पी. साईनाथ से एक खास मुलाकात

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तीस्ता सेतलवाड : नमस्कार, कम्युनॅलिज़म कॉम्बैट की एक खास मुलाकात में आज हम मुलाकात
करेंगे वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ से। पी. साईनाथ जी ३१ जुलाई तक द हिन्दू न्यूजपेपर के रूल अफेयर्स एडिटर थे। उनकी किताब एवरीबॉडी लव्स अ गुड ड्राउट को एक खास काम माना जाता हैं। आज हम उनसे मुलाकात करेंगे कॉर्पोटाईजेशन ऑफ़ मीडिया के बारे में और और कई अन्य सवाल। आज के पत्रकारिता में कॉर्पोटाईजेशन का क्या असर है?

पी. साईनाथ : बहोत, बहोत असर हैं। इसलिए की देखिये पहले हम, पहले जब हम देख रहा था हिंदी मीडिया और अंग्रेजी मीडिया में बहोत ज्यादा फर्क था, जमीन आसमान फर्क था, जमीन आसमान का फर्क था। लेकिन आज पूरा इंडियन लैंग्वेज मीडिया जो हैं वो क्लोन बन गया अंग्रेजी मीडिया का, वो बन रहा हैं, अभी भी पूरा नहीं हुआ हैं। ये सेविंग ग्रेस हैं की पूरा नहीं हुआ, लेकिन हो रहा हैं। जिस दिन से टाइम्स ऑफ़ इंडिया एक बहोत बढ़िया न्यूजपेपर जो था, नवभारत टाइम्स उसको लेके एक ट्रांसलेशन शीट बना दिया। २००५ में हिंदी बिड का सबसे बड़ा न्यूजपेपर या दूसरा न्यूजपेपर, दो नंबर का। मैंने पढ़ा एक दो तिहाई एक पेज का, दो तिहाई आयटम रॅपर एमीनम के ऊपर। मैंने सोचा यार हिंदी बिड में एमिनम का नाम कौन सुना हैं। लेकिन एक सिस्टेमेटिक अप्रोच हैं वो वैल्यू सिस्टम लाइफस्टाइल प्रमोट करने के लिए, एक एडवरटाइजिंग ऑडियंस बनाने के लिए, तो जब एक मैगज़ीन जैसा इंडिया टुडे जैसा, अंग्रेजी में आती हैं, हिंदी में आती हैं, तमिल में अभी पता नहीं के तमिल एडिशन हैं या नहीं। लेकिन चार पांच भाषा में आ चूका हैं। और उसमे कोई फर्क नहीं। इतना सेंट्रलाइस्ट हैं अगर एक रिपोर्टर, ये बहोत सारा मैगज़ीन का हैं, सिर्फ इंडिया टुडे के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ। बहोत सारा, जो सेंट्रलाइस्ट मैगजीन्स कंट्रोल हैं। अगर आपका रिपोर्टर तमिलनाडु में हैं, तमिल में रिपोर्ट फाइल करते हैं, वहा चेन्नई डेस्क में वो अंग्रेजी में ट्रांसलेट करके बेचता हैं दिल्ली सेंट्रल डेस्क में। वहा वो पढ़ के अंग्रेजी में एडिट करके फिर बेचता हैं री-ट्रांसलेशन के लिए तमिल में। एक मैगज़ीन मैंने उसका नाम नहीं लेता हू, लेकिन, इसलिए की उनका पत्रकार फस जायेगा, हमको पता हैं ताकि देखो यह लोग जो दिल्ली में बैठे हैं वो बहोत कॉलेज लेवल लड़के हैं, और वो जो लैंग्वेज यूज़ करते हैं हम तमिल में कैसा ट्रांसलेट कर सकते हैं। मैंने पूछा क्या लैंग्वेज हैं उसका, उसने कहा यार मैं तमिल में ये कैसे ट्रांसलेट करू? ‘कूल चिक मैन’ क्लासिकल लैंग्वेज ऑफ़ तमिल में इसको कैसा ट्रांसलेट करू ‘कूल चिक मैन’। वो बिचारा रो रहा था कुछ ट्रांसलेशन……..

तीस्ता सेतलवाड : मुझे अभी भी याद हैं की हमारे महाराष्ट्र में, महाराष्ट्र टाइम्स हालाँकि शुरू से भ्रमनिकल था, मगर एक इंटेलएक्चुअल क्लास में उसकी बहोत बड़ी अहमियत थी। वो महाराष्ट्र टाइम्स में जब उसका स्टॅपलाइन पुरे संडे टाइम्स की तरह बना दिया, और पुरे वैसे ही मॉडेल्स, वैसे ही पिन-अप्स, वैसे ही फोटोग्राफ्स, तो कोई मतलब वो महाराष्ट्रियन तेहज़ीब के साथ उनका कोई लेना देना नहीं।

पी. साईनाथ : नहीं, ये पर्फेक्ट्ली नार्मल हैं, इसलिए की जब आप पत्रकारिता को रेवेन्यू मॉडल की तरह देखते हैं फिर ये लॉजिकल हैं। अगर आप पत्रकारिता को एक सोसाईटल कन्वर्सेशन मानते हैं फिर दूसरी तरीका में आप करेंगे पत्रकारिता।

तीस्ता सेतलवाड : तो आज पत्रकारिता में कुछ रेजिस्टेंस पैदा करने के लिए, या कुछ अहमियत लाने के लिए आप कह रहे हैं की कुछ रेग्युलेशन्स की जरुरत हैं।

पी. साईनाथ : बहोत।

तीस्ता सेतलवाड : वो क्या जरुरत हैं ?

पी. साईनाथ : देखिये सबसे पहले मोनोपोली के खिलाफ, ऐसा नहीं होना चाहिए के एक रिलायंस कंपनी, या एक मर्दोच, या एक टाइम्स ऑफ़ इंडिया। ९० परसेंट ऑफ़ मीडिया को वो ओन कर सकते हैं, वो बहोत डेंजरस हैं, अंडेमोक्रॅटिकली।

तीस्ता सेतलवाड : बाकि प्रोडक्ट्स में भी ये अलाऊड नहीं हैं मतलब क़ानूनी हिसाब से।

पी. साईनाथ : नहीं, सही बात हैं।

तीस्ता सेतलवाड : सिर्फ मीडिया में हैं।

पी. साईनाथ : सिर्फ मीडिया में हो रहा हैं ये, और बहोत तेज से हो रहा हैं, बहोत तेज से हो रहा हैं। ये एक बात हैं। तो एक तो एंटी मोनोपोली लेजिस्लेशन होना चाहिए, दूसरा ऐसा लेजिस्लेशन सिर्फ नेगेटिव नहीं होना चाहिए। पॉजिटिव लेजिस्लेशन होना चाहिए की कैसा हमारा भारत का मीडिया में डाइवर्सिटी बढ़ा सकते हैं। पॉजिटिव अप्रोच टू लेजिस्लेशन होना चाहिए उसमे।

तीस्ता सेतलवाड : मतलब भाषा के लेवल पर डाइवर्सिटी संस्कृत, हर तरह की डाइवर्सिटी

पी. साईनाथ : देखिये अभी भारत में ७८० भाषा हैं, अगर पीपल्स लिंगविस्टिक सर्वे के प्रकार पे जायेंगे, उसमे ७ परसेंट भाषा, सिर्फ ४ परसेंट का स्कूलिंग फैसिलिटीज हैं सातवा क्लास तक बस। सातवा क्लास तक फोर परसेंट, ४ परसेंट भाषा का स्कूलिंग फैसिलिटीज हैं। तो आप ऐज शेडूल ऑफ़ कॉन्स्टिट्यूशन को हम जानबूझ के वायोलेट कर रहे हैं। जिस देश २२ भाषा को कमिट किया की हम प्रमोट करेंगे इस भाषा को वो हम हर दिन वायोलेट कर रहे हैं। इंडियन लैंग्वेज का वो जो डाइवर्सिटी हैं वो डेमोक्रेटाइजेशन में हमारा अलाइड हैं। वो हम यूज़ कर सकते हैं डेमोक्रेटाइजेशन के लिए इतना डाइवर्सिटी हैं।

तीस्ता सेतलवाड : ग्रामीण भारत में…………….

पी. साईनाथ : और अभी हिंदी इंपोजिशन में करके वो, वो तो बिलकुल अपोज़ करना चाहिए।

तीस्ता सेतलवाड : आपने जैसी ७८० भाषाओ की प्रकार का रेफेरेंस दिया उसमे तुग्रामीन भारत का मसला आता हैं की भारत और ग्रामीण भारत और पत्रकारिता। इसमें जो एक मतलब १९८०-८५ तक कुछ रिश्ता था। हालाँकि तब भी हलका सा था, लेकिन जितना होना चाहिए था, जितना गहरा होना चाहिए था उतना नहीं था। मगर फिर भी ग्रामीण मुद्दों को कही न कही अखबारों में वगैरा रिपोर्ट टास्क होता था, आज इतनी दुरी क्यू?

पी. साईनाथ : रेवेन्यू नहीं हैं उसमे, बहोत सारा चैनल और न्यूजपेपर उनका डिस्ट्रिक्ट ब्यूरो सब बंद कर दिया। जहाँ कुछ चैनल्स था, जैसा एन.डी.टी.व्ही. था कुछ साल पहले। उड़ीसा में हिंदी और इंल्गिश ब्यूरो था। मल्टी लिंग्वल ब्यूरो था। जब उसका कुछ प्रॉब्लम हुआ तब जो हिंदी में था उन सबको हटाया वहा से। तो ये रॅशनॅलिजेशन, कॉस्ट रॅशनॅलिजेशन इस सब में डाइवर्सिटी बिगड़ जाती हैं पूरा। ग्रामीण भारत में इतना हिस्टोरिक प्रोसेसेस चल रहा हैं अभी और मीडिया उसको मिस कर रहा हैं इसलिए की कोई इंटरेस्ट नहीं हैं उसको कवर करने पे।

तीस्ता सेतलवाड : किस तरह के प्रोसेसेस?

पी. साईनाथ : देखिये सबसे बड़ा माइग्रेशन हो रहा हैं हमारा इतिहास में। अगर आप २०११ का सेंसेक्स देखेंगे पहली बार, पहली बार नगरी भारत का एडिशनल पापुलेशन, ग्रामीण भारत का एडिशनल पापुलेशन से ज्यादा हैं दस लाख से।

तीस्ता सेतलवाड : अच्छा सौ साल में पहली बार?

पी. साईनाथ : यह १९२१ से, १९२१ से पहली बार, हाँ,

तीस्ता सेतलवाड : ९० साल

पी. साईनाथ : आज़ादी के बाद ये पहली बार। पार्टीशन से ज्यादा मैग्रेशन्स हो चूका हैं इन दस सालों में। २००१ से २०११ तक। इतना बढ़ गयी, आप, आप देखिये ये किसानियत और ये कृषि में इतना इतना बिगड़ गयी एम्प्लॉयमेंट पूरा कोलॅप्स हो गया वहा।

तीस्ता सेतलवाड : आप कह रहे थे की हर दिन हम २००० किसानो को खो रहे हैं।

पी. साईनाथ : हाँ,

तीस्ता सेतलवाड : इसका मतलब….

पी. साईनाथ : इसलिए की देखिये २००१ से २०११ तक आप देखिये नंबर ऑफ़ मैन वर्कर कल्टीवेटर कहते हैं, जो किसानी करते हैं १८० दिन से ज्यादा। मतलब ६ मंथ्स ऑफ़ मोर, ६ महीने से ज्यादा। उसको मानते हैं हम किसान हैं, पक्का किसान हैं। जो दस दिन का काम करते हैं उसको हम नहीं मानते हैं। सेंसेक्स का डेफिनिशन वही हैं। तो उसका, उनकी संख्या ७६ या ७७ लाख कम हो गया दस साल में।

तीस्ता सेतलवाड : बापरे, तो ये जो कम होने का जो आपने आकड़ा बताया इसका मतलब आप क्या निकालेंगे?

पी. साईनाथ : इसका मतलब हैं की बहोत सारा किसान, जो किसान था वो अभी खेत मजदूर बन गया, उनका नंबर बढ़ रहा हैं। मेरा होम स्टेट हैं जो आंध्रा प्रदेश उसमे किसान कम हो गया दस साल में १३ लाख। १३ लाख का नंबर कम हो गया उनका। लेकिन खेत मजदूर का संख्या बढ़ गया ३४ लाख। उसके ऊपर कोई लिख रहा नहीं हैं, देख रहा नहीं हैं उसको क्या हो रहा है, उसका मिजेरियन……

तीस्ता सेतलवाड : आपका जो नया प्रोजेक्ट हैं वो सब ये कहानी दिखाता हैं।

पी. साईनाथ : ये सब कहानी उसको देखते हैं, डेफिनेटली।

तीस्ता सेतलवाड : थोडासा वो प्रोजेक्ट के बारे में बताये।

पी. साईनाथ : इसको हम कहते हैं पीपल्स आर्काइव ऑफ़ रूरल इंडिया। मतलब आम लोग का हर दिन, उसका जीवन कैसा चलाते हैं उसके ऊपर हम कर रहे हैं की किसको ऑडियो हैं, वीडियो हैं, ये आर्टिकल हैं, टेक्स्ट आर्टिकल हैं, और ये स्टिल फोटो भी हैं। स्टिल फोटो और वीडियो दोनों हैं। ये स्कूल चिल्ड्रन, बच्चे पार्टिसिपेट कर सकते हैं। और इस आर्काइव में भारत का हर सिटीजन, नॉन-सिटीजन भी पार्टिसिपेट कर सकते हैं अगर आम लोग के बारे में आप लिख रहे हैं, और फोटो उनका कहानी हैं हम कॅरी करते हैं।

तीस्ता सेतलवाड : ये कबसे आएगी, कबसे?

पी. साईनाथ : मेरे ख़याल में अक्टूबर नवंबर तक लाइव हो जायेगा————-

PART – 2

तीस्ता सेतलवाड : पत्रकारिता का जो हाल आपने पेश किया काफी मतलब निराश हुआ क्या? तो फिर आप जो युवक पत्रकार हैं, जो काफी आपके ऊपर फ़िदा हैं उनके ऊपर आप उत्साह कैसा पैदा करते हैं, आप उनको क्या संदेशा देते हैं।

पी. साईनाथ : देखिये मेरा, मैंने ये क्रेडिट नहीं लेता हु इसलिए की हिस्टोरिकली हमारा इतिहास में जर्नलिजम ऐसा हैं की सब आइडलिस्ट इस प्रोफेशन में गया। या आंबेडकर हो या मौलाना आज़ाद हो, या महात्मा गांधी हो, जो भी हो, ये सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पंडित सब जर्नलिजम में गया। जो हमारा आज़ादी का जो हम कह सकते हैं स्वतंत्र सैनिक वो सब जर्नलिस्ट का दो एक्सिस्टेंस था। एक तो पोलिटिकल दूसरा जर्नलिस्ट और वो उसको कंबाइन किया। ये हमारा इतिहास हैं। ये प्रोफेशन आइडॉलिजम को अट्रॅक्ट करती हैं। क्यू? हम सोचते हैं की देखो आज़ादी में कैसा हुआ। तो एक रिस्पेक्ट हैं।

तीस्ता सेतलवाड : तो आज भी ये प्रोफेशन में आइडलिस्टिक लोग आते हैं और आते रहेंगे।

पी. साईनाथ : आते हैं और पांच साल दस साल के अंदर उसका आइडॉलिजम को ख़तम करके, हर एक दफ्तर में उसका आइडॉलिजम ख़तम करके उसको सैनिक बना के, लेकिन उसमे भी एक सर्वाइवल रेट हैं। एक बहोत इम्प्रेससिव सर्वाइवल रेट हैं। हमारा पीपल्स आर्काइव ऑफ़ रूरल इंडिया में सीनियर टेलीविज़न जर्नलिस्ट हमको मीटि —– दे रहा हैं साइड पे जो उनका चैनल पे कभी जायेगा नही उनका स्टोरी, वो हमको दे रहा हैं इसलिए की वो क्यू इस प्रोफेशन में क्यू आया, ऐसा स्टोरी रिपोर्ट करने के लिए आया।

तीस्ता सेतलवाड : और उनको जगह नहीं मिल रही वो जो आप उनको दे रहे। कॉर्पोटाईजेशन ऑफ़ मीडिया का मतलब क्या है?

पी. साईनाथ : इसका मतलब हैं की जहा इंडिविजुअल ओनर था एक न्यूजपेपर का, एक इंडिविजुअल, या एक मालिक इंडिविजुअल, या एक फैमिली का ओनरशिप था। वो पूरा उसका स्ट्रक्चर, कंटेंट और फॉर्म भी बदल रहा हैं। अभी बड़े बड़े कंपनी लोग कॉर्पोरेट जगह मीडिया को ओन कर रहे हैं, खरीद रहा हैं. कौन, कितने लोग को मालूम हैं की जो हम इनाडु टीव्ही देखते हैं उसका २४ चैनल हैं। इनाडु टीव्ही, सबसे ज्यादा रीजनल प्रेजेंट्स इ टीव्ही का हैं. चाहे महाराष्ट्र में हो, रीजनल टीव्ही में वो नंबर वन हैं. वो २४ चैनल में १८ या १६, १६ या १८ चैनल प्रॉपर्टी ऑफ़ रिलायंस लिमिटेड या मुकेश अम्बानी का प्रस्तुत प्रॉपर्टी, में नहीं कह सकता हु। पता नहीं किसका हैं। तो ऐसा ट्रेंड हो रहा हैं की इंडिविजुअल ओनरशिप, ट्रस्ट ओनरशिप और फैमिली ओनरशिप वो सब पीछे हट रहा हैं और मालिक हैं कॉर्पोरेशन्स। बड़े बड़े कम्पनी कॉर्पोरेट जगह मीडिया को खरीद रहा हैं, और ओन कर रहा हैं। जब ऐसा एक ओनरशिप आएगा मीडिया का पूरा पूरा कल्चर बदल जाती हैं,

तीस्ता सेतलवाड : कंटेंट भी।

पी. साईनाथ : कंटेंट भी बदल जाती हैं। अभी ये नहीं देखते हैं की ये जर्नलिज़म क्या चीज़ हैं, राइटिंग क्या चीज़ हैं, इश्यूज का प्रायोरिटी क्या हैं। प्रायोरिटी बन जाता हैं रेवेन्यू, और एडवरटाइजर प्रायोरिटी बन जाती हैं, एडवरटाइजिंग प्रायोरिटी बन जाती हैं। और कॉर्पोरेट ओनर्स का पोलिटिकल नीड्स वो प्रायोरिटी बन जाती हैं। देखो आप कोलगेट स्कैन में जितना मीडिया हाउसेस भी इन्वोल्ड हैं उसमे, ओनर्स जो ओनर्स थे उसमे कोल्ड ब्लास्ट में मिस्टर राकेश सिंगला, बड़ा बड़ा मीडिया ओनर भी हैं। पूरा वर्टीकल और हॉरिजेंटल इंटीग्रेशन हो रहा हैं इसमें।

तीस्ता सेतलवाड : इसको रेग्युलेट करने के लिए तीन चार कौनसे कानून बनने चाहिए?

पी. साईनाथ : नंबर वन एंटी मोनोपोली, आप एक शहर में पूरा मीडिया को आप कंट्रोल नहीं कर सकते। एक शहर में या एक रीजनल मार्केट में रेस्ट्रिक्शन्स होना चाहिए के आप कितने तक ओन कर सकते हैं, कितने तक कंट्रोल कर सकते हैं। दूसरा ये होना चाहिए की पोजिटिवली प्रोएक्टिवली देश और सरकार ने कैसा डाइवर्सिटी को एक्सपांड कर सकते हैं उसके लिए भी कानून होना चाहिए की इतना वॉइसेस से कम नहीं होना चाहिए एक शहर में, एक नगर में, कही भी। तो दैट प्रमोशन ऑफ़ डाइवर्सिटी एक ड्यूटी बनना चाहिए लीगली लॉ में। और तीसरा देखिये डिरेक्टीव प्रिंसिपल्स में भी ऑफ़ कॉन्स्टिट्यूशन में, वो क्या सबसे पहले पैराग्राफ में कहता हैं की वर्किंग ऑन अगेंस्ट टू मीटिगेट इनक्वॉलिटी, सोशिओ इकोनोमिक कल्चरल एवरीथिंग इज़ इन्क्लूडेड। तो उसमे मीडिया आती है मेरे ख़याल में। मेरे अंडरस्टैंडिंग में, मेरी समझ में वो मीडिया भी आती उसमे हैं। तो ये इनक्वॉलिटी बढ़ रहा हैं और मीडिया का मैन फीचर हैं हमारा २०१४ में एक फीचर पे डिस्क्राइब कर सकते हैं। ग्रोइंग डिसकनेक्शन बिटवीन मास मीडिया एंड मास रिएलिटी। अभी मास मीडिया हैं मासेस नहीं हैं। ये कॉर्पोटाईजेशन का मतलब ये ट्रेंड बढ़ जाती है। कम्प्लीट एक्सक्लूशन ऑफ़ मासेस, वो मासेस सिर्फ डम्ब पार्टिसिपेशन करता हैं. पेसिव——–

तीस्ता सेतलवाड : तो २०१४ के इलेक्शन में भी हमने ये पाया?

पी. साईनाथ : ओह बा! बहोत, अगर आप जो भी चैनल लगाओ कही भी मध्यप्रदेश में, गाव में मोदी स्पीच दे रहा हो तो, भाषन दे रहा हो तो, नौ चैनल में लाइव चल रहा हैं। तो आप जो भी चैनल में स्विच करो उस समय वही दिख रहा है, वही दीखता हैं. तो ये पुशिंग ऑफ़ अ पोलिटिकल फ़ोर्स कोएलिस्टिक अराउंड अ पोलिटिकल फ़ोर्स वो कॉर्पोटाईजेशन में बहोत जल्दी हो जाता हैं। और मोनोपोली पॉवर मीडिया में जो आती हैं वो इंडस्ट्री में बहोत लागु पड़ती हैं, बहोत फर्क, और ताक़त बढ़ जाएगी, जिस इंडस्ट्रियलिस्ट के पास न्यूजपेपर हैं वो बहोत वो राजा हैं. अम्बानी साहब ने ये सबक सीखा गोएनका साहब से।

तीस्ता सेतलवाड : लास्ट ईयर, ये साल के मुंबई प्रेस क्लब्स के अवार्ड में अदानी का स्पॉन्सरशिप था. शुक्रिया बहोत बहोत साईनाथ जी

पी. साईनाथ : थॅंक यु

तीस्ता सेतलवाड : देश और समाज के और कयी मुद्दो को समझेंगे एक नये मेहमान के साथ, अगली बार कम्युनलिज़म कॉम्बैट में।

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