जिस वक़्त मैं यह लिख रही हूं, तलाशी ख़त्म नहीं हुई है – तीस्ता सेतलवाड

सरकार कारसाज़ है, भगवान की ही तरह…व्यापमं से लेकर तमाम और मामलों में सीबीआई जांच की ज़रूरत को ही नकार देने वाली सरकार ने मानवाधिकार कार्यकर्ता और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराही जाती रही सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सेतलवाड़ के घर पर सीबीआई का छापा पड़वाया…तीस्ता का अपराध वाकई बहुत बड़ा है…तीस्ता सेतलवाड़ गुजरात के 2002 के दंगों के पीड़ितों की क़ानूनी लड़ाई लड़ रही हैं…इंसाफ की ऐसी लड़ाई, जिसका रास्ता सीधे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री से हो कर जाता है…सरकारें किस तरह से दरअसल ख़ुद दुर्भावना से प्रेरित हो कर आपराधिक षड्यंत्र करती हैं, इसकी बानगियों की यह बस शुरुआत है…अपने घर के चप्पे-चप्पे को खंगाल रहे सीबीआई अधिकारियों को देखती बैठी तीस्ता ने 14 जुलाई 2015 की शाम यह नोट लिखा…अंग्रेज़ी का मूल नोट इसी वेबसाइट पर है, हिंदी अनुवाद इस तरह से होता शायद…

एक अदने सेअनुवादक की टिप्पणी

Teestaजिस वक़्त मैं यह लिख रही हूं, तलाशी ख़त्म नहीं हुई है। यह स्तब्ध कर देने वाला है कि जिस वक़्त मेरे परिसर में तलाशी लेते सीबीआई के दर्जन भर सदस्यों को मैं देख सकती हूं, दिल्ली से प्रवक्ता अपनी ग़लत सूचनाओं और आधिकारिक अनर्गल ट्वीट्स के ज़रिए जनता और हमारे समर्थकों की विशाल संख्या को गुमराह करने में लगे हैं।

हम फिर से दोहराते हैं, कि हमारे विचार से हमने किसी भी क़ानून का उल्लंघन नहीं किया है। यह सबसे पहले 2014 में गुजरात पुलिस द्वारा शुरु किए गए हमारे प्रति दुर्भावना से प्रेरित मुकदमों की श्रृंखला की ही अगली कड़ी है, क्योंकि अब दिल्ली में भी उन की ही सरकार है। सीबीआई ने भी वही कागज़ात लिए हैं, जो पहले ही गृह मंत्रालय द्वारा निर्देशित एफसीआरए की जांच में उपलब्ध करवाए जा चुके हैं। गुजरात पुलिस को भी 25 हज़ार से अधिक कागज़ात उपलब्ध करवाए जा चुके हैं। जब फरवरी 2015 में वे अनर्गल और अधीर प्रयासों के बावजूद मुझे हिरासत में लेने में सफल नहीं हो सके, तब गजरात सरकार के गृह मंत्रालय ने ही केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखा, जिसका नतीजा ताज़ा घटनाक्रम के रूप में सामने है।

यह शर्मनाक राजनैतिक प्रतिशोध है। 27 जुलाई, 2015 से ज़किया जाफ़री केस की अंतिम सुनवाई शुरु होने वाली है। नरोडा पटिया की अपीलें (कोडनानी और बजरंगी) भी कल ही गुजरात हाईकोर्ट में सुनी जाएंगी। यह और कुछ नहीं बल्कि किसी भी तरह सार्वजनिक न्याय के प्रयासों को कमज़ोर करना और सुनिश्चित कर देना कि इन मामलों में कभी इंसाफ न हो सके।

हमने सीबीआई को पहले ही पूरे सहयोग का आश्वासन लिखित में भेजा था। यह तलाशी और कुछ नहीं बस धमकाने और अपमानित करने का प्रयास भर है। हमको शर्मिंदा होना चाहिए कि व्यापमं जैसे घोटाले हो रहे हैं, 50 से अधिक लोगों की मौत हो जाती है, आसाराम बापू के मामले में गवाहों की हत्या होती जा रही है; सीबीआई राजनेताओं से जुड़े हाई प्रोफाइल मामलों में अपील ही नहीं कर रही है; लेकिन यह एजेंसी, जनसंहारों के पीड़ितों की लड़ाई लड़ रहे, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ इस्तेमाल हो रही है। यह ब्रिटिश राज से भी बुरी स्थिति है।

मैं दोहराती हूं कि सबरंग कम्युनिकेशन्स ने कोई क़ानून नहीं तोड़ा है।

एक: एफसीआरए का सेक्शन 3, 2010 कुछ विशिष्ट व्यक्तियों (राजनैतिक दल एवम् उनके पदाधिकारी, सरकारी कर्मचारी और पंजीकृत अख़बारों तथा समाचार प्रसारण से जु़ड़े लोग) को विदेशी फंडिंग हासिल करने से रोकता है।
लेकिन अगले ही सेक्शन में, सेक्शन 4, जिसका उपशीर्षक है, ‘वे लोग, जिन पर सेक्शन 3 लागू नहीं होता है,’ कहता है, “सेक्शन 3 में दिए गए प्रावधान उन लोगों पर नहीं लागू होंगे, जो विदेशी फंडिग सेक्शन 10 – ए के मुताबिक अपने अधीन काम करने वालों के लिए सैलरी, पारिश्रमिक या किसी अन्य प्रकार का मेहनताना देने के लिए अथवा भारत में सामान्य व्यापारिक लेनदेन के मुताबिक ले रहे हैं।”

SCPPL, जो मासिक पत्रिका कम्युनलिज़्म कॉम्बेट प्रकाशित करती है, उसने 2002 में ही फोर्ड फाउंडेशन के साथ एक परामर्श अनुबंध किया था, जिससे “जाति और साम्प्रदायिकता के मुद्दे के लिए” एक पूर्वनिर्धारित गतिविधियों के साथ काम किया जाए, जिसका कम्युनलिज़्म कॉम्बेट अथवा जावेद आनंद और तीस्ता सेतलवाड़ के पत्रिका के सम्पादन के पारिश्रमिक से कोई सम्बंध नहीं था।
सबरंग कम्युनिकेशन्स ने परामर्श अनुबंध, प्रतिष्ठित क़ानूनी सलाहकारों की सलाह के बाद ही हस्ताक्षर किया था, कि इस प्रकार के अनुबंध के द्वारा एफसीआरए के सेक्शन 4 का उलंल्घन नहीं हो रहा है, इसलिए प्राप्त परामर्श फीस (न कि अनुदान अथवा दान) किसी प्रकार से एफसीआरए का उल्लंघन नहीं करता है।
वास्तव में फोर्ड फाउंडेशन ने इस में परामर्श फीस की हर किस्त के साथ, टीडीएस भी काटा था। इस भुगतान के बदले में संचालित गतिविधियां अनुबंध के मुताबिक थी। गतिविधियां और वि्त्तीय रिपोर्ट, फोर्ड फाउंडेशन की संतुष्टि से हर वर्ष जमा की जाती रही।

दो दूसरी बात, सबरंग ने इसका रेकॉर्ड रखा है और, एफसीआरए की टीम के 9 और 10 जून, 2015 के मुंबई दौरे के दौरान उसकी प्रति एफसीआरए को भी दी। इसके अतिरिक्त एफसीआरए टीम द्वारा मांगे गए दस्तावेज भी उनको भेज दिए गए।

nation4तीन: तीसरी बात यह कि जानबूझ कर या किसी और कारण से, इस पक्षधरता को उस लॉबीइंग से भ्रमित कर रही है, जो अमेरिकी राजनैतिक व्यवस्था का भाग है, जबकि भारत में सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट और एनजीओ सरकार के साथ उसका ध्यान महिलाओं, बच्चों, दलितों, धार्मिक अथवा लैंगिक अल्पसंख्यकों और शारीरिक विषमताओं के शिकार लोगों की न्यायसंगत मांगों की ओर आकृष्ट करवाने के लिए सरकार के साथ जूझते हैं।

इस प्रकार की पक्षधरता के कामों को लॉबीइंग के साथ जोड़ने वाली बात ही अतार्किक है।
इसलिए सबरंग कम्युनिकेशन्स इन सभी आरोपों को खारिज करता है।

चार:  विधि और उचित प्रक्रिया में विश्वास करते हुए भी, हम विश्वास करते हैं कि राज्य के पास नियंत्रण में किसी भी प्रकार की असहमति को कुचल देने, धमकाने, और बलपूर्वक समर्पण करवाने के असंख्य उपाय हैं।

 

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