सांझी शाहदत सांझी विरासत

अवतार सिंह पाश की याद में !

avtar singh pash

“नौजवानों जो तबियत में तुम्हारी खटके, याद कर लेना हम को भी भूले भटके” ….. बिस्मिल की ये पंक्तियाँ आज (23 मार्च, शहादत दिवस) से बहुत याद आ रही हैं. सिर्फ इसलिए नहीं कि वो भगत सिंह का शहादत दिवस था. भगत सिंह को तो सबने अपने अपने ढंग से याद किया ही. चाहे वो मुख्यधारा की पार्टियाँ हो चाहे वामपंथी गुट, सबने अपने अपने ढंग से खुद को भगत सिंह की विरासत का वारिस घोषित करने की कोशिश की. ये पंक्तियाँ उनके लिए आ रही थी जिन्हें शायद इस कदर याद नहीं       1950-1988

किया गया जैसे की और शहीदों को. २३ मार्च को भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव के अलावा एक और क्रन्तिकारी का शहादत दिवस था. ये शहीद आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजो से लडता हुआ नहीं बल्कि अपने ही देश के कठमुल्लाओं की मुखालफ़त करते शहीद हुआ. शहादत का दिन वही था 23 मार्च, पर साल अलग था. दोनों की शहादत में लगभग छह दशको का अंतर है पर शोषण मुक्त इंसाफ पसंद समाज का सपना दोनों का साँझा था .

पाश की कविताओं से मेरा तारुफ़ उसी साल हुआ, जिस साल उनकी शहादत हुई थी. शायद दिल्ली विश्वविद्यालय में उनकी याद में कोई कार्यक्रम आयोजित किया गया था. कार्यक्रम में उनकी कविताओं के हाथ से लिखे कुछ पोस्टर्स भी लगे थे. उनमे  से एक पोस्टर मशहूर कविता “सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनो का मर जाना“ का भी था, जो पिछले कुछ सालों बहुत प्रसिद्ध हुई है.  आलम ये है कई लोग पाश को मात्र इस कविता से ही जानते है. सच मानिए उस समय मेरा ध्यान इस कविता से कहीं ज्यादा  नीचे दी गयी  पंक्तियों ने खींचा था.

“हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिये
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिये
हम चुनेंगे साथी, जिंदगी के टुकड़े

 

हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकी है
जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी”

वामपंथी राजनीति की तरफ ताज़ा ताज़ा रुझान था और उस समय इस तरह की कविताएँ कुछ ज्यादा ही गहरी उतरती थी. अन्दर तक झकझोरने की ताक़त थी उनकी शायरी में. मालूम नहीं क्यों, उनकी एक ही कविता इतनी प्रसिद्ध क्यों हुई और बाकी का इस कदर प्रचार नहीं हो पाया, हालाँकि उनकी ज्यादातर रचनाएं दिलकश हैं. उनकी कुछ  कवितायेँ जहन में कुछ इस कदर  हावी हुई की हर लम्हे जुबान पर  रहती थी. उनकी अन्य रचनाओं को पढ़ने की चाहत बढती गयी. इसी दौरान “बीच का रास्ता नहीं होता” हाथ लगी. ना जाने उसे कितनी बार पढ़ा और कितनी बार दोस्तों को सुनाया. उनकी अन्य किताबों की तलाश शुरू हुई पर नाकाम रहे. फिर एक दिन किसी शख्स ने बताया कि पाश मूल रूप से पंजाबी कवि हैं और उनकी अधिकतक किताबें पंजाबी में छपी है. “बीच का रास्ता नहीं होता”  तो उनकी कविताओं का अनुवाद है. उनके किसी और चाहने वाले ने तो यहाँ तक कह कर जले पर नमक छिड़क दिया कि जो लुफ़्त मूल रचनाओं में है वह अनुवाद में कहाँ. मैं अनुवादित कविताओं का इस कदर मुरीद था की मूल रचना की कल्पना करना मुश्किल था. लेकिन यह मानना पड़ेगा कि प्रो. चमन लाल (जवाह लाल नेहरु विश्वविद्यालय) का यह अनुवाद बेजोड़ था. बाद में पता चला कि प्रोफ़ेसर साहब कोई साधारण अनुवादक नहीं बल्कि पंजाब की क्रन्तिकारी विरासत के जाने माने समीक्षक है. भगत सिंह के कई लेखो और पत्रों को लोगों के सामने लाने और उनकी विचारधारा को प्रचारित प्रसारित करने में उनकी अहम् भूमिका रही है. पाश की कविताओं का जज़्बा और जूनून उनके अनुवाद में भी महसूस होता है. नीचे दी हुई पंक्तियों  पढ़ कर लगता नहीं है कि अनुवाद मूल कविता से कमतर है.

“यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाये
आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे खतरा है”

हालंकि उनकी अधिकतर कविताओं में शब्दों का चयन भी उनके क्रांतिकार तेवरों से मिलता जुलता ही होता था पर कुछ क्रन्तिकारी कविताओं के अल्फ़ाज गजब की रूमानियत लिए हुए हैं.

 “हम झूठमूठ का कुछ नहीं चाहते

हम चाहते है अपनी हथेली पर कुछ इस तरह का सच

जैसे गुड की चाशनी में कण होता है

जैसे हुक्के में निकोटिन होती है

जैसे मिलन के समय महबूब की होठों पर

कोई मलाई जैसी चीज़ होती है”

 

पाश से मेरा परिचय  उनकी कविताओं ( वह भी “अनुवादित” ) के जरिये ही है और उनके जिंदगी के अन्य पहलूओं की जानकारी जो इधर उधर सुनी बातों और उन पर लिखे गए लेख  पढ़  कर ही हुई है, वो आपसे बाँट रहा हूँ.

नौ सितंबर 1950 को जन्मे पाश का मूल नाम अवतार सिंह संधु था. उन्होंने उन्होंने महज 15 साल की उम्र से कविता लिखनी शुरू कर दी थी पर साहित्य जगत में शोहरत उन्हें अमरजीत चंदन की पत्रिका ‘दस्तावेज’ से मिली. उनकी कविताओं का पहला प्रकाशन 1967 में हुआ.

उनको जानने वालों के अनुसार पाश मार्क्सवाद में अटूट यकीन रखते थे और भाकपा से लेकर नक्सलवादी गुटों तक उनका सम्बन्ध रहा. उनका सपना एक शोषण मुक्त समाज का था जहाँ सत्ता सर्वहारा के हाथ में हो. उन्होंने जिस समय राजनीति में कदम रखा तब पंजाब में क्रांतिकारी संघर्ष  उभार पर था. उसी संघर्ष की पृष्ठभूमि में उन्होंने अपनी सारी रचनाये लिखी और शोषणकारी समाज  और सरकारी दमन का खुल के विरोध किया. आन्दोलन में शिरकत और दमन विरोधी कविताओं का खामिजना उन्हें दो साल जेल में गुजार कर चुकता करना पड़ा. सत्तर के दशक के दुसरे भाग में खालिस्तानी आन्दोलन उभार पर था. पाश किसी भी तरह के कठमुल्लावाद की मुखाल्फत करते थे और धर्म पर आधारित खालिस्तानी राष्ट्र के विरोधी थे. इसी विरोध की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. सन 1988 में उनके अपने ही गाँव तलवंडी में उनकी हत्या कर दी गई.  जीते जी पाश ने भगत सिंह की क्रन्तिकारी विरासत और शोषण मुक्त समाज के सपने को आगे बढाया. मरने के बाद आज भी उनकी कवितायेँ उसी परम्परा का निर्वाह कर रही हैं.

अब विदा लेता हूं
मेरी दोस्त, मैं अब विदा लेता हूं
मैंने एक कविता लिखनी चाही थी
सारी उम्र जिसे तुम पढ़ती रह सकतीं
उस कविता में
महकते हुए धनिए का जिक्र होना था
ईख की सरसराहट का जिक्र होना था
उस कविता में वृक्षों से टपकती ओस
और बाल्टी में दुहे दूध पर गाती झाग का जिक्र होना था

(Critique  पत्रिका से साभार )  

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