‘यार, वापस बुला ले, दिल्ली में जी नहीं लगता’- वुसतुल्लाह ख़ान

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साल 1987 में मेरठ और आसपास के इलाक़ों में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों के बाद मोहम्मद शफ़ीक़ का परिवार किसी न किसी तरह घूमफिर कर पाकिस्तान के कराची पहुँच गया.
इन्हीं दंगो में उत्तर प्रदेश की पुलिस पीएसी के हाथों मेरठ के मोहल्ला हाशिमपुरा के 40 से अधिक मुसलमान युवाओं की हत्या कर दी गई थी.
कई वर्ष जूतियाँ चटकाने और बहुत सी सिफ़ारिशों के बाद मोहम्मद शफ़ीक़ के परिवार को पाकिस्तान की नागरिकता मिल गई.

बेटे और पोते का ग़म
1995 में पुलिसकर्मियों ने कराची में एमक्यूएम के ख़िलाफ़ ऑपरेशन के दौरान उस मोहल्ले को घेर लिया जहाँ मोहम्मद शफ़ीक़ का परिवार भी चैन से रह रहा था.
पुलिस शफ़ीक़ के बेटे और पोते समेत मोहल्ले के कई लड़कों को उठाकर ले गई.
हफ़्ते भर बाद ये ख़बर छपी की पाँच लोग पुलिस मुठभेड़ में मारे गए जिनमें मोहम्मद शफ़ीक़ के बेटा और पोता भी थे.
मोहम्मद शफ़ीक़ गुमसुम रहने लगे और एक दिन बड़े मियाँ ने चूहे मारने की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर ली.
बहू अपने घर लौट गई और पीछे बस शफ़ीक़ की पत्नी रह गईं. वो मरने से पहले एक बार मेरठ देखना चाहती हैं लेकिन कैसे जाएं और किसके साथ?

भारत की यात्रा
रमेशलाल राजकुमार, सेठ कमल राम का बेटा, मेरे बचपन का दोस्त और स्कूलफेलो. रहीमयारख़ान में कपड़े का अच्छा काम था. हर वक़्त अपने हाल में मस्त रहता था.
एक दिन उसकी बेटी सुंदरी कॉलेज गई और फिर वापस न आई. पता चला मुसलमान हो गई, फिर पता चला जिसने अपहरण किया था उसी ने शादी कर ली.
रमेशलाल ने कारोबार भाइयों को सौंपा और अपनी पत्नी, एक बेटे और बेटी के साथ यात्रा के लिए भारत चला गया.
पिछले महीने रमेशलाल और उसकी पत्नी लगभग दस वर्ष बाद पहली दफ़ा भारतीय पासपोर्ट पर अपनी माता, बहन-भाइयों, भांजों-भतीजों से मिलने 15 दिन के वीज़ा पर यहाँ आए.
मैं उनसे मिलने ख़ासतौर से कराची से रहीमयारख़ान गया.

जी नहीं लगता
बहुत बातूनी हो गया है रमेशलाल. बताने लगा, “शुरू-शुरू में सब कहते थे कि ओय पाकिस्तानी कब वापस जा रहे हो, क्या धरती याद नहीं आती. अब अल्ला का शुक्र है, बहुत पापड़ बेलने के बाद पिछले वर्ष नागरिकता मिल गई. पुरानी दिल्ली में कपड़ों की रंगाई का काम करता हूँ. बेटा भी साथ ही रहता है. उर्मिला की शादी कर दी है और बेटे की भी एक जगह बात पक्की हो गई है.”
तीन दिन बाद रमेशलाल को वीज़ा ख़त्म होने से पहले-पहले वाघा बॉर्डर क्रास करना था. मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि चलो मेरा यार यहाँ न सही दिल्ली में तो सेट हो गया.

जब मैंने कराची जाने के लिए रमेशलाल से आज्ञा मांगी तो ट्रेन देखते ही वो मुझसे लिपट गया और रोना शुरू कर दिया. मैंने उसे और भींच लिया.
ज़रा सा नार्मल होने के बाद कहने लगा, “यार तू तो बड़ा महान पत्रकार बन गया है, कोई ऐसा जुगाड़ लगा कि मैं फिर से लौट आऊँ. वहाँ पता नहीं क्यों, जी नहीं लगता. यहाँ रहूँगा तो हो सकता है कभी न कभी सुंदरी बेटी भी कहीं दिख ही जाए…दूर से ही सही.”

पाकिस्तान के मशहूर कलमकार वुसतुल्लाह ख़ान का ब्लॉग। बीबीसी से साभार

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