आज ईद…कल से रोज़े (लघुकथा)

Eid 2

असगरी का दुपट्टा अब अपना रंग गंवा कर, सफेद और मटमैले के बीच के किसी रंग का हो चला था। किनारे की ज़री, कब धागों में बदल गई…पता भी नहीं चला। दुपट्टा जब डालती तो लगता कि बस एक दिन उसके सारे बाल भी इसी रंग के हो जाएंगे…

“और क्या तब तक इसी दुपट्टे से काम चलाना पड़ेगा? ले दे कर उसके पास एक यही दुपट्टा था और वो भी खाला की ननद की बेटी के निकाह में खरीदा था। नए कपड़े नहीं…तो नया दुपट्टा ही सही…”

उस निकाह को भी चार बरस हुए…न शौहर के पास पैसे आए, और न ही असगरी के पास नया दुपट्टा…
शौहर का नाम भी रमज़ानी था, रमज़ानी की विलादत चूंकि रमज़ान के पहले हफ्ते की थी, तो उसका नाम ही रमज़ानी पड़ गया। गो कि नाम रमज़ानी था लेकिन ज़िंदगी में रमज़ान की रौनक की जगह रोज़े ही गले पड़े हुए थे। मजदूरी करता था

“और आज कल तो सबको पता ही है कि मजूरी मिलती कहां है। रमज़ान खत्म होने को थे और उसके रोज़े भी…”

हालांकि रोज़े रखने में वो पानी भी न पीती…मुहल्ले की सारी औरतें, उसकी तारीफ करती कि वह ‘बड़ी ख़ुदावाली’ है…लेकिन दरअसल सच ये था कि रो़ज़े तो साल भर रहते ही थे…वह बस अपने रोज़े को सलामत करने के लिए पानी भी कम कर देती…


Eid
अकबरी गेट पर क्या भारी भीड़ थी, वो जब बर्तन-चौका कर के, सैयद साहब के यहां से निकली तो देखा कि चांद रात के एक हफ्ते पहले से ही नक्खास के चिड़िया बाज़ार से सआदतगंज और इधर अकबरी गेट से चौक तक बाज़ार सज गया था। जनानियां, अपने बच्चों को संभालती मोल-भाव कर रही थी…वो ये सब सालों से देख रही थी…शुरु में उसे रश्क होता,

“सब के पास कम से कम ईद के लिए कुछ पैसे हैं”

लेकिन अब उसे अपना पुराना दुपट्टा, जिस्म का ही हिस्सा लगने लगा था…कहीं चला गया तो जिस्म कट जाएगा जैसे…उसने एक नज़र भर के बाज़ार को देखा…गिलावटी क़बाबों की खुशबू को सांस में भरा और सुनहरी ज़री के काम वाले कुर्ते और सलवार की एक बांस की दुकान के पास खंखार कर बलगम थूकती हुई आगे बढ़ गई…
असगरी बड़बड़ा रही थी…

“सुनहरी ज़री का सूट पहिन कर…ऊपर से बुर्का पहिन लेंगी…तो क्या फ़ायदा…अब इस्लाम में रसूल सादगी की बात कह गए हैं…इन जनानियों को कौन समझाए…”

लेकिन उसके दिमाग में नया सुनहरे किनारे का गुलाबी दुपट्टा लहरा रहा था। उसको पता ही नहीं चला कि वो शाम को रमज़ानी का इंतज़ार करते सो गई, रात की नमाज़ भी रह गई। देर रात आंख खुली तो ताक में टिमटिमाती ढिबरी की रोशनी में उसने देखा कि रमज़ानी गहरी नींद में नीचे दरी बिछा कर सोया हुआ है। उसको बड़ा अफ़सोस हुआ लेकिन बदन टूट रहा था और वो उठ भी नहीं पाई। सुबह भी असगरी की आंख नहीं खुली…अचानक घर के बाहर से गाने की तेज़ आवाज़ से आंख खुली तो जल्दबाज़ी में वो बिस्तर से उठी तो उसकी छाती से कुछ गिरा…दुपट्टे की ओर हाथ बढ़ाया तो देखा वो सिरहाने ही था…नीचे देखा तो सुनहरे किनारे का एक गुलाबी दुपट्टा फर्श पर पड़ा था…
बिल्कुल नया…चमकदार सुनहरी किनारी…छींटिया शेड…और बीच में सलमा सितारा…उसको यक़ीन नहीं हुआ कि उसकी दुआ रात भर में ही सुन ली गई…तभी रमज़ानी घर में दाखिल हुआ…

“अरे…आज यह दाढ़ी में खिज़ाब करवा के आया है…ऐसा तो इसने कभी नहीं किया…” उसके कुछ कहने से पहले ही रमज़ानी ने हंस कर कहा…”तैयार भी हो जाएं बेग़म…आज टीले वाली मस्जिद चलते हैं…घूमना है कि नहीं…चलो फिर आपा के घर भी चलेंगे…पिछली ईद पर भी कहीं नहीं गए थे…और ये ईदी पहन के तैयार होना…”

Eid 3

असगरी की उम्र के पैंतीस साल बीतने वाले थे…औलाद भी नहीं थी…बस वो और रमज़ानी…पक्के पुल के सामने खड़ी वो टीले वाली मस्जिद की भीड़ देख रही थी…हल्की बूंदाबांदी शुरु हो गई थी…एक ओर ईमामबाड़ा था और पीछे से रूमी दरवाज़ा दिख रहा था…रमज़ानी दौड़ कर भुट्टा ले आया था, बीच में से तोड़ कर दोनों खा रहे थे…वो देख रही थी….

“लखनऊ इतना ख़ूबसूरत है…पहले तो कभी ग़ौर से देखा ही नहीं…पैंतीस साल में नहीं देखा…बताओ पीछे घंटाघर कितना ऊंचा है…और टीले वाली मस्जिद…इतने लोग आते हैं यहां…और मौसम भी कितना अच्छा हो गया है…”

रमज़ानी उससे कहना चाह रहा था…

“दूसरे निकाह की बात तय कर ली है…आपा का कहना है कि औलाद भी तो ज़रूरी है…और फिर अपने यहां तो…वहीं से 2100 रुपए मिले थे…एक जोड़ी कपड़े तुम्हारे लिए भेजने को कह रहे थे…सुनो…समझने की कोशिश करना….आपा कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं…कह रही हैं कि औलाद ज़रूरी है और निकाह जायज़…”

वो कुछ नहीं सुन रही थी…एक पल वो अपने नए दुपट्टे को देखती थी और एक पल पीछे से झांकते रूमी दरवाज़े को…उंगली से घंटाघर की ऊंचाई नाप रही थी…और भुट्टा खाती हुई, गोमती को बहता देख रही थी…आज ईद थी…और कल से फिर रोज़े…

– मयंक सक्सेना

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