया की १ हफ्ते में वो चल बसे। निर्भीक पत्रकारों के अनुकरणीय SP सिंह जी को तो हम ज़्यादा सुन-समझ नहीं पाये, क्योंकि तब हमारी उम्र नहीं थी। लेकिन आज अगर कोई अलग खड़ा दीखता है तो वो है रविश। एक एक राजनेता /प्रवक्ता ने उसके balanced reporting की तारीफ की है। …लेकिन वो कौन लोग हैं जो एक एजेंडे के तहत उसकी और उसके परिवार की बखिया उधेड़ने में लगे हुए हैं ? क्या मिला? इतना ही न की वो फेसबुक और टिव्टर से चला गया ? क्या फर्क पड़ा?
    उसने नहीं हमने लिखा।
    ‪#‎RavishKUmar‬

  5. Sir,aap awaaz uthate rahe hum aapke sath hain aur hum bhi apake sath apaki awaaz ban kar is gundagardi ka virodh karenge.. ek shantipuran march nikalte hai hum sab us dard ko kagaz par utar kar logo ko aware karke.. ki ab band karo yeh sab.. yeh ek tarika ho sakta hai ki unhe yeh dekh kar sharmindgi ho ki woh social media par kis tarah se ghinona kaam kar rahe hain.. Aapka dard mehsus hota hai..aur bahut peeda bhi .. agar aaj awaaz nahi uthayi to humara desh bahut boore daur mein jaane wala hain

  6. आप ने अपनी व्यथा एक जगह व्यक्त की है की मीडिया घरानो और राजनीतिज्ञ के विकाश के गढ़जोड़ का विरोध हम लोग क्यों नहीं करते। एंकर के खिलाफ क्यों? जिस तरह आपने अपनी व्यथा व्यक्त की उससे एक बात स्पस्ट होता है की हर आदमी अपने रोजगार से बंधा है और उसकी मजबूरी होती है अपने बॉस की आज्ञा का पालन करना। ये कितना न्यायसंगत होगा की सारी जिम्मेदारी आपने जनता के ऊपर डाल दिया। मैंने आपका प्राइम टाइम में तोमर को लेकर दो दिन चले डिबेट को देखा था हमे बड़ा दुःख हुआ की तोमर के फर्जी काम को आपने इसलिए सपोर्ट किया की स्मृति ईरानी का भी तो डिग्री संदेह के घेरे में है । मान लेते है की स्मृति की डिग्री सही नहीं है क्या इसके कारन तोमर की डिग्री सही हो गया। एक पत्रकार का काम ये नहीं होता की एक गलत काम को इसलिए सही ठहराए की फला व्यक्ति भी तो चोर है।
    अगर आपको लगता है की मीडिया घरानो के दबाव में कुछ बातो में आपने अपने सिद्धांतो से समझौता किया है तो ये गलत है। अगर जनता उन झुण्ड का हिस्सा बनता जा रहा है जो सोशल मीडिया पैर आतंक फैला रहा है तो उसकी जिम्मेदारी भी आपकी और हमारी है। एक व्यक्ति अगर आपको एक अच्छे पत्रकार को तौर पैर पसंद करता है लेकिन वो देखता है की एक व्यक्ति समूह के लिए हफ़्तों उस चैनल को बुक कर लिया जाता है और उसका रिपोर्टिंग आप करते है तो उस व्यक्ति का विश्वाश हिल जाता है और उस समूह का हिस्सा बन जाता है जो ऐसे लोगों को खोज रहा होता है। अगर सचिन तेंदुलकर गलत काम करने लगे और कहे की bcci के लोगो के प्रेशर में किया तो उनको आदर्श मानने वाले के दिमाक पैर क्या असर पड़ेगा।एक आतंकवादी पकड़ा जाता है तो वो यही बोलता है की मैंने तो पैसे के लिए किया और मेरे आक ने जो कहा वही तो मैंने किया। एक समूह ऐसे लोगो के फ़िराक़ में हमेशा रहता है जो उनके विचारो से प्रभावित कर सके। सर आप ये कह कर नहीं बच सकते की मैं तो सिर्फ एंकर हूँ बाकी तो काम मीडिया घरानो का है। सिर्फ जनता या ऐसे समूहों पैर दोषारोपण से कुछ नहीं होने वाला। अगर आप ऐसे समूहों से लड़ना चाहते तो पहले आपको ऐसे मीडिया घरानो से निकलना पड़ेगा जो स्वतंत्र विचारो का हनन करते है जनता पैर तो सारी जिम्मेदारी डालने की आदत तो नेताओ का भी है कही तो आप भी वही नही तो कर रहे है?

  7. आप ने अपनी व्यथा एक जगह व्यक्त की है की मीडिया घरानो और राजनीतिज्ञ के विकाश के गढ़जोड़ का विरोध हम लोग क्यों नहीं करते। एंकर के खिलाफ क्यों? जिस तरह आपने अपनी व्यथा व्यक्त की उससे एक बात स्पस्ट होता है की हर आदमी अपने रोजगार से बंधा है और उसकी मजबूरी होती है अपने बॉस की आज्ञा का पालन करना। ये कितना न्यायसंगत होगा की सारी जिम्मेदारी आपने जनता के ऊपर डाल दिया। मैंने आपका प्राइम टाइम में तोमर को लेकर दो दिन चले डिबेट को देखा था हमे बड़ा दुःख हुआ की तोमर के फर्जी काम को आपने इसलिए सपोर्ट किया की स्मृति ईरानी का भी तो डिग्री संदेह के घेरे में है । मान लेते है की स्मृति की डिग्री सही नहीं है क्या इसके कारन तोमर की डिग्री सही हो गया। एक पत्रकार का काम ये नहीं होता की एक गलत काम को इसलिए सही ठहराए की फला व्यक्ति भी तो चोर है।
    अगर आपको लगता है की मीडिया घरानो के दबाव में कुछ बातो में आपने अपने सिद्धांतो से समझौता किया है तो ये गलत है। अगर जनता उन झुण्ड का हिस्सा बनता जा रहा है जो सोशल मीडिया पैर आतंक फैला रहा है तो उसकी जिम्मेदारी भी आपकी और हमारी है। एक व्यक्ति अगर आपको एक अच्छे पत्रकार को तौर पैर पसंद करता है लेकिन वो देखता है की एक व्यक्ति समूह के लिए हफ़्तों उस चैनल को बुक कर लिया जाता है और उसका रिपोर्टिंग आप करते है तो उस व्यक्ति का विश्वाश हिल जाता है और उस समूह का हिस्सा बन जाता है जो ऐसे लोगों को खोज रहा होता है। अगर सचिन तेंदुलकर गलत काम करने लगे और कहे की bcci के लोगो के प्रेशर में किया तो उनको आदर्श मानने वाले के दिमाक पैर क्या असर पड़ेगा।एक आतंकवादी पकड़ा जाता है तो वो यही बोलता है की मैंने तो पैसे के लिए किया और मेरे आक ने जो कहा वही तो मैंने किया। एक समूह ऐसे लोगो के फ़िराक़ में हमेशा रहता है जो उनके विचारो से प्रभावित कर सके। सर आप ये कह कर नहीं बच सकते की मैं तो सिर्फ एंकर हूँ बाकी तो काम मीडिया घरानो का है। सिर्फ जनता या ऐसे समूहों पैर दोषारोपण से कुछ नहीं होने वाला। अगर आप ऐसे समूहों से लड़ना चाहते तो पहले आपको ऐसे मीडिया घरानो से निकलना पड़ेगा जो स्वतंत्र विचारो का हनन करते है जनता पैर तो सारी जिम्मेदारी डालने की आदत तो नेताओ का भी है कही तो आप भी वही नही तो कर रहे है?

    • फासीवाद साम्यवाद समाजवाद अब बीते युगों की देन होगये हैं भाई रविश कुमार जी । आप गुण्डागर्दी की बातकरते हैं वह भी व्यक्तिपरक ज़्यादा है वस्तुनिष्ठ कम हैं ।सामाजिक संचार माध्यमों ने जिसप्रकार से आपको बलशाली बनाया है वैसे ही टेक्नोलोजी केन्द्रित निगमवादी व्यवस्था ने उतना ही कमज़ोर कर दिया है । लड़ो और लड़ो लेकिन जीत निगमवादी व्यवस्था की होगी। व्यक्ति अकेला पड़ जाता है फिर भी मैं आपका साथ दूँगा एन डी टी वी की तरह ।

  8. प्रिय रविश जी

    मैं आपके पत्रकारिता का बहुत ही बड़ा प्रसंसक हूँ और कोशिस होती है की आपका एक भी कार्यक्रम देखना न भुलु! परन्तु अपने देश से दूर आपके कार्यक्रम को सुनाने के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से ही संतुस्ट रहना परता है. आप ने ऊपर जो भी लिखा है सब एकदम सत्य है। मैं भी अपने कई दोस्तों से जब आपका कार्यक्रम पर चर्चा की तो जबाब कुछ अटपटा और गालीगलौज से भरा हुआ था! मैं ये दोस्ती के शुरुआती दिनों से जनता हु की मेरे ये सब मित्र किसी न किसी हिन्दू संघठन से जुड़े है। मेरी इन सब से काफी बहस भी हुई अंतमे इनसबसे इंटरनेट मीडिया के सहारे जो लिंक था वो तोरणा परा। मुझे बहुत ही अफ़सोस है इन सबो की सोंच पर। परन्तु सायद इसका कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। मैं इनसे घबराता नहीं और अपने काम में लगा हूँ और सतत यह भी कोशिश कर रहा हूँ की हमारे समाज में मौजूद ऐसी सोंच में बदलाव आये. मैं दूर रहकर काफी लोगो से फोन पर ही बात कर उनलोगों से ऐसा न करने की गुजारिश करता हूँ। शायद एकदिन वो समझ पाये। आप से भी गुजारिश है की आप अपनी बेबाक पत्रकरिता में कोई बदलाव न लाये और अपने कर्मपथ पर आगे बढ़ते रहे। आपके पत्रकारिता से हमे बहुत कुछ सिखने का भी अवसर प्राप्त होता है।

    आपका एक श्रोता
    हरिश

  9. Sir, you are absolutely right. But please guide how a common man take the action against such bulling. Only to make it in friend from the list is not the way. Should we file complaint against the person in cyber crime cell, but no body take action there. Please give what are the action to show the anger against such bulling posts

  10. There is a cost of sensitivity and being a public personality which you are paying, to simplify, one can call it professional hazard. But its sad when people like you face such things But how can we forget that we live in a country where election are largely managed by Media cells not on issues, to a large extent and the middle class is so self centered that it sucks. Its not about you Ravish, its about us, its a slap on the face of middle class and right of expression.

  11. मेरे विचार में पत्रकार रविश कुमार उन पत्रकारों में से हैं तथा कथित गंगा जमुनी संस्कृति के ध्योतक हैं एक ऐसे टीवी चॅनेल पे विद्यमान हैं जिसे देख कर एक पीढ़ी जवान हुई है और बदक़िस्मती से उस पीढ़ी की मानसिकता भी इस टीवी चॅनेल की हो गयी है जिसे अपने धर्म व संस्कृति से कोई वास्ता नही बस दूसरों की संस्कृति की चिंता है, ये दूसरों से प्रश्न पूछ रहे हैं किंतु उत्तर से डरते हैं, क्या सभी इनकी बात से सहमत होंगे?
    अपने कार्यक्रम में ये जिस तरह से गैर भाजपा, गैर हिंदू पक्ष की खुलेआम तरफ़दारी करते हैं, भाजपा व हिंदू वक्ताओं को बोलने नही देते, टोका ताकि करते हैं उस से इनकी असल मानसिकता दिख जाती है, ये वही हैं जो बेशर्मी से बोलते हैं की ‘क्या हुआ जो भारत में मुसलमान जादा हो गये?’ हिंदू कम हो जाएँ इन्हे आपत्ति नही है पर मुसलमान कम नही होने चाहिए. कोई ज़रा इन्हे बताए की कश्मीर में मुसलमान जादा हैं इस लिए वहाँ पाकिस्तान और आइसिस के झंडे बुलंद होते हैं.
    ये गुजरात के चुनाओं में तो वहाँ झुग्गी झोपड़ी में घूम कर गुजरात विकास मॉडेल की पोल खोल रहे थे पर कभी दिल्ली की गलियों में घूम कर शीला सरकार की पोल नही खोली या अपने बिहार की झुग्गियों में घूम कर नीतीश कुमार के विकास के दावों की असलियत नही बताते. ये अपने अजेंडा के मुताबिक केवल भाजपा व हिंदू विरोधी विषय उठाते हैं लव जिहाद का मज़ाक उड़ाते हैं पर कभी तथ्यों को जाँचने की कोशिश करते हैं और ऐसे विषयों पे अपनी फूहड़ टिप्पणियाँ करते हैं.
    अब ये उत्तर इन्हे गाली गलोच लगे तो ये इनकी परेशानी है अगर ये अपनी आलोचना भी नही सहन कर सकते तो फिर इन्हे पत्रकारिता छोड़ कर कोई और काम ढूँढ लेना चाहिए

  12. Dear Ravish
    you keep it up what you believe & do not let the people will overcome on your thinking. In our country tolerence already finish from the hreats of the people. No one wants to listen others and try to understand there pain. You do whatever you are doing one day people will realise the truth.

  13. आदरणीय रवीश जी
    अभिवादन
    आपकी पीड़ा काफी हद तक जायज़ है ।परंतु यह सिर्फ आप के साथ नहीं है ।बलिक हर उस शख्स के साथ है जो व्यवस्था की कमियों को उजागर करता है ।जो समाज की विद्रूपताओं पर प्रहार करता है ।
    आपके अधिकाँश कार्यक्रमों का साक्षी हूँ ।आपकी मेहनत का भी कायल हूँ ।आपका प्रस्तुतिकरण भी लाजवाब है । पर कभी आपने अपनी सभी टिप्पड़ियों एवं निष्कर्षों पर स्वस्थ आत्मचिंतन किया है ।यदि किया होता तो इतने व्यथित न होते ।या फिर दूसरो पर सवार होने की आप की इच्छा आपको ऐसा करने से रोकती होगी ।
    बहरहाल आपभी की बार ट्रैक से उतरते है ।अनेकों बार गलत का साथ देते दीखते है ।एक खेमें की तरफदारी करते प्रतीत होते है ।अपने चैनल के आकाओं की अकांकांक्षाओ की पूर्ती कर रहे होते है ।उस सब से किसी का चरित्र हनन हो रहा है आपकई यह चिंता नहीं होती क्योंकि तब आप आपने योजना को अमलीजामा पहनानें की रौ में होते है ।उस सब से औरों को भी उतनी पीड़ा होती होगी यह आपकी सोच नहीं होती।फिर आप को इतनी पीड़ा क्यों होनी चाहिए।
    इस सब का मंतव्य यह नहीं कि मैं अभद्र भाषा ,टिप्पड़ी ,या चरित्र हनन का पक्षधर हूँ ।सभी को अपनी बात कहने का अधिकार तो है पर गाली गलौच या परिवार जनो को कुछ गलत कहने का अधिकार नहीं है ।हो ये रहा है की अधिकाँश लोग सवस्थ चिंतन एवं स्वस्थबहस् से बचकर बचकाना बलिक अहमकाना बहस में संलग्न है ।अपने अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति में संलग्न।

  14. Sir keep it up
    you are the only hope in this so called independent INDIAN media.
    if you surrender before this kind of fascism then it will be
    setback for young

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