किस भगवान ने गरीबों का भला किया है? – कॅंवल भारती

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चाटुकार लोग कितनी जल्दी अपनी निष्ठा बदलते हैं, इसका ताजा उदाहरण लोकेश चन्द्र हैं, जिन्हें मोदी सरकार ने आईसीसीआर का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है। जीवन भर कांग्रेस में रहकर खूब मलाई खाई और पद्मभूषण का तमगा हासिल किया। अब मोदी की चाटुकारिकारिता करके भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के उपाध्यक्ष से अध्यक्ष बन गए हैं। यानी उन्होंने अपने हिन्दुत्ववादी मिथकीय विचारों से कांग्रेस में रहकर भी प्रदूषण फैलाया और अब हिन्दूराष्ट्रवादियों की सरकार में और भी स्वतन्त्र होकर प्रदूषण फैलाएंगे। उनकी चाटुकारिता के नमूने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ (1नवम्बर 2014) में शुभाजित राय को दिए गए उनके साक्षाकार में देखे जा सकते हैं। आप भी दखिए, वह क्या कहते हैं।
लोकेश चन्द्र कहते हैं, ‘मोदी महात्मा गाँधी से भी आगे निकल गए हैं, क्योंकि मोदी विचारों के व्यक्ति हैं, विचारधारा के नहीं।’ चलिए, कोई तो हुआ, जिसने गाँधी को अप्रासंगिक कर दिया।
एक सवाल के जवाब में लोकेश चन्द्र कहते हैं, ‘कार्लमाक्र्स ने गरीबी पर अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। पर उनका अपना क्या योगदान था? जबकि मोदी गरीबों के जीवन पर सार्थक प्रभाव डालते हैं। जन धन योजना को देखिए। वे बहुत खुले एप्रोच वाले हैं। वे गरीबों के लिए भगवान जैसे हैं। वे भगवान के अवतार हैं।’ इन महाशय को यह भी नहीं मालूम कि हिन्दुओं के किसी भगवान ने गरीबों का भला नहीं किया। भगवान ने तो अवतार भी गाय और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए लिया है। गरीबों के उद्धार और कल्याण के लिए एक भी अवतार भारत की धरती पर नहीं उतरा। यदि मोदी भी, बकौल लोकेश चन्द्र, भगवान के अवतार हैं, तो अवतारों की परम्परा के विरुद्ध कैसे जा सकते हैं? वे भी कारपोरेट और ब्राह्मणों की सेवा के लिए ही अवतरित हुए हैं। जहाँ तक कार्लमाक्र्स के योगदान की बात है, तो कोई पल्ले दरजे का मूर्ख ही उनके योगदान पर सवाल उठा सकता है। मोदी और गाँधी के बीच वह चाहे जो तुलना करें, पर माक्र्स से मोदी का क्या मुकाबला? एक वैज्ञानिक भौतिकवादी समाजवादी से एक हिन्दूवादी-पूंजीवादी राजनेता की तुलना कैसे की जा सकती है? माक्र्स ने दुनिया के मजदूरों को एक होने का नारा दिया था। यह पूंजीवादी-सामन्तवादी व्यवस्था के विरुद्ध मजदूरों को संगठित करने का नारा था। मोदी ने गरीबों के लिए क्या नारा दिया है? क्या उन्होंने गरीबों को उनका खून चूसने वाली कारपोरेट व्यवस्था के खिलाफ एक जुट होने का नारा दिया है? फिर कैसे उन्हें गरीबों का भगवान कहा जा सकता है?
इसी साक्षात्कार में लोकेश चन्द्र हिन्दू मूल्यों में आस्था रखने के कारण भी मोदी को भगवान मानते हैं। वह कहते हैं, ‘उन्होंने (मोदी ने) नवरात्र में नौ दिनों तक उपवास रखा और उपवास में भी वे बराबर काम करते रहे। वे भगवान के अवतार हैं। इससे पता चलता है कि मूल्यों (आध्यात्मिक) से उनका कितना जुड़ाव है। ये मूल्य ही भारत के आधार हैं।’ कोई लोकेश जी से पूछे कि नवरात्र में उपवास रखने और काम करते रहने वाले मोदी अकेले हिन्दू प्राणी तो हैं नहीं, लाखों हिन्दुओं ने व्रत रखा होगा और वे सभी काम भी बराबर करते रहे होंगे, तब वे सब भी भगवान क्यों नहीं हैं? उपवास रखने और काम करते रहने के कारण अकेले मोदी ही भगवान कैसे हो सकते हैं? और नौ दिन होते ही कितने हैं? कभी उन्होंने मुसलमानों का खयाल किया है? वे रमजान में तीस दिन उपवास रखते हैं। मोदी तो फिर भी उपवास में पानी पीते रहे थे, जबकि मुसलमान तो उपवास में पानी भी नहीं पीते हैं। और इस दिनों में वे निष्क्रिय होकर घर में नहीं बैठते हैं, बल्कि अपने कार्यों में सक्रिय रहते हैं। मूल्यों से जुड़ने का मतलब यह नहीं है कि वे भगवान हो गए।
एक बेहद हास्यास्पद बात भी लोकेश चन्द्र अपने साक्षात्कार में कहते हैं, ‘मोदी का न कोई बेटा है और न कोई दामाद है। भारत को ऐसा ही प्रधानमन्त्री चाहिए।’ अब एक सीधी सी बात उनके दिमाग में नहीं आई कि जब उन्होंने अपनी पत्नी को अपने साथ रक्खा ही नहीं, तो कहाँ से उनका बेटा और दामाद होगा? और यह कहना तो चाटुकारिता की हद है कि भारत को मोदी जैसा ही प्रधानमन्त्री चाहिए, बिना बेटा और दामाद वाला यानी अविवाहित। यानी अब तक जितने भी विवाहित और बेटा-दामाद वाले प्रधानमन्त्री हुए हैं, वे सभी नाकारा थे, अटलबिहारी वाजपेयी भी?
अब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष के रूप में लोकेश चन्द्र क्या कार्य करेंगे, यह पूछने पर वह बताते हैं, ‘वह महाभारत तथा रामायण पर आधारित कार्यक्रमों के जरिए भारत से दक्षिण-पूर्व एसियन देशों को जोड़ना चाहते हैं। वह इंडोनेशिया, कंबोडिया और लाओस के साथ मिलकर रामायण-महाभारत आधारित कार्यक्रमों का आयोजन कर सकते हैं।’ यह है उनका भारतीय इतिहास अनुसंधान का कार्य, जो मिथकों पर आधारित है, जिसकी कोई ऐतिहासिकता नहीं है और जो ब्राह्मणवाद की विजय गाथाएं के सिवा कुछ नहीं हैं।
(1 नवम्बर 2014)

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