“हम अगर एकजुट रहेंगे तो बेहतर मुकाबला कर पाएंगे ” कहा महाराष्ट्र के डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस संजीव दयाल ने

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तीस्ता सेतलवाड :    नमस्कार आज के कम्युनँलिज्म कॉम्बैट और हिलेले टी.व्ही. के इंटरव्यू में हमारे खास मेहमान हैं, श्री. संजीव दयाल महाराष्ट्र के डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस, जो बहुत सीनियर पुलिस ऑफिसर हैं।  संजीव दयाल जी नमस्कार।

संजीव दयाल :       नमस्कार।

तीस्ता सेतलवाड :    अड़तीस साल के आपके अनुभव के अनुसार आज सब से बड़ी चुनौती भारत के पुलिस के लिए क्या हैं?

संजीव दयाल :       आज देश के लिए हमारे स्टेट के लिए सब से बड़ी अगर चुनौती कोई हैं, तो वह हैं दहशतवाद। दहशतवाद एक ऐसे उभर कर आया हैं और हमारे स्टेट ने, हमारे सिटी ने कई ऐसे दहशतवादी हमलो के सामने गए हैं, मुकाबला किया हैं, देखा हैं।  तो जरूर आज दहशतवाद देश के लिए सब से बड़ी चुनौती हैं। लेकिन उसके साथ लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिजम एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर आ रहा हैं।

तीस्ता सेतलवाड :    लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिजम को आपको लगता हैं की आनेवाले दिनों में भी एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ा करेगा।

संजीव दयाल :       जरूर रहेगा, ऑलरेडी हम चालीस साल से ऊपर लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिजम का मुकाबला कर रहे हैं और मुझे लगता हैं की आने वाले कुछ सालों तक हमे इसका मुकाबला करना पड़ेगा।

तीस्ता सेतलवाड :    पेशावर के जो बच्चों के उपर आतंकवादी हमला हुआ उसके बाद और अफगानिस्तान में जो डेवलपमेंटस हो रहे हैं उसके बाद हमारी लिए क्या क्या समस्याए खड़ी हो सकती हैं?

संजीव दयाल :       पेशावर हमले ने हमे यह जरूर दिखाया हैं, उससे यह साफ़ हैं के दहशतवादी किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। जिस क्रूरता से, और बर्बरता से यंग बच्चों के ज़िन्दगीओं को ख़तम किया गया उससे दहशतवाद का एक नया चेहरा जरूर हमारे सामने आया हैं। और इस नयी बर्बरता का हमे मुकाबला करना होगा।

तीस्ता सेतलवाड :    आम आदमी पुलिस के साथ यह मुकाबला कैसे कर सकता हैं ?

संजीव दयाल :       आम आदमी दहशतवाद का मुकाबला करने के लिए बहुत कुछ कर सकता हैं।  सबसे पहले हमे एकजुट होके रहना हैं, उसके बाद हमे अपने आस पास के लोगो के बारे में कौन हैं, या कोई सस्पीशियस व्यक्ति हमारे बीच में हैं, या कोई सस्पीशियस वस्तु हमे अगर दिखती हैं तो हमे उसके बारे में जरूर सतर्क रहना हैं।

तीस्ता सेतलवाड :    एक होके रहना बहुत जरुरत हैं, आपको लगता हैं यह एकता हमारे बीच नहीं हैं।

संजीव दयाल :       देखिये जब भी कोई बड़ा हादसा होता हैं तो उस हादसे में उस त्रास्ति का मुकाबला हम जरूर एकजुट होके करते हैं। लेकिन पंद्रह-बीस दिन, एक महीने के बाद हम लोग अपने अपने रास्तों पर निकल जाते हैं। मुझे लगता हैं की हम हमेशा ही अगर एकजुट होके रहेंगे तो हम बेहतर मुकाबला कर पाएंगे।

तीस्ता सेतलवाड :    सर, एक सव्वा साल पहले २०१३ में आपने उत्तर प्रदेश के डी. जी. पी. ने और तमिलनाडु की डी. जी. पी. ने एक ऐसी समस्याएं पे ध्यान सरकार का दोहराया था साम्प्रदायिकता के बारे में और एक तरह के माइनॉरिटीज और पुलिस के भीतर जो एक अंतर हैं ट्रस्ट डेफिसिट हैं उसके बारे में, आपके स्पेशल रिपोर्ट्स भी सबमिट हुए थे यह मसाएल पे उसके बात कुछ कदम उठाये हैं सरकार ने ?

संजीव दयाल :       देखिये यह जो कमिटी की रिपोर्ट थी गए साल जो डी. जी. पी. की काँन्फेरेंस हुई थी दिल्ली में उसमे यह रिपोर्ट पेश की गयी थी। और अभी तक की जो हमारी सिस्टम हैं वह ऐसा हैं की मेजबान ऑर्गनाइजेशन हैं, यानि के इंटेलिजेंस ब्यूरो वह सब रिपोर्ट का सिनोप्सिस बना के भारत सरकार में गृह मंत्रालय को दे देते हैं। जरूर इस केस में भी ऐसा हुआ हैं, आगे गृह मंत्रालय ने क्या किया मैं उसके बारे में जानता नहीं।  बतौर एक मेंबर के इस कमिटी के मैंने यह जरुरी समझा के मैं अपनी स्टेट \गवर्नमेंट को भी इस कमिटी के इस मामले से अवगत कराउ तो हमने गए साल जुलाई में अपनी स्टेट गवर्नमेंट को भी इसके बारे में अवगत कराया। लेकिन मुझे नहीं लगता की जो चुनी हुई सरकार हैं उसके सामने तक यह रिपोर्ट गयी।

तीस्ता सेतलवाड :    और जो नयी सरकार आयी हैं महाराष्ट्र में उन्होंने कुछ इसके बारे में सोच-विचार किया हैं क्या ?

संजीव दयाल :       अगर यह रिपोर्ट जाएगी उनके सामने तो वह जरूर उसके बारे में सोच-विचार करेंगे, उनसे हमारी जो मौखिक बात चित हुई हैं उसमे बड़ा सकारात्मक रवैय्या उनका अब तक रहा हैं।

तीस्ता सेतलवाड :    सर पुलिस रिफार्म का मामला पुलिस के व्यवस्था में सुधार उसके  बारे में क्या क्या कदम उठने चाहिए ?

संजीव दयाल :       पुलिस व्यवस्था में सुधार के बारे में और पुलिस रिफॉर्म्स के बारे में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने छह हिदायते दी हैं प्रकाश सिंघ के केस में, उसमे से कुछ चीज़ों पे हमारी सरकार ने कदम उठाये, उनमे कुछ बदलाव भी लाया हैं, एक सकारात्मक बदलाव हैं।  लेकिन हमे वह छह हिदायतों पे सिमट के नहीं रह जाना हैं, उसका दायरा जो हैं वह आगे बढ़ाना जरुरी हैं और जो एक आम आदमी के लिए पुलिस कैसे बेटर सर्विस दे सकती हैं, और उसको वह बेटर सर्विस देने के लिए क्या क्या जरूरते हैं, उनको कैसे पूरा करना चाहिए वह रिफॉर्म्स असली पुलिस रिफॉर्म्स होता हैं।

तीस्ता सेतलवाड :    लगता हैं की आपको होगा वह?

संजीव दयाल :       उम्मीद तो रखनी चाहिए।

तीस्ता सेतलवाड :    महाराष्ट्र पुलिस में सबसे बड़ी समस्या क्या हैं हाउसिंग को लेकर हैं, बच्चों की तालीम को लेकर, शिक्षण को लेकर हैं पुलिस ऑफिसर की, और सरकार इसकी तरफ ध्यान दे रही हैं की नहीं ?

संजीव दयाल :       डेफिनेटली हमारे लिए हमारे फ़ोर्स की हाउसिंग एक बहुत बड़ी समस्या हमारे लिए हैं। सरकार ने जो निकस अपने लिए बनाया हैं के हम यह सँटीजफँक्शन लेवल देंगे उसको हमे पहुँच ने के लिए एक बहुत बड़ी मात्रा में फंड्स की जरुरत हैं।  अब सरकार ने एक हाउसिंग गृह निर्माण कल्याण मंडल जो हैं उनको ये अलाउ किया हैं की वह मार्किट से लोन लेके गृह निर्माण के कार्यक्रम को आगे बढ़ाये। उसके अलावा भी चार एफ. एस. आय. देने का शासन ने तय किया हैं उससे जरूर इस मामले में सुधार होगा।

तीस्ता सेतलवाड :    सर महिलाओं के ऊपर जो हिंसा और अत्याचार बढ़ रहे हैं, और उसकी रिपोर्टिंग भी बढ़ रही है, उसको लेकर पुलिस क्या कर सकती हैं और बाकी समाज क्या कर सकता हैं ?

संजीव दयाल :       देखिये जो बढ़ रहा हैं वह एक सकारात्मक बदलाव हैं। हमारे जो स्टेटिस्टिक्स हैं वह यह दिखा रहे हैं की, सीरियस क्राइम टेप का और मोलेस्टेशन में।  उसमे रिपोर्टिंग पहले के सालों से ज्यादा अब इस साल हो रही हैं जो इसलिए हैं की लोग आगे आके अपनी शिकायत दर्ज करा रहे हैं।  और यह एक अच्छी बात हैं की शिकायत दर्ज हो रही हैं।  इसमें मैं यह समझता हूँ के सोसाइटी ने समाज ने सर्वाइवर  के साथ खड़े होके एक तो उनको सपोर्ट करना बहुत जरुरी हैं।  दूसरा एक अंकुश जो आज नहीं हैं समाज में जिसकी वजह से यह वारदाते होती हैं थोड़ा उसमे से समाज का स्वतः का जब अंकुश होगा तब कुछ इसमें बात आगे बनेगी।

तीस्ता सेतलवाड :    आप कहेंगे की हमारे पुलिस में और बाकी सरकारी यंत्रणों में सांप्रदायिक सोच कही न कही घुस गयी हैं।

संजीव दयाल :       सोच घुस गयी हैं पूरी यंत्रणा में यह कहना ठीक नहीं होगा। हाँ, पुलिस  के कुछ पर्सनल में कुछ लोगों ने किसी मौके पर जरूर ऐसा एक्शन उनकी तरफ से हुआ होगा जिससे लगेगा की वह सांप्रदायिक हैं।  लेकिन यह कहना की उसकी वजह से पूरी यंत्रणा में सोच वैसी हैं यह कहना शायद ठीक नहीं होगा।

तीस्ता सेतलवाड :    पुलिस के अंदर अलग अलग समुदाय के तपकों की नुमायन्दगी होनी चाहिए, मगर ये आंकड़े दिखाते हैं की जितनी नुमायन्दगी होनी चाहिए उतनी नहीं हैं, तो उसके लिए क्या किया जाना चाहिए।

संजीव दयाल :       देखिये यह बात सही हैं की हमें जिस मात्रा में उमीद हैं की माइनॉरिटीज का योगदान रहना चाहिए सर्विसेस में, खास तौर से पुलिस में उस मात्रा में नहीं हैं।  और महाराष्ट्र का अगर हम बात करे तो यह इसलिए होता हैं की, माइनॉरिटीज में जिस तरह एजुकेशन मराठी में होना चाहिए वह आज उतने स्तर में नहीं हैं।  शायद एजुकेशन उर्दू में होती है मुस्लिम माइनॉरिटीज की बात करे तो, वह मराठी के एग्जाम्स में जितना अच्छा करना चाहिए, उतना अच्छा कर नहीं सकते।  तो शायद मराठी के बारे में उनको रिक्रूटमेंट से पहले ज्ञान देना, उनका उस बारे में उनको इन्फोर्ट्स करना रेइनफोर्ट्स करना उनके ज्ञान को यह जरुरी हैं।

तीस्ता सेतलवाड :    कोर्ट के कभी कोई जजमेंट्स में अगर कोई पुलिस ऑफिसर के इन्वेस्टीगेशन की निंदा होती हैं तो सिस्टम क्या कदम उठता हैं ?

संजीव दयाल :       कोर्ट्स से हुए हुवे जजमेंट्स का अगर हम एनालिसिस करे और अँक्विटल्स का एनालिसिस करे, तो हम यह देखते हैं की ज्यादा तर अँक्विटल्स जो ऑय-विटनेसेस हैं और कम्प्लैनेन्ट खुद उनके होस्टाइल होने से होता हैं। आज भी सिस्टम अगर थोड़ा सा भी अगर किसी भी जजमेंट्स में किसी इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर के अगेंस्ट कोई एडवर्स कमेंट्स आता हैं, कोई रिमार्क्स आता हैं तो हम उसके बारे में सेंसिटिव हैं।  हम उसको देखते हैं, अँनलाइज करते हैं की अगर उसमे कोई हमे दीखता हैं की यह रिमार्क या यह गलती इन्वेस्टीगेशन में जान भुज के छोड़ी गयी या नेग्लिजेंस की वजह से रही तो इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर पे कदम उठाया जाता हैं।

तीस्ता सेतलवाड :    क्या आज नौजवान पुलिस में आ रहे हैं?

संजीव दयाल :       नौजवान जरूर आ रहे हैं पुलिस में लेकिन मैं उनसे यह बात जरूर कहना चाहूंगा की पुलिस की नौकरी यह एक बहुत डिफिकल्ट नौकरी हैं। आपको दिन भर के लम्बे काम के बाद शायद आपको सिवाय एक बदनामी के या गाली के कुछ न मिले तो आपको उस हालात में भी अपना कूल बनाये रखना जरुरी हैं।  डिफिकल्ट हैं और आप में एक समाज के प्रति उनको सर्विस देने का जज़्बा होना बहुत जरुरी हैं।

तीस्ता सेतलवाड :    संजीव दयाल जी पुस्तक पढ़ना बहुत पसंद करते हैं, अभी आप क्या पढ़ रहे हैं ?

संजीव दयाल :       जी हाँ, आजकल मैं रोमिला थापर जी की पुस्तक हैं पास्ट इस प्रेजेंट उसका वाचन कर रहा हूँ।

तीस्ता सेतलवाड :    कैसी लगी पुस्तक ?

संजीव दयाल :       अभी मैंने शुरू की हैं, लिहायज़ा बहुत ही अच्छी हैं।

तीस्ता सेतलवाड :    बहुत बहुत शुक्रिया सर हमारे साथ बात करने के लिए।

संजीव दयाल :       धन्यवाद, धन्यवाद।

तीस्ता सेतलवाड :    बहुत बहुत शुक्रिया।

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