अधूरा कोई नहीं – आर. अनुराधा (An Anthology)

 

 

Anuradha

 

 

पहले उसे तूफान अंतरीप कहा जाता था। इस समुद्री चौराहे को पार करने में नाविक डरते थे, हिम्मत हार बैठते थे।फिर कुछ जांबाज़ नाविकों ने इसे अपनी हिम्मत का नाम दिया- केप ऑफ गुड होप, आशा अंतरीप। वहां से ग़ुज़रते नाविक अब भी उन्हीं तूफानी हवाओं, बेकाबू लहरों का सामना करते हैं, लेकिन अब उनके साथ होती है उम्मीद। इस संकलन की कविताएं जीवन के ऐसे ही तूफानों से उपजी हैं और आशाओं के अंतरीप बनाती हैं।

 

 

 

Adhura

 

 

 

अनुक्रम

 

 

  1. अधूरा कोई नहीं
  2. भर दो मुझे
  3. ब्रेस्ट कैंसर क्लीनिक
  4. देह की भाषा
  5. तुम न बदलना
  6. तेरी-मेरी चुप
  7. अपने-अपने हिस्से के जादू
  8. दर्द
  9. संगीत
  10. चांदों के चेहरे
  11. मेरे बालों में उलझी मां
  12. कहानियां यादें किस्से
  13. जानती हूं यह स्वप्न नहीं है
  14. कैंसर कोशिका
  15. लिंफएडिमा
  16. अपने-अपने हित
  17. दर्द का उत्तराधिकार
  18. कैसा है पैरहन
  19. वृहत्तर स्थान-समय में हम
  20. तदर्थ
  21. डरने लगी हूं
  22. आश्वस्ति
  23. स्पर्श
  24. रिश्ते
  25. चालें
  26. अवेदना सदन
  27. सपना
  28. पैदल यात्रा का सुख
  29. जीवन की हवाएं
  30. सत्तर फीसदी या सात फीसदी
  31. चल
  32. कैंसर को संबोधन
  33. मुट्ठी में रेत
  34. सपनों की ज़मीन
  35. अंधेरे पुल पर
  36. छोटी सी लंबी कहानी
  37. आज
  38. पहचान
  39. इस इमारत की खिड़कियां
  40. संधान के पक्ष में हस्ताक्षर
  41. तुम्हें दे सकती हूं
  42. चाहती हूं जीना
  43. क्या चाहती हूं मैं अब
  44. आधारशिला
  45. गणित
  46. यात्रा

 

 

Red colour

 

अधूरा कोई नहीं

 

सुनती हूं बहुत कुछ

जो लोग कहते हैं

असंबोधित

कि

अधूरी हूं मैं- एक बार

अधूरी हूं मैं- दूसरी बार

क्या दो अधूरे मिलकर

एक पूरा नहीं होते?

होते ही हैं

चाहे रोटी हो या

मेरा समतल सीना

और अधूरा आखिर

होता क्या है!

जैसे अधूरा चांद? आसमान? पेड़? धरती?

कैसे हो सकता है

कोई इंसान अधूरा!

 

जैसे कि

केकड़ों की थैलियों से भरा

मेरा बायां स्तन

और कोई सात बरस बाद

दाहिना भी

अगर हट जाए,

कट जाए

मेरे शरीर का कोई हिस्सा

किसी दुर्घटना में

व्याधि में/ उससे निजात पाने में

एक हिस्सा गया तो जाए

बाकी तो बचा रहा!

बाकी शरीर/मन चलता तो है

अपनी पुरानी रफ्तार!

अधूरी हैं वो कोठरियां

शरीर/स्तन के भीतर

जहां पल रहे हों वो केकड़े

अपनी ही थाली में छेद करते हुए

 

कोई इंसान हो सकता है भला अधूरा?

जब तक कोई जिंदा है, पूरा है

जान कभी आधी हो सकती है भला!

अधूरा कौन है-

वह, जिसके कंधे ऊंचे हैं

या जिसकी लंबाई नीची

जिसे भरी दोपहरी में अपना ऊनी टोप चाहिए

या जिसे सोने के लिए अपना तकिया

वह, जिसका पेट आगे

या वह,जिसकी पीठ

जो सूरज को बर्दाश्त नहीं कर सकता

या जिसे अंधेरे में परेशानी है

जिसे सुनने की परेशानी है

या जिसे देखने-बोलने की

जो हाजमे से परेशान है या जो भूख से?

आखिर कौन?

मेरी परिभाषा में-

जो टूटने-कटने पर बनाया नहीं जा सकता

जिसे जिलाया नहीं जा सकता

वह अधूरा नहीं हो सकता

अधूरा वह

जो बन रहा है

बन कर पूरा नहीं हुआ जो

जिसे पूरा होना है

देर-सबेर

कुछ और नहीं

न इंसान

न कुत्ता

न गाय-बैल

न चींटी

न अमलतास

न धरती

न आसमान

न चांद

न विचार

न कल्पना

न सपने

न कोशिश

न जिजीविषा

कुछ भी नहीं

 

पूंछ कटा कुत्ता

बिना सींग के गाय-बैल

पांच टांगों वाली चींटी

छंटा हुआ अमलतास

बंजर धरती

क्षितिज पर रुका आसमान

ग्रहण में ढंका चांद

कोई अधूरा नहीं अगर

तो फिर कैसे

किसी स्त्री के स्तन का न होना

अधूरापन है

सूनापन है?

 

अधूरी है उसकी सोच

जिसके लिए हाथों का खिलौना टूट गया

खेलते-खेलते

या उसका आइना

जो नहीं जानती

36-28-34 के परे एक संसार है

ज्यादा सुंदर

स्तन का न होना सिर्फ और सिर्फ

उन सपनों-इच्छाओं का अधूरापन है

जो भावनाओं बराबरी के रिश्तों से परे

उगते-पलते हैं किसी असमतल बीहड़ में

जहां जीवन मूल्यहीन है, विद्रूप है, शर्मनाक है, अन्याय है

 

भर दो मुझे

 

मेरे सीने में

बहुत गहराई है

और बहुत खालीपन है

भुरभुरी

बालू की तरह

भंगुर है मेरी पसलियां

इन्हें भर दो

अपनी नजरों की छुअन से

गर्म सलाखों सी तपती,

हर समय दर्द की बर्फीली आंधियों में

नर्म हथेलियों की हरारत से

इन्हें ठंडा कर दो

जैसे मूसलाधार बरसात के बाद

भर जाते हैं ताल-पोखरे

ओने-कोने से, लबालब

शांत नीला समंदर

भरता है हर लहर को

भीतर-बाहर से

या पतझड़ भर देता है

सूखे पत्तों से

किसी वीरान जंगल की

मटियाली सतह को

कई परतों में

इतने हल्के से कि

एक पतली चादर सरसराती हवा की

सजा दे और ज्यादा उन पतियाली परतों को

उनके बीच की जगहों को भरते हुए

अगर तुमने देखा हो रेतीला बवंडर

जो भर देता है

पाट देता है पूरी तरह

आकाश-क्षितिज को

बालू के कणों से

जैसे भर जाती है

हमारे बीच की हर परत, हर सतह

प्रशांत सागर-से उद्दाम प्रेम से

वैसे ही भर दो मुझे गहरे तक

कि परतों के बीच

कोई खालीपन भुरभुरापन वो दर्द

न रहे बाकी

रहे तो सिर्फ

बादल के फाहों की तरह

हल्की मुलायम सतह सीने की

और उसमें सुरक्षित

भीतरी अवयव

 

ब्रेस्ट कैंसर क्लीनिक

Anuradha on cycle

 

(1)

वे औरतें

चुप हैं

कि डाक’ साब

डिस्टर्ब न हो जाएं,

नाराज न हो जाएं

 

(2)

एक मासूम सा सवाल

“कहां से आती हैं आप”?

और फिर जुड़ते जाते हैं

तार से तार

जैसे जुड़ते हैं

ताश के पत्ते

एक से एक

पर गिरतीं नहीं उनकी तरह

एक पर एक

कोई गिरने को हो तो

दूसरी संभालती है

तीसरी संभालती है

कोई अपना दर्द बताती है

तो कोई उसे सहने-झंवाने का टोटका

किसी पर घर का बोझ है

तो कोई खुद घर पर

वे सब बनाती हैं मिलकर

एक दीवार

कीमोथेरेपी के अत्याचार के खिलाफ

होती हैं मजबूत

पाती हैं थोड़ी छांव, थोड़ी राहत

उस दीवार की आड़ में

आखिर तो चलना उन्हें खुद ही है

उस दोपहरी में धूप-आंधी-बारिश में

उनके आंचल को

टोहने-टटोलने की

कोई जरूरत नहीं

क्योंकि आंचल अब भी

उतना ही बड़ा है

समेटता है संसार भर की

स्मृतियां, आंसू, कमियां और अधूरापन

करता है सबको पूरा

एक से एक जोड़कर

 

(3)

बाहर

और लोग बैठे हैं

वे बातें नहीं करते

कि उनके तार

जुड़ते नहीं आसानी से

उनके अपने झमेले हैं

चिंताएं हैं

दुनिया है, तकलीफें हैं

इन सबसे बड़ी है

उनकी चुप

 

(4)

फिर वे सब

चले जाते हैं

ओ पी डी खत्म होने तक

दोपहर से शाम होने तक

बारी-बारी से

फिर मिलने के वादे के बिना

कौन जाने कब-कहां-

शायद अगले हफ्ते

तीन हफ्ते में

तीन महीने या

साल में

यहां या जाने कहां!

 

(5)

बेटी आई है दूर से

मां का साथ देने

बेटा-पति काम पर हैं

थक गए हैं

या देख नहीं पाते इनके कष्ट

 

बेटी सब देखती-करती है

संभाल कर क्लीनिक तक लाना

हड़बड़ी में, धक्का-मुक्की में

डिस्काउंट में दवाएं खरीदना

सावधानी से दवाएं और पैसे माप-जोख कर

फिर लाइन में लगना

इंतजार करना बारी का

दूसरी के बैठने के लिए

सीट छोड़ना

 

वह सब सुनती-समझती है

डॉक्टर से पत्रिकाओं से इंटरनेट से

सर्जरी, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी

है क्या बला भला

जो उसे ही मारने पर उतारू हैं

जिसे बचाने का उनका मकसद ठहरा

पार करती है वह भी मां के साथ

वह रासायनिक बाढ़

वो हथियार-औजार

वह मशीनी आग

 

घर आकर फिर

बिस्तर ठीक कर देना चादर बदल देना

ताकि रहे मां तरोताजा

अगली बार उठकर

अस्पताल जाने तक

खास बेस्वाद खाना बनाना

जबर्दस्ती खिलाना

और न खाते हुए देख पाना

मां को

जिसने उसे बनाया

अपना खून देकर, दूध देकर

अपनी थाली का खाना

अपनी रजाई की गर्माहट

अपने हिस्से की नींद

अपने हिस्से के सपने देकर

 

वह देखती-करती है

मां का लड़ना

उसे लड़ने के काबिल बनाए रखना

पूस की धूप का वो जो टुकड़ा

बस कुछ कदम आगे पड़ा है

उस तक पहुंचाती है

अपने हाथों की गुनगुनाहट से

मां को नरमाते-गर्माते हुए

 

देह की भाषा

 

देह के मुहावरे अजीब होते हैं

भाषा अजीब होती है

तकलीफ दूर करने के लिए

तकलीफ मांगती है

आराम पाने के लिए

बेआराम होना मांगती है

बोलती है गर्मियों की उमस भरी बेचैनी

ठीक बीच रात में

दिसंबर की बर्फीली ठंड में भी

जब वह घिरी होती है

हार्मोंन की ऊंची-नीची लहरों से

भरी गर्मी में

बतियाती है ढेर सा पसीना

और हो जाती है ठंडी, निश्चल, चुप

चुप रहती है

जब कहने की जरूरत सबसे ज्यादा हो

चुप हो जाती है

जब बातें करने को लोग सबसे ज्यादा हों

आस-पास जमा हुए, आपस में बतियाते

उस बीच में रखी देह के बारे में

जो चुप हो गई

इस वाचाल को चाहिए एकांत, सन्नाटा

जब पास कोई न हो

तो बोलती है

बेबाक, बिंदास

अपने मन की,

देह की

फिर समेटती है अपने शब्द

चुन-चुन कर एक-एक

दिखाती है कविराज को

और पूछती है नुस्खे

उन्हें शांत करने के,

बुझाने के

क्योंकि देह का बोलने

यानी शब्दों का खो जाना

 

तुम न बदलना

 

लोग मिलते हैं

बिछुड़ जाते हैं

दिन दोपहर शाम रात

आते हैं चले जाते हैं

मौसम भी कहां

गांठ में बंधते हैं

रिश्ते बातों-बातों में टूटा करते हैं

रास्ते हम ही

बदलते चलते हैं

अखबार की रोशनाई हर दिन

सुर्खियां बदल देती है

जिंदगी की प्याली

छूटती है हाथ से

टूट जाती है

फैलती हैं किरचें

बनते है घाव

फिर भर जाते हैं

अस्पताल में डॉक्टर बदलते हैं

डॉक्टर पर्चियां बदलते हैं

पर्चियों में दवाएं

खुराक बदलते हैं

कभी हम

डॉक्टर ही बदल लेते हैं

पर तुम न बदलना

दर्द,

साथ देना मेरा

 

तेरी-मेरी चुप

finger on your lips 2finger on your lips

 

चुप रहना गलत है

चुप बैठ जाना और भी गलत

चुप बैठना नहीं

चुप रहना नहीं

कहना है

कि हम सिर्फ वह नहीं

जिसे सर्जरी ने काटा

सिकाई ने जलाया

दवाओं ने मारा

चंद उत्पाती

अपनी आवारगी में, अपने अधूरेपन से

भले ही रुला लें दर्द के आंसू

करना है इस गुम-चुप अक्खड़-जिद्दी

कैंसर को हिलाने-मिटाने की कोशिश

बहुत रोशनी इकट्ठी करनी होगी

पर मीनारों में नहीं,

बनाने होंगे उस रोशनी के पुल

जो जोड़ते हों हर किरण को, हर तार को

उगानी हो भले ही हथेली पर दूब

या पूछना पड़े रात से

सुबह का पता

सूरज को जगाना होगा

लोगों को जिलाना होगा

ताकि जीता रहे सब कुछ

मरे वह जो आतंक है, स्याह है

बे-ओर-छोर है, बेलगाम है अब तक

 

अपने-अपने हिस्से के जादू

 

मेरे हिस्से बहुत से जादू आए हैं

साइकिल सीखने के दौरान न गिरने से लेकर

कार से कभी टक्कर न करने तक

खिड़कियों-रोशनदानों-ऊंची चारदीवारियों से होकर

खपरैल की काई-फिसलन भरी छतों पर कूद-फांद से लेकर

पकी उम्र में हर छोटे पत्थर और असमतल रास्तों से ठोकरें खाकर लड़खड़ाने तक

कभी चोट न लगना जादू था

 

ऑस्टियोपोरोसिस से लेकर इस अनंत संक्रमण और रेडिएशन

से भंगुर हड्डियों के चूर होने की हर आशंका तक

इस ढांचे का संभले रहना जादू था

लगभग शून्य प्रतिरोधक क्षमता के साथ

शरीर में अगणित कीटाणुओं को पलते देखना

फिर भी संगीन सुनना और इत्मीनान से सो पाना

जादू ही तो था

 

भीतर की दुर्घटनाओं से लगातार निबटते संभलते आशंकित होते

बाहरी देह से परे हो जाना

लंबे अवकाशों बाद भी

उसके आवेगों को अपनी जगह सुरक्षित पड़ा पाना

देह की सुघटनाओं की कमी के बावजूद

प्रेम का लगातार गहराना फैलते जाना

जादू नहीं तो और क्या है

 

अतल दर्द में ऊब-डूब

और उबरने की अनवरत प्रयास-यात्राओं के बीच

हंसी के अमलिन प्रवाह का सतत बने रहना

यह भी जादू है जो मेरे हिस्से आया है

 

कई बार गुज़रना समय की अंधेरी सुरंगों से

सिर्फ एक स्पर्श के भरोसे

और हर बार रोशनी पा जाना

गाढ़े दलदल में तैर कर

मीथेन की जहरीली हवा में सांस लेकर भी

टिके रहना

रोशनी देख पाना

क्या कहेंगे आप इसे

जादू के सिवा!

 

किस्म-किस्म की जांच रपटों के बीच से

ठोस सपाट तथ्य उभर कर बाहर आता है आखिर

कि चमत्कार नहीं हुआ करते

अक्सर ऐसे हालात में

मैं समझती हूं कि

चमत्कार नहीं हुआ करते

 

पर अपनी-अपनी जादुओं की दुनिया से गुज़रते हुए

समझते हैं हम कि

जो कुछ नहीं समझ पाते

घटनीय की संभावना जो हम नहीं देख पाते

वह सब वक्त की मुट्ठी में बंद

पड़ा होता है अपनी बारी के इंतज़ार में

 

धीरे-धीरे खुल रहा है

यह जादू भी मेरे आगे

 

दर्द

Anuradha walking

दर्द का कोई

वर्ग नहीं होता

प्रजाति नहीं होती

जाति नहीं होती

दर्द, बस दर्द होता है

एक-सा स्वाद सबको देता है

सब पर एक-सा असर करता है

चाहे नज़ाकत से करे

या पूरी शिद्दत से

कोई फर्क नहीं करता

हाथ या गहरे कहीं पीठ में

कसमसाते दांत मरोड़ खाते पेट या धकधकाते दिल में

आंख ही रोती है हर दर्द के लिए

सीना ही हिलकता है हर दर्द के लिए

दर्द उठता हो कहीं भी

साझा होता है पूरे आकार में

चाहना एक ही जगाता है सब में

कि बस ढीले हो जाएं बेतरह खिंचे तंतु

बंधनहीन हों मज्जा के गुच्छे

ढूंढता है शरीर

आराम की कोई मुद्रा

इत्मीनान की एक मुद्रा

जीवन दर्द की एक यात्रा है

सैकड़ों दर्द के पड़ावों से गुजरते हैं हम

जैसे पहाड़ों पर मील के पत्थर गिनते

पार करते ऊपर उठते हैं हम

दर्द की यह यात्रा

हर एक की अपनी है

अकेली है

कुव्वत है, काबिलियत है, चाहत है

कहते हैं, दर्द को दर्द से ही राहत है

याद आता है तो रहता है

भटका दो उसे, भुला दो उसे

उलझा दो उसे दुनिया के किसी शगल में

वह भोला रम जाता है उसी में

भुला देता है वह मुझे, मैं उसे

मगर फिर शाम होते-होते जहाज का पंछी

लौट आता है अपने ठौर

ज्यादा अधिकार के साथ

गहराता है, अंधेरे के साथ अथाह सागर सा

तभी कौंधता है एक मोती गुम होने से ठीक पहले

दर्द-रहित मिलती है एक झपकी

सबसे असावधान मुद्रा में

असतर्क, समर्पण की स्थिति में

वह छोटी झपकी

आंखें खुलती हैं और

दर्द से फिर एकाकार

सतर्कता की एक और मुद्रा

राहत पाने की एक और कोशिश

दर्द की एक और मुद्रा

 

संगीत

music 4

 

अचानक कहीं कोई गमक सुनाई पड़ती है

और लय बहती चली आती है पास

कानों में बज उठती है तरंग

और मन पूरा का पूरा उसमें घुल जाता है

एकाग्र हो जाता है

धीरे-धीरे और कुछ भी सुनाई नहीं देता

सिवाय उस संगीत लहरी के

जो सिर के ठीक ऊपर थिरक रही है

बंद आंखें खुलना नहीं चाहतीं

जैसे गहरी नींद हो

आस-पास दुनिया है

चलती है अपनी आवाजों के साथ

मगर मैं तरंगित हूं इस लय के साथ

छंद की तरह

जिसकी धुन पर

सिर अंगुलियां हाथ पैर

और धीरे-धीरे पूरा वजूद

झूम उठता है

बेखबर

अनजान

कि दुनिया

अपनी गति से चलती रहती है

बगल से गुज़रती हुई

देखती है अजीब नज़रों से

मैं अनोखी बैठी भीड़ में

मुझे अपनी लय, अपनी गति मिल गई

बाकी सब कुछ ठहर सा गया

अस्पताल के उस प्रतीक्षाकक्ष में

 

चांदों के चेहरे

 

ज्यादातर दिन में कभी-कभार रात में भी

अनेक चांद विचरते हैं

यहां से वहां

या किसी प्रतीक्षाकक्ष में बैठे हुए धैर्य से

हर चांद का एक अदद चेहरा है चिकना चमकता सा

बच्चा-बूढ़ा स्त्री-पुरुष मोटा या पतला सा

चांद छुपा है

टोपी स्कार्फ गमछे या साड़ी के पल्लू से

कहीं कोई उघड़ा हुआ भी है बिंदास बेफिकर

चांद और उसके चेहरे का रंग

जैसे अभी-अभी कोयले या सीधी आंच का भभका लगा हो

न साबुन-पानी से साफ होता है न तेल-तारपीन से

हाथों पैरों के नील प़ड़े नाखून

जैसे हथौड़े से ठुकवा आए हों इत्मीनान से गिन-गिन कर

एक-एक को बिना नागा बिना कोताही

अस्पताल में

एक से दिखते लोग

अलग-अलग छिटके

कहीं भी पहचाने जाते हैं

आसानी से पकड़े जाते हैं

वही चिकने चमकते चेहरे

उम्मीद से रोशन सितारे आंखों में लिए

चांद के टुकड़े

चांद का उजास भले ही कभी कम हो जाए

भभकों से या आग से

ये तारे उसे बुझने नहीं देते

राह दिखाते हैं आगे की

हर स्कैन-रक्तजांच-रिपोर्ट से आगे

रजिस्ट्रेशन-रेडिएशन-जलन से आगे

अनिश्चितता-खर्च-कीमोथेरेपी से आगे

दर्द की छांव में बैठे ये यात्री

कभी मुस्कुराते अनजान सहयात्रियों से बातें करते

या अपने में डूबे हुए

फिर भी उत्सुक सब

अपने आस-पास की गतिविधियों के लिए सचेत

शायद कोई हलचल उनके लिए हो उनसे मुखातिब हो

जैसे उनके नाम की पुकार उस बड़े से प्रतीक्षाकक्ष में

बारी आते ही पिछले हर भाव का चोला उतार

वहीं प्रतीक्षाकक्ष की कुर्सी पर छोड़

चलते हैं सब उसी रोशनी में

पैरों में स्प्रिंग लगाए

जैसे कि अब हर मिनट की जल्दी उन्हें जल्द फारिग करेगी

अस्पताल से और इलाज से

अस्पताल और इलाज तक पहुंचने की देरी

भले ही लंबी रही हो

 

मेरे बालों में उलझी मां

hair comb

मां बहुत याद आती है

सबसे ज्यादा याद आता है

उनका मेरे बाल संवार देना

रोज-ब-रोज

बिना नागा

 

बहुत छोटी थी मैं तब

बाल छोटे रखने का शौक ठहरा

पर मां!

खुद चोटी गूंथती, रोज दो बार

घने, लंबे, भारी बाल

कभी उलझते कभी खिंचते

मैं खीझती, झींकती, रोती

पर सुलझने के बाद

चिकने बालों पर कंघी का सरकना

आह! बड़ा आनंद आता

मां की गोदी में बैठे-बैठे

जैसे नैया पार लग गई

फिर उन चिकने तेल सने बालों का चोटियों में गुंथना

Girl hair 1girl hair 5girl hair 2girl hair 3

लगता पहाड़ की चोटी पर बस पहुंचने को ही हैं

रिबन बंध जाने के बाद

मां का पूरे सिर को चोटियों के आखिरी सिरे तक

सहलाना थपकना

मानो आशीर्वाद है,

बाल अब कभी नहीं उलझेंगे

आशीर्वाद काम करता था-

अगली सुबह तक

 

किशोर होने पर ज्यादा ताकत आ गई

बालों में, शरीर में और बातों में

मां की गोद छोटी, बाल कटवाने की मेरी जिद बड़ी

और चोटियों की लंबाई मोटाई बड़ी

उलझन बड़ी

कटवाने दो इन्हें या खुद ही बना दो चोटियां

मुझसे न हो सकेगा ये भारी काम

आधी गोदी में आधी जमीन पर बैठी मैं

और बालों की उलझन-सुलझन से निबटती मां

हर दिन

साथ बैठी मौसी से कहती आश्वस्त, मुस्कुराती संतोषी मां

बड़ी हो गई फिर भी…

प्रेम जताने का तरीका है लड़की का, हँ हँ

 

फिर प्रेम जो सिर चढ़ा

बालों से होता हुआ मां के हाथों को झुरझुरा गया

बालों का सिरा मेरी आंख में चुभा, बह गया

मगर प्रेम वहीं अटका रह गया

बालों में, आंखों के कोरों में

बालों का खिंचना मेरा, रोना-खीझना मां का

 

शादी के बाद पहले सावन में

केवड़े के पत्तों की वेणी चोटी के बीचो-बीच

मोगरे का मोटा-सा गोल गजरा सिर पर

और उसके बीचो-बीच

नगों-जड़ा बड़ा सा स्वर्णफूल

मां की शादी वाली नौ-गजी

मोरपंखी धर्मावरम धूपछांव साड़ी

लांगदार पहनावे की कौंध

अपनी नजरों से नजर उतारती

मां की आंखों का बादल

R Anuradha 4

 

फिर मैं और बड़ी हुई और

ऑस्टियोपोरोसिस से मां की हड्डियां बूढ़ी

अबकी जब मैं बैठी मां के पास

जानते हुए कि नहीं बैठ पाऊंगी गोदी में अब कभी

मां ने पसार दिया अपना आंचल

जमीन पर

बोली- बैठ मेरी गोदी में, चोटी बना दूं तेरी

और बलाएं लेते मां के हाथ

सहलाते रहे मेरे सिर और बालों को आखिरी सिरे तक

मैं जानती हूं मां की गोदी कभी

छोटी कमजोर नाकाफी नहीं हो सकती

हमेशा खाली है मेरे बालों की उलझनों के लिए

 

कुछ बरस और बीते

मेरे लंबे बाल न रहे

और कुछ समय बाद

मां न रही

* नोट- कैंसर के दवाओं से इलाज (कीमोथेरेपी) से बाल झड़ जाते हैं
कहानियां यादें किस्से

 

मेरे भीतर बहुत कहानियां हैं

बहुत यादें हैं

हर याद हर घटना कहानी का माद्दा रखती है

कुछ कहानियां मैं सुनाती हूं

यूं ही कभी किसी को कह दिया

या कभी सामयिकता के बहाने से

किसी उत्सव के बहाने अपना बचपन, उल्लास

किसी जिंदगी, किसी फिल्म के बहाने अपनी तमन्नाएं

शब्दों में बांधने की कोशिश है अनुभवों को

जिन्हें तब महसूस करना तक जानती न थी

जब वे घटित हो रही थीं, मेरे बाहर-भीतर

बस, जमती गईं स्पंज में पानी की तरह

स्पंज सोखता रहा सब शिष्ट अपशिष्ट

स्फीत हो वही स्पंज दबाव पड़ते ही किसी सिरे पर

खोना चाहता है अपनी तरलता

होना चाहता है हल्का कभी

रूखा होने की कीमत पर भी

 

उन यादों घटनाओं को दर्ज करना जरूरी है

इससे पहले कि स्पंज में नत्थी

कहानियों

पानियों

जिंदगानियों के बह जाने

फले-फैले वट वृक्ष से जुड़े परिजीवन के

नष्ट हो जाने की नौबत आ जाए

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जानती हूं यह स्वप्न नहीं है

 

प्यार से मेरा हाथ अपने हाथों में ले

पूछती है हाल-समाचार

उस कमरे की नीली रोशनी

और मेरे भीतर के अंधेरे से जुड़ जाती है

कमरे में स्पिरिट की बासी गंध

हवा को मेरे चारों ओर

और ज्यादा कस रही है

अकबकाई, हैरान

उठ कर भागने की बेजान कोशिश में

मैं वहीं हूं, टूटे शरीर और

हां, कुछ कोनों से घिस चले मन के साथ

बीमार कोशिकाओं का बोझ संभाले

गैर-जानकारी के अंधेरे लिए

रोशनी की तलाश में

मशालों की कामना लिए

मगर उनकी लकड़ियां गीली हैं

उस धुंआते धुंधलके में

आंखें भींच लेती हूं

चिरचिराहच और बढ़ जाती है

फिर आंसू की दो बूंदें उसे शांत करने के लिए

और तब, कुछ देर को

मैं रोशनी मांगना बंद कर देती हूं

उजाले की चाहत और जरूरत के बावजूद

 

इससे पहले कि वह धुंआ

मेरे सिर के निर्वात में भर जाए

उसी परिचित अंधेरे में बहते बहते,

खोल देती हूं मैं अपनी आंखें

पूरी चौड़ी करके

अंधेरा डूब जाता है, रंगीन झिलमिलाहटों में

और सामने है एक गहरा गाढ़ा तरल रंग

 

देखती हूं उस जामुनी रंग में

मेल खाते रंग के अष्टपादी

बेहद छोटे, डूबते उतराते

उस चिपचिपे गाढ़े द्रव की तलहटी से सतह तक

कुलबुलाते/बुलबुले उठाते/ नजाकत से लगातार टहलते

गर्व से उठते सतह तक

फिर लौट जाते अदा से मुड़ कर, लहराकर

बीच में कोई चुक कर तली में बैठने लगता

उससे पहले अपनी अनगिनत बिगड़ैल संतानें छोड़ जाता

उसी चमकदार द्रव में

 

ये जिंदा हिस्से मेरे अपने शरीर के

कूट अक्षरों, इशारों में संदेश लेते-देते

अजनबी भाषाओं में कुछ कहते आपस में

अपना समाज बनाते

समानांतर व्यवस्था खड़ी करते

पिछले दरवाजे से, ज़ोर-ज़बर्दस्ती से खाद्य आपूर्ति

बढ़ती कोशिकाओं का पोषक आहार अपने हिस्से करते

बदले में ढेर सा मैल उलीचते

रासायनिक प्रदूषण फैलाते

अव्यवस्था का संसार रचते

 

तब यकायक कभी

यह जामुनी द्रव ढल जाता है कोलतार के भंवर में

अनेक अष्टपादी

तेजी से गिरते हैं उस ब्लैक होल में, अचानक

जल्दी-जल्दी फैलते-सिकुड़ते

स्वच्छंद से सचेत, संकोची बनते आखिरी सांसों के लिए

फिर उनकी और अनगिनत संतानें

मुस्तैदी से कमान संभालती हैं अपने समाज की, नई व्यवस्था की

अपरिपक्व जोश से बढ़ती हैं आगे

और धंसा देती हैं अपने तीखे लंबे पाद

पास की खाली ज़मीनों पर

अतिक्रमण

कब्ज़े के लिए

 

उस स्लेटी हो चुके तरल में

आलस आनंद की टहलकदमी खत्म

अपनी प्रजाति को बचाने की छटपटाहट फिर एक

बच निकलने की जद्दोजहद फिर एक

दोनों तरफ तनातनी, बेचैनी

अधीर झल्लाहट में

इस बार चोट सीधे दिल के पास

छुरियों-छैनियों से सजे आठों पैरों से

 

धकधक कोई नहीं

अनियमित तड़कन है यह

कहीं भीतर की

एक लय में बंधी टीसों के बीच

अनियमित घनघोर नृत्य अष्टपादियों का

रात के अंधेरे में तेज होता

अंधकार के विषधरों का नृत्यायोजन

क्या सुर-ताल, कैसी थाप आठ पावों की

मरते मांस-मज्जा में धधकती अनुगूंजें

तीखे नश्तरों की सामूहिक झनझनाहट

 

ये सांप से चिकने शिकारी

सरक-फिसल कर पार हो जाते हैं

हर बाड़ से, हर बाधा से

पहुंच जाते हैं भीतर

प्रतिबंधित, अब तक अनछुए क्षेत्रों में

जहां फैलती है उनकी परजीवी बढ़वार

गंदले तालाब में खरपतवार सी

सिराहीन उलझी मजबूत बेलें

लील जाती हैं हर वह कुछ

जो आता है उनके रास्ते में

अपने अप्रिय रंग में सबको रंगते हुए

 

मेरे वजूद पर इनका बढ़ना, फैलना और छा जाना

होना सवार मेरे सीने पर

और चलाना अपने हथौड़े

मेरे भंगुर हो चले अवयवों पर

नष्ट हो रहे मांस को चीरते हुए

भीतर से उठना, उभर आना सतह पर

खून से होकर हड्डियों में फिसलकर उतर जाना

और रिसना सब तरफ धीरे-धीरे

गर्दन की ओर अपने डरावने पंजे धंसाते हुए बढ़ते चले जाना

 

मैं पहली बार डरती हूं

सांस रोके देखती हूं

आगे क्या- की आशंका में

खो देती हूं खुद को

गुम

 

फिर

लौटती हूं

होश में आती हूं

सांस लेती हूं

जाग जाती हूं

टटोलती हूं अपने स्पंदन को

पीती हूं रोशनी को आंखों से जी-भर

ज़रा करवट लेती हूं

और महसूस करती हूं दर्द को

ठीक उसी जगह

जहां रात को पड़ा छोड़कर, अनदेखा कर

चली थी सोने दो घड़ी, इत्मीनान से

अब जानती हूं कि

यह स्वप्न नहीं है

 

कैंसर कोशिका

(कैंसर ऐसी कोशिकाओं का समूह है, जो मरना भूल चुकी हैं)

 

वो मरना भूल चुकीं, अपना रास्ता भूल चुकीं

अपना आपा भूल चुकीं, सखी कोशिका का बहनापा भूल चुकीं

 

बसती हैं अनूठी चीजें हमारे भीतर की अरबों परतों में

वो अमर हो गईं आवारा कोशिकाएं गांठ बनतीं बरसों में

 

बिन बुलाए बिन बताए बिन आहट

जाने कब पार कर जाती है देहरी-चौखट

 

हाथों से फिसल जाती है लिजलिजी ईल सी

डूब चुकी वह चाबी जो दे दे उसे शांति झील सी

 

जुटी है अपने ही जाने किस जोड़-तोड़ में

पागल सी, बेहिसाब बढ़ने की होड़ में

 

कभी चिपकती है जोंक-सी

चुभती तीखी पथरीली नोक-सी

 

जिगर में, सीने में, हड्डियों में कहीं भीतर

पेट या दिमाग की गहरी गुहाओं के भीतर

 

हम ही रहते हैं युद्ध में, लड़ते अपने आप से

वह मात्र झांकती है मोटे रासायनिक कवच की आड़ से

 

हम हैं मुकाबले में सामने, आर-पार के लिए

वह तैर जाती है जहरीले कीमो में बहुरूपिया पतवार लिए

 

हमारी तो लड़ाई है, उन्हें हराना है

उनका मकसद सिर्फ खुद को बचाना है

 

इनकी महारथ छापामारी है

शरीर में जनमती-रहती एक बीमारी है

 

हम करते हैं उन पर वार पर वार

चलाते हैं खंजर तीर और तलवार

 

पर उन्हें क्या परवाह हमारे बंदोबस्त-ओ-असलाह की

खारे आंसुओं, बद-दुआओं की आह की

 

ऐसा भी कभी अपने वजूद पर वक्त आता है

थक कर दुश्मन समर्पण की मुद्रा में आ जाता है

 

इधर खत्म हो गए हैं अपने आयुध और रसद

वह पागल कोशिका भी सीखती है समझौते का एक सबक

 

जाने कब यह सफेद झंडा तार-तार हो जाएगा

उन छद्म कोशिकाओं का कहर फिर शुरू हो जाएगा

 

यह दूसरी लड़ाई है, लंबी खिंचेगी

खरामा-खरामा जिंदगी चलेगी

 

जो मौत को समझता है, वह जानता जीना है

जो मरना भूल जाए उसका जीना क्या जीना है!

 

लिंफएडिमा

 

जब दर्द एक घर देख ले

और उसी में रहना चाहे

उसे नींद आए तो

उसी में सोना चाहे

पसार कर अपने अदृष्य टेंटाक्ल्स

न्यूरॉन्स का सिरहाना बनाकर

वही होता है लिंफएडीमा

जब लिंफ प्रणाली में हो जाए कुछ खराबी

जैसे कि कैंसर

परिपथ का नल तो चलता रहे

पर डॉक्टर निकाल दे उसकी टोंटी सर्जरी में

लिंफेटिक द्रव का आने का रास्ता तो खुला हो बदस्तूर

पर जाने का कोई रास्ता नहीं

नल बंद करने का कोई रास्ता नहीं

तब जमा होता जाता है लिंफ शरीर में

बाज़ू में या पैर में

और उस दैहिक द्रव में सड़ता है देह का वह हिस्सा

उसी द्रव में, देह की रक्षा जिसका कर्तव्य ठहरा

वही होता है लिंफएडीमा

सड़ते मांस की यह गंध मुझे अक्सर परेशान करती है

खासकर रातों में जब सोने के लिए बांह का सिरहाना करती हूं

 

सर्जरी देह से कोई आधा किलो बोझ

हटा देती है मास्टेक्टोमी में

मगर बढ़ा देती है बांह में बोझ

उसी द्रव का

कीटाणुओं का लोड कम करना जिसका कर्तव्य ठहरा

बोझ जब झिलाता है सालों-साल

खींचता है बाह को, कंधे को

एक ओर, संतुलन बिगाड़कर

बोझ खींचता है दर्द को

और दर्द चीथता है देह को

मन इससे अलग कभी रहता है, कभी नहीं

कभी जूझता है, कभी नहीं

हर चीज़ का आदी होना

क्या कोई आदत होती है?

पता नहीं मेरी जान!

 

अपने-अपने हित

 

एक दवा की दुकान है

उसमें सब तरह की दवाएं हैं

दर्द देने वाली

और उसे कम करने वाली

कमज़ोर करने वाली

और ताकत देने वाली

उबकाइयां लाने वाली और उन्हें रोकने वाली

छाले लाने वाली और उनमें आराम देने वाली

नींद उड़ा देने वाली

और नींद लाने वाली

बीमार कर देने वाली

और फिर ठीक कर देने वाली

मार डालने वाली

जो हैं दरअसल जिला देने वाली

 

सब तरह के औजार

काटने वाले

और फिर सिलने वाले

घाव बनाने वाले

और उन्हें भरने वाले

जला देने वाले

और फिर फफोलों को राहत देने वाले

 

उसके पीछे एक अस्पताल है

जहां बैठे चिकत्सक मरीजों के लिए

ये ही दवाएं उपाय लिखा करते हैं

कि कोई खाता-पीता इंसान कमजोर हो जाए

स्वस्थ सा दिखने वाला बीमार दिखने लग जाए

निश्चिंत सोने वाले की रातें खराब हो जाएं

चलता-फिरता इंसान मरने के करीब पहुंच जाए

मगर आखिर को

अनंत सा लंबा

इलाज का दौर खत्म होता है

और पा जाते हैं जीवन सब कोई/ज्यादातर

थोड़े या लंबे समय के लिए

पर इससे दवा दुकानदार क्या पाता है-

मुनाफा

चिकित्सक क्या पाता है-

रोजगार के अलावा

ज्यादातर दुआएं, कभी भर्त्त्सनाएं

कभी पद्मश्री

 

 

 

 

दर्द का उत्तराधिकार

R anuradha 3

जाने किस सदी की, पुरानी

बर्फ है जमी हुई

जो पिघलकर आंखों के रास्ते

बह आती है जब कभी

दर्द जब जाता रहता है

आंखों को भर देता है

पिघलती गर्म

द्रव हुई बर्फ से

बहाव चाहे जितना हो वेगवान

गिना जाए

उससे पहले के अंधड़ को भी

कम न आंका जाए

जो भर देता है आंखों में

धूल किरकिरी जलन

दो बूंदें बरसीं कि

वो अनंत-सी बिखरी-ठहरी

अंतरिक्षीय धूल झप!

रुंधी सांसों को रास्ता मिला

जो रुकी पड़ी थीं सीने में

जाने कब से

बेसब्र सांसों की

अनियमित हड़बड़ाहट

कि जाने फिर

मौका मिले कि नहीं

दर्द, आंसू और सांसों का सिलसिला

निकल पड़ता है एक लय में

इनसे खाली होते ही

नींद भरती है आंखों को सबसे पहले

ध्रुव समय से वंचित

आंखें नींद से बोझिल

हर बड़ा दर्द छोड़ जाता है

अपना उत्तराधिकार

अपने से छोटे

एक और दर्द के लिए

और हिसाब करें तो

हर दर्द की कुल

जमा-पूंजी है

एक अदद कविता

 

कैसा है पैरहन

 

रुई की लचक पर

धुनकी के तारों पर

अपने सधे इशारों पर

जुलाहे को भरोसा है

 

भरनी की रफ्तार पर

तानों-बानों की कतार पर

हर तार की घुमेर पर

बुनकर को भरोसा है

 

सिलाई के टांकों पर

कपड़े की रवानी पर

रंगों की मेलखानी पर

दर्जी को भरोसा है

 

सुई की बारीकी पर

हर रेशे की सिफत पर

हुनर की नफासत पर

रफूगर को भरोसा है

 

फिर पैरहन में इतने लोच क्यों

पैबंद बेमेल क्यों

लट्ठा कहीं मलमल क्यों

कपड़े में धसकन क्यों

 

सूतों में इतनी गांठें क्यों

रफू के तारों में दूरी क्यों

तेरे कपड़े पर ही भरोसा न रहा

मेरे जुलाहे, क्यों!

 

वृहत्तर स्थान-समय में हम

 

अपने आराम के कोटर से

नहीं निकलना चाहते हैं हम

अनिच्छा की रोक

और बदलाव का प्राकृतिक दबाव

इन दोनों के बीच ही मचती है किचकिच

यही असल कारण है दर्द का जो शरीर से ज्यादा माथे में होता है

 

अंडे के भीतर के आराम-इत्मीनान को न छोड़ना

और उस परिपक्व चूज़े पर बाहर निकलने का दबाव

क्योंकि खोल तो समय पर ही टूटता है

लड़ख़ड़ाता छटपटाता चोट खाता कोमल शरीर

नई दुनिया में आने उसमें जीने का अनुभव

 

खोल से बाहर आने-न आने का संघर्ष ही दर्द देता है

ऐसे ही रगड़ खा जाता है वह चमकदार चिकना बेदाग मोती

क्यों न खुलने दें सीप के दोनों अर्धचंद्रों को

अपने समय पर अपनी गति से

ताकि दुनिया देख पाए भीतर के मोती की अद्भुत चमक को

 

सामने पूरा संसार-समुद्र है उड़ने-तैरने को

देखने को हवा पानी रोशनी जीव जीवन और मृत्यु

अपने-से लोगों का साथ

इन सबसे मिलकर वृहद पूरापन पाने की खुशी

क्यों न जाने दें उसे सीमित सीप से परे

असीम संसार में

 

तदर्थ

 

पुराना हो चुका शॉल

गर्मियों में भी ओढ़े रखना

उससे बेहतर है

तदर्थ हो जाना

 

खाने वाला हो कि नहीं

तवा तपाए रखना

उससे बेहतर है

तदर्थ हो जाना

 

घाव कितना हो गहरा

पुरानी पट्टी लपेटे रखना

उससे बेहतर है

तदर्थ हो जाना

 

गुम हुआ हिस्सा जिगसॉ का

जगह भरने की जुगत भिड़ाना

उससे बेहतर है

तदर्थ हो जाना

 

बचपन के खिलौने कपड़े

क्रेयॉन से अलमारी सजाना

उससे बेहतर है

तदर्थ हो जाना

 

डरने लगी हूं

 

आजकल मैं बहुत-सी चीजों से डरने लगी हूं

 

अकेले रहने से

भीड़ के बीच जाने से

 

कहीं जाने के विचार से

कहीं न जा पाने के ख्याल से

 

बहुत सारे काम से

बे-काम होने से

 

बहुत तारीफ से

अनसुना कर दिए जाने से

 

ढेर सारी जांचों से

जांच न करवा पाने से

 

बीमार हो जाने से

तकलीफ का सिरा न मिल पाने से

 

नींद आने से

न सो पाने से

 

साफ-साफ जान लेने से

साफ-साफ न कह पाने से

 

किसी को गले लगाने से

किसी के दूर हो जाने से

 

रात के आने से

सुबह के होने से

 

दिन के मेरे सामने बेतकल्लुफ पसर जाने से

समय के, अस्पताली बस्ते में सिमट जाने से

 

मीठी धूप में देह को भरपूर डुबाने से

सूरज के बेवक्त छुप जाने से

 

सही-गलत के फैसले करने से

तत्काल फैसले करने वालों से

 

टेढ़ी चाल चलने वालों से

सपाट सोचने वालों से

 

बनावट से अपना वजन बढ़ाते लोगों से

नजरों से मेरा वजन तौलते लोगों से

 

और भी ऐसी बहुत-सी चीजों से

जिनका होना ज़रूरी है

न होना ज्यादा सुविधाजनक

 

आश्वस्ति

 

बेतहाशा उठती लहरों के कान में

कौन-सा विपरीत-मंत्र फूकते हो तुम

घुमवदार बेलगाम झंझा पर

कौन-सा पानी फेरते हो

कैसे मैं निर्भय हो जाती हूं एकबारगी

किस तरतीब से रोकते हो इनको

चढ़ते दिन की उद्विग्नता पर धैर्य के ठंडे छींटे

धूसर झुटपुटे पर उम्मीद की उजली चादर पसार देते हो

आकाशचुंबी उत्तालतरंगों के आवेग

और मेरे बीच

तुम स्थिर खड़े हो-

यह आश्वासन

बेलाग बहती तेज हवाओं की

कर्कश-कंटीली छुअन के बाद भी

तुम्हारे साथ होने की राहत

हम चल लेंगे और कई-कई कदम

साथ-साथ

इत्मीनान से

हमेशा की तरह

आश्वस्त सुबहों

और सुरक्षित रातों

के बीच भी

गर जीवन अपनी गति से चले

भागे-अगाए नहीं

बस, साथ-साथ चला करे

 

स्पर्श

 

भरी सर्दी के ठंडे कमरे में

लेटी हैं वे दर्द से सनसनाती बांह लिए

उनकी दुखती बांह पर

अपनी गर्म-नरम हथेली रखे सोचती हूं

चाहती हूं शिद्दत से

कि मेरा दिल जुड़ जाए हाथों के जरिए

उनके दर्द के केंद्र से

मेरे दिल की देह की गर्मी से

बांह थोड़ी सिके राहत पा जाए

दर्द भाप बन उड़ जाए

हल्के से दबाती हूं कंधे को

कि उन्हें भरोसा रहे

दर्द सचमुच एक बुलबुला है

उनकी किसी नस में अटका हुआ

मेरे हाथों के दबाव से सरक कर

बांह से अंगुलियों तक, पोरों तक आकर

शरीर से बाहर निकल जाएगा

या बीच के रास्ते में धीरे-धीरे

खून में मिलकर हवा के साथ

फेफड़ों से सांस के जरिए निकल जाएगा

उनकी दर्द से जकड़ी बांह को छोड़कर

तंतुओं की अकड़न को तोड़ कर

 

यह स्पर्श चिकित्सा काम करती है सचमुच

ठीक वैसे ही, जैसे

डूबते को तिनके का सहारा होता है

एक तो- तिनका तैरता है

सो, डूबता उससे उम्मीद पाता है न डूब जाने की

दूसरे- डूबता उस तिनके से किसी पल

महीन सा उत्प्लावन बल पाता है

दोनों तरह से पाता है संबल शरीर का और मन का भी

मगर इन दोनों कारणों से ज्यादा महत्वपूर्ण-

तिनका डूबते को

स्पर्श का अनुभव देता है

साथ का अश्वासन देता है

स्पर्श संवेदना है तरंग है

आवेग है आवेश है

एक से दूसरे जीवित-अजीवित में संचारित

दोनों को करते प्रभावित

कभी प्रकाश कभी गति

कभी उद्दीपन कभी ऊष्मा

स्पर्श में भावना हो तो जादू है

न हो तो भी जादू

 

रिश्ते

 

रिश्ते ईंट नहीं होते

कि मिट्टी-चूने का गारा बनाया

सांचे में भरा

उसे उलटा

सुखाया और भट्टी में पका दिया

बनाने वाले की अमिट मोहर के साथ

हमेशा के लिए मजबूत

नींव हो या कि दीवार

 

कुछ रिश्तों में कुछ होना-सोना हमेशा बना रहता है

संभावनाओं अपेक्षाओं के बहुरंगी वितान पर

उभरते ठोस चित्र

 

कुछ रिश्ते निरंतर पूंजी निवेश मांगते हैं

अपनी उत्तरजीविता के लिए

कुछ शब्द कुछ लक्षण कुछ प्रदर्शन

 

कुछ आकाशी पाखी होते हैं

बाग-ताल में मुंडेर पर

कुछ देर रुकते फिर चल देते हैं

 

कोई रिश्ता-कबूतर हमेशा जोड़ी में

बंद खिड़की के बाहर बैठ गुटर-गूं

बरसो-बरस चोंचों से कांच को चौखट को ठकठकाता

अपने नीड़ के लिए कोना तलाशता

 

कोई छा जाता है अमरबेल सा

चूस कर सुखा कर

झड़ जाता है खुद भी साथ में

 

कोई बना देता है किसी

असंवेदनशील को

अमरबेल सा परभक्षी परनिर्भर

 

या गुलेल से छूटा पत्थर

गुलेल के संकेत पर उसकी तय दिशा में

उसी के लक्ष्य पर

निशाने को बेध कर गिरा गुम हो गया

शेष रही खाली गुलेल

और बिधा लक्ष्य

 

एक होता है सेमल सा

लाल मांसल पंखुड़ियों में

या मौसम की मार से सख्त हुए

खोल के भीतर

दबा-छुपा रुई का ढेर

सख्तजान खोल में सिमटा देर तक

फटा तो कोमल फाहों का अनंत सिलसिला

कोई समेट दे तो तकिया

कपड़े के मामूली टुकड़े के काबू में

वरना अपनी भारहीन पारदर्शी उपस्थिति

शहर भर में बिखेरता

मौसम बीतने के बाद भी

देर तक जताता अपना होना

पसंदगी-नापसंदगी की हवाओं से परे

 

चालें

 

जब घिर गए हों गहन चक्रव्यूह में

साधनों से लैस ताकतवर योद्धा विरोधियों के

तो क्या करेंगे आप?

सहज वृत्ति निर्देशित करती है

कि खोजें व्यूह की सबसे कमज़ोर कड़ी को

उसके बाद?

हिसाबी दिमाग कहता है करो उस पर वार

तोड़ो उस कमज़ोर को और हो जाओ पार

उस गहन व्यूह रचना के

पर इतना सहज भी तो नहीं है न!

कमजोर कड़ी जब टूटती है

शेष मजबूत कड़ियां करती हैं समंजन

ज्यादा पास आ भरती हैं खाली जगह को तत्क्षण

चक्र और ज्यादा मजबूत हो जाता है आपके खिलाफ

उस कमजोर कड़ी के हटने से

और ज्यादा कस जाता है आपके चारों ओर

तब क्या करें आप?

 

अनुभव बताता है

संजोए रखो उस कमज़ोर कड़ी को

अपनी निगहबानी में लगातार

व्यूह के महारथियों की नज़र ध्यान से दूर

तब तक

जब तक कि आप

खोज न लें मौका

कि कमज़ोर के साथ की मजबूत कड़ी भी

ले आपको हलके में

जब तक पहुंच न जाए बाहर से सहायता

या भीतर से आप इतने ताकतवर न हो जाएं

लेकिन

तब तक जरूरी है

रोके रखना हर वार को

दुश्मन की हर चाल को

दिखते रहना कमज़ोर

जीत की जुगत से बेपरवाह

हारते हुए से

दुश्मन भी शिथिल हो रहे व्यूह पुनर्रचनाओं की ओर से

युद्धनीति की भावी गणितीय योजनाओं से

विरोधी की सबसे कमजोर कड़ी

है सबसे महत्वपूर्ण कड़ी

जीतने और जीने के खेल में

 

अवेदना सदन

R anuradha

 

आजाद पंछी

कैद हो पिंजरे में

कितना बेबस, कितना परवश

तन का घाव कभी भर पाएगा?

मन की चोट देखे कौन?

न टूटे वो बंधन जो बांधे थे

जंगल से, पेड़ से औ’ नीड़ से

सोने के पिंजरे में अतृप्त पंछी

सपनों के लिए नहीं आकाश

हैं सिर्फ दो छोटी आंखें

सांसो की डोर बंधी जीवन से

जिसके सहारे उस पार है जाना

जहां कोई न जानता हो

शब्द- ‘कैंसर’

 

 

 

सपना

 

बादल का नन्हा-सा टुकड़ा

विशाल आसमान पर

उड़ रहा था

सपनों में खोया हुआ

खयालों में डूबा हुआ

धरती से दूर

बहुत दूर

मस्ती से उड़ रहा था

शायद उसे नियति का

पता नहीं था

कि कुछ ही देर में

उसके सपने टूट जाएंगे

उसका अस्तित्व बिखर जाएगा

सभी ने देखा-

वह मस्त बादल का टुकड़ा

धरातल पर आया,

बिखर गया

मिट्टी में मिल गया

मगर मैंने देखा-

मिट्टी में मिलकर भी

वह मिटा नहीं था

उस दीवाने बादल ने

खुद को मिटाकर

एक बीज को जीवन दिया था

वह खत्म होकर भी

अमर था

शायद,

यही उसका सपना था

 

पैदल यात्रा का सुख

Anuradha

हां, बेफिक्र होकर

होना सत्तर पार, साठ पार, पचास पार…

वक्त इतनी मोहलत दे, कोई भरोसा नहीं

अगर यह सच है तो भी

दिल मेरा जगह पर है,

खोई नहीं एक भी धड़कन, बेवजह

बेशकीमती जो ठहरी

नहीं, पहाड़ कतई जरूरी नहीं

कि मैं पार करूं जिंदगी के

बस, चलते जाना भी तो

काम है

जीने का नाम है

समतल का मुसाफिर होना

चल पाना दूर तलक

सुंदर है यहां तक सब कुछ

 

जीवन की हवाएं

 

सांसों का लगातार आते-जाते रहना जीवन है

महज सांस लेते जाना मगर जीवन तो नहीं

अपने को मुग़ालते में रखना है

 

जब मालूम हो कि हवा गरम है

आंखें मूंद लेना

बदलते मौसम को न देख पाना

 

जब हवा की जगह चलते हों बर्फीले अंधड़

हवा की दिशा में मुड़ जाना

बालों को सहलाती-संवारती हवा के अनुभव से

खुद को वंचित रख देना

 

तूफानी बारिश जब जोरों पर हो

सुरक्षित कमरे में बैठना

अनदेखा करना उस विभोर बच्चे को

जो सब झेल रहा है आनंद में मगन

 

और इन सबके बीच

वसंत कब आया कब गया- पता लगा?

 

हवाएं बदलती हैं बदलते मौसम के साथ

इनको न जानना यानी

अपने को जानने के मौके खोते जाना

मौसम-दर-मौसम

अपने को मुग़ालते में रखना

 

सत्तर फीसदी या सात फीसदी

 

नई आशाएं, नए क्षितिज

नई जिंदगियां और नया सब कुछ

उम्र के उस दौर में जब

पांव सपनों पर पड़ते हों और

रंग इतने, बेहिसाब

कि इंतजार करते हों अपनी बारी का

चाहिए उम्मीद उस घर को

सिर्फ एक उम्मीद

कि यह जान कायम रहे

मजबूत, आजाद, जिंदादिल… सब ठीक

मगर भीतर कहीं गहरे-उथले

वह एक बुद्धू शैतान बेडौल बेलगाम बढ़ती काया

जो छा रही है हर जिंदा चीज पर

जब चुरा ले चुपके से सब कुछ, तो!

जिंदगी में दखल

सपनों में खलल

अकबकाकर देखना सब तरफ

समंदर में ऊब-डूब

फेफड़ा-भर सांस की तलाश में

लैब रिपोर्ट जब हाथ में हो

जैसे कि प्रेम हो—

हमेशा रहूंगा, साथ निभाऊंगा

मरते दम तक?

इसका ईमानदार जवाब

किसी प्रेमी के पास भी होता है भला!

उन दिनों के लौटने का इंतजार करें कि नहीं

जो गदराई उम्र में रस भरते हैं?

उनके यहां ऐसे सवालों के जवाब नहीं होते

जिनको कभी छू गया हो

रेगिस्तानी हवा का तपता झोंका

जवाब में होते हैं बस आंकड़े

 

चल

 

चलना ही सहज है स्वाभाविक है

पृथ्वी सूर्य चांद तारे धूमकेतु आकाशगंगाएं

सभी चलते हैं अपनी गति से अपनी दिशाओं में

चलते हैं तो रहते हैं

 

चलते हैं लोग भी

अपनी तय की गई दिशाओं में

कोई साथ चलता है,

कोई दूर दो हाथ चलता है

कोई समान दिशा में कोई विपरीत

कोई चलता है अभिमान से कोई गर्व से

संकोच से बाध्य सा या निस्पृह सा

पहचान और सम्मान

कोई पाना चाहता है

कोई उगाहना चाहता है

कोई पाने-चाहने की तृष्णा से अपरिचित

बस, चलता जाता है

 

किसी के पास सौ रास्ते हैं प्रतीक्षा में

कोई गुम ही है अपने इकलौते रास्ते में

कोई यूं भी है कि व्यस्त है

अपना रास्ता बनाने-बिछाने में

रोशनी भी सबके हिस्से एक-सी नहीं है न

बाहर की या भीतर की

लेकिन फिर भी

सबसे महत्वपूर्ण है चलना

किसी के पैरों ने हाथ खड़े कर दिए

किसी के रास्तों ने विद्रोह का रास्ता पकड़ा

कोई अपने भीतर के विद्रोह को रास्ते पर उड़ेलता है

तो कोई पिघलते-बहते रास्ते पर जमना चाहता है

जैसे भी हो,

सब चलते हैं

चले हैं तो जीते हैं

 

कैंसर को संबोधन

 

तो,

तुम समझते हो, होशियार हो

चालाक चालबाज़ हो

चल सकतते हो मुझसे पैनी महीन चालें इस खेल में

तेज़ दौड़ सकते हो मुझसे

ताकतवर हो कई गुना मुझसे

विनाश का वज़न तुम्हारी तरफ ज्यादा है

मुझे काबू में रखते हो

चौंकाते हो अपने सटीक वारों से

पर देखती हूं कब तक

देखना एक दिन गिरोगे मुंह के बल

अपनी इस बेलगाम दौड़ में

अपमान से नष्ट होकर

जानोगे कितना वक्त ज़ाया किया

हमें नीचे गिराने में

तुम्हारी जल्दबाज़ी डुबाएगी तुम्हें

मैं बिल्कुल जल्दी में नहीं हूं

अपने फितूर के लिए अपने खेल के लिए

ऐसी बेजा चालें बेतरतीब बेउसूल

मुझे छकातीं थकातीं

पर नहीं हो पाएंगी मुझ पर हावी

और नहीं

छुप कर छापामारी करने वाले

आओ मेरे सामने

जान लो और मान लो-

मुझे कोई डर नहीं

न तुम्हारे होने का न अपने खोने का

अपना सिर टकराओगे एक दिन

इन्हीं मोटी दीवारों से

और मानोगे हार

तब बताना कैसा लगता है

अपने खून को देखना

वक्त-बेवक्त उठते भंवर को साधना

भंगुर हुई देह को सहेजना

जानती हूं तुम कोई मज़ाक नहीं

कोई जुक़ाम नहीं कि एक छींक से निजात पा लूं

मेरी दीवारों के भीतर सुरक्षित हो फिलहाल

ओ घुसपैठिए आतंकवादी

मेरे भीतर भी मगर, चल रही है

लड़ाई जद्दोजहद खींचतान चर्चा-विचार

सेनाएं काम पर हैं

शांति-प्रस्ताव भी देती हूं

कैसे मानोगे बता दो अभी

न माने तो भी

तुम्हारी जीत भी आखिर क्या जीत होगी

अब लड़ाई छोड़ो

जी भी लेने दो जरा!
मुट्ठी में रेत

 

रेत

तेजी से फिसल रही है

मुट्ठी

कस कर बंद कर लो

चिपकी

कुछ तो बची रहेगी

गीली

पसीने से हथेली

खुली

मुट्ठी से तो बेहतर है

 

सपनों की ज़मीन

 

चाहे जितनी चौहद्दियां बांध दो

लकीरें उकेर दो जमीन पर

सपने तो फिर भी उगते हैं

हर मिट्टी में

हर समय

सोई आंखों के नहीं

सच के सपने

फूलों के अच्छे मौसमों के प्रेम के सपने

सुदूर यात्राओं के सपने

पोथियों को पढ़ जाने के धैर्य के सपने

सर्दी में मीठी धूप की सिहरन के

गर्मी में पीपल-नीम की छांव में उसांसों के सपने

बारिश में भीगी देह पर गर्म स्पर्श के सपने

छोटे सपने बड़े सपने

सरल सपने कड़े सपने

सपनों के बीज बोना गुनाह तो नहीं

उनके अंकुआने की पीड़ा का आनंद लेना गलत तो नहीं

जब आभास हो

कि इन सपनों को पोसने के लिए

टिकाऊ उर्वर देह-माटी का सपना

शायद उतना सच्चा न हो!

 

अंधेरे पुल पर

anuradha's face

शुरुआत के साथ ही तय होता है अंत का होना

कब, कहां, कैसे- सब बाद में तय होता है

पर जब अंदाज़ा हो कि यात्रा

शुरुआती बिंदु से

बढ़ चुकी है काफी आगे

पर अंत का कोई ओर-छोर नहीं

उस ऊंचे अंधेरे पुल पर

मोटे रस्सों से बने

 

गहरी अतल खाई पर झूलते

काई से चिकने नम काले

हर कदम पर हिलते पुल पर

गहरी धुंध के बीच लगातार चलते

पता ही न लगे कि पुल का कोई छोर

है भी कि नहीं

 

ऐसे एक पुल पर मगर रोशनी का एक पुंज

मेरे आगे है

जिसकी परछाईं में चलती हूं

धीरे-धीरे स्थिर कदमों से

सुरक्षित निश्चिंत बेधड़क

दूर रोशनी बनी रहे परछाईं दिखती रहे

उसके बाद

हमेशा यह जानना जरूरी नहीं लगता

आगे घाटी कितनी दूर तलक है

या कि पुल कितना लंबा

 

छोटी सी लंबी कहानी

 

एक लहर मचली

किसी ने न देखा

एक पीड़ा जगी

किसी ने न समझा

लहर खो गई गहरे तूफान में

तूफान के बाद

सन्नाटा

गहरे सन्नाटे में

धीमे-धीमे मधुर-मधुर

गुनगुनाती हवा

जीवन का है मोल यहां पर

पीड़ा है अनमोल

सूनी आंखें वीरान तट

मोती हैं अनमोल

 

आज

 

धीरे-धीरे धुंधलाती आज की शाम

आज का सूरज डूबने को है

कल के सूरज का इंतजार है

मैंने कल का सपना नहीं सजाया

उन रंगों से आज को रंगीन बनाया है

ये रंगीन आज चित्रित है

मेरे अंतस के कैनवास पर

कल के सूरज में नए रंग होंगे

एक नई तसवीर बनेगी

सागर में एक और बूंद

समा जाएगी

एक और कविता

दुनिया की लाखों-लाख

कविताओं में शामिल होगी

आज का सूरज निकला था

दिन भर के लिए

कल शायद साथ न दे

क्या भरोसा!

 

 

 

पहचान

Anuradha on the beach

 

अपने को कौन जान सकता है

बेहतर, खुद के सिवा

सचेत अभिभावक रखता है नजर

अपने बच्चों की अठखेलियों-शैतानियों

और कारगुजारियों पर

और माफ करता चलता है

मगर यहां माफी काम नहीं देती

माफी देती है सज़ा, पछतावा जिंदगी भर के लिए

अपने को भला माफ कभी करना चाहिए!

अपनी अनदेखियों, लापरवाहियों के लिए तो कभी नहीं

फिर पछताना क्या- कि काश ऐसा कर पाते…

पर वो समय बीत गया

अब जो है, सो सामने है

आगे रास्ता लेकिन अभी बाकी है

वक्त है, हिम्मत है

अपने से लगाव है तो होने दो अपने भीतर

ये जद्दोजहद

संघर्ष होने दो, हार-जीत होने दो

कभी कोई चित्त, तो कभी कोई

पर आखिर होगी जीत ज़िंदगी की

क्योंकि वही तो है जो

जीती है, जाने के बाद भी

 

इस इमारत की खिड़कियां

Dilip and anuradha

इस ऊंची इमारत की

हजारों मंजिलों पर

उम्मीदों की अनगिनत खिड़कियां हैं

खुशी के आकाश का एक टुकड़ा

हर खिड़की पर टंगा है

हर चौखटे में जड़ी

सपने की एक चादर

चादर में टंके सूरज-चांद-सितारे

और कभी एक बादल भी- महत्वाकांक्षा का

मगर ये धब्बे इन दीवारों पर जाने कहां से आ बैठे

नींव कमजोर तो न थी पर

ईंटों में लगे दीमक निकल न पाते

इसके ढांचे में बस चुके हैं गुपचुप

कड़क मौसमों की मार जो झेल न पाया

सपने फिर भी सजते हैं

उम्मीद भरी खिड़कियों पर

चादरें वैसी ही सजीली हैं

सीलन-कुतरन-टूटन से अनछुई

कैसे रोकें

खूबसूरत बदलते मौसमों को

सुहावनी हवाओं

सूरज-चांद-सितारों-बादलों की जगर-मगर को

भीतर आने से

उम्मीदों की खिड़कियों के

पाट जो नहीं होते

 

संधान के पक्ष में हस्ताक्षर

 

पेड़ों के साए

लंबे हुए,

पुछ गए

सूरज

अपनी आखिरी किरणें

फेंक गया

इस हिस्से में धरती के,

बुझ गया!

घनेरे अंधेरे

अभी कुछ दूर

और चलेंगे

तब यहां पहुंचेंगे

शाम का झुटपुटा

धुंधलाती नजर

उजाला

भले हो कम

पर

भीतर की लौ

दम भरती

अब भी शेष

और ज्यादा पसारती

धुंधलके को

उस कमरे में

खिड़की से आती

धीमी हवा

प्रतीक्षा/आशंका

लौ के बुझने की

उजाले/अंधेरे

कमरे के

मन के

गहरी सांस

आखिरी भभक

फैला गई

उजास

सब तरफ

सौंप स्वयं को

दूसरे रश्मि-पुंज को

नई लौ

खूब युवा

खूब ताज़ा

सुबह होने तक

जलती

चलती

जगाती आशा

अंधेरे के विरुद्ध

कैंसर के विरुद्ध

संधान/

शोध और समाधान

का प्रकाश

दूधिया चमकदार

जिसमें उभरते

स्वर्णाक्षर

एक मां ने किए

अपनी संतानों

के लिए

आने वाली पीढ़ियों

के लिए

उत्तराधिकार-पत्र

पर हस्ताक्षर

 

तुम्हें दे सकती हूं

music

आओ तुम्हें कुछ दूं

खास

जो है मेरे पास

अनुभव का पिटारा

तिगुना बड़ा, विविध रंगों भरा

ज्ञान का घड़ा

हमेशा भरा, फिर भी खाली, असंतृप्त

और-और की ललक में

किसी अमृत-बूंद की प्रतीक्षा में

जिंदगी की धूप-छांह में रहूं साथ तुम्हारे

एक विचार की तरह

बताऊं स्वयं स्तन परीक्षा के बारे में

कौन जान सकता है अपनी देह को

खुद से बेहतर

बाहर और भीतर से

जहां लज्जा-संकोच खत्म होते हैं

वहीं से शुरू होता है ज्ञान

अपने को जानने का मान

कि कैसे और क्यों कोई ज़हर

दवा हो जाता है

ठीक,

जैसे ज़हर काटता है ज़हर को

कोशा के भीतर पनप गए ज़हर को

काटता है कीमोथेरेपी का संतुलित सम्मिश्रण

ट्यूमर के लिए ठीक उपयुक्त

और जलाने वाली मशीन

सीने को  जलाकर भी

बचा देती है जान को

देती है मौका जीने का

बाकी शरीर को

बताऊं इनके बुरे असर

और बचने-साधने के नुस्खे

निजी और डॉक्टरी

बताऊं सर्जरी से जल्द उबरने के उपाय

मगर उससे पहले बताऊं

कि क्यों काट देगी सर्जरी उस हिस्से को

जिसे किसी पुरुष या दुधमुंहे के लिए

बचाए रखने की कीमत है- एक जान

तुम्हारी जान

और बताऊं आगे का जीवन कैसे चले बेहतर

सेहत भी और जीने की शिद्दत भी

बनी रहे थोड़े-बहुत हेर-फेर से

पर अगर दर्द पूछोगी

तो नहीं बता पाऊंगी

क्योंकि हर एक के लिए

उसकी जुबान अलग है

उसकी भाषा को हर देह

अपनी तरह से

समझती है/संवाद करती है

झगड़ती-निबटती है

या समझौते करती है

कैंसर के बाद दूसरी जिंदगी के लिए

कुछ प्रेरणाएं-उछाहनाएं

कि नहीं लौटना उस लीक पर

जिसमें तुम्हारे लिए गड्ढे और धूल हैं

पैदल रास्तों पर पांवों को सुरक्षा तक नहीं

जहां सब चलते हों पालकी पर

तुम अगर न पा सको पालकी तो

रचो अपना खटोला

मजबूत सुरक्षित

जो चले तुम्हारे कहे मुताबिक, तुम्हारी रफ्तार से

जरूरी कतई नहीं कि रास्ता वही

धूल-गड्ढ़ों भरा हो

अपना खटोला/ अपना रास्ता

गढ़ना कुछ कठिन नहीं

उसके लिए

जिसके हाथ है

पीढ़ियों की रचना

 

चाहती हूं जीना एक दिन

music 3

जिंदगी उतनी लंबी होती है, जितनी आदमी जी लेता है

उतनी नहीं जितनी आदमी जिंदा रह लेता है

कोई एक में कई जिंदगियां जी लेता है

तो कोई एक दिन भी नहीं जी पाता

मैं जीना चाहती हूं

एक दिन में कई दिन- चाहती हूं जीना ऐसा एक दिन

एक शाम- जब मैं जा सकूं साथी के साथ

सान्ता मोनिका पर नए साल के स्वागत के लिए

कोई दिन- बिना दर्द, जलन, तकलीफ के

एक दिन- जब मेरे हाथ में हो दिलचस्प किताब

पास बजता हो मीठा संगीत और साथ हो अच्छा खाना

दो दिन- जब मैं नताशा के साथ फुर्सत से बैठकर गपशप कर सकूं

बैठे-बैठे उसकी बिटिया को अपनी गोद में सुला सकूं

दस दिन- जब किसी बच्चे के साथ

जा सकूं एक छोटी सी पहाड़ी पर पर्वतारोहण के लिए

एक महीना- जब मुझे अस्पताल या पैथोलॉजी लैब का

एक भी चक्कर न लगाना पड़े

एक मौसम- जिसके हर दिन मैं पकाऊं कुछ नया, पहनूं कुछ नया

जो बनाए मुझे सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा

एक साल- लगा सकूं हर पखवाड़े एक

कैंसर जांच और जागरूकता शिविर दुनिया भर में

पांच साल- बिना कैंसर की पुनरावृत्ति के

एक जीवन- परिवार और झुरमुटों-झरनों-जुगनुओं के बीच

रहूं दूर पहाड़ी पर कहीं

मैं ये सारे दिन एक बार जीना चाहती हूं

इजाजत है?

 

क्या चाहती हूं मैं अब

music 2

दर्द से उबरकर कभी सोचती हूं

क्या चाहती हूं मैं जिंदगी से

अब

जबकि समय सीमित है

हमेशा की तरह, लेकिन फिर भी अलग

कौनसी कामनाएं हैं जो पूरी होंगी या छूट जाएंगी पीछे

कई बरस पहले किया था खुद से यही सवाल

और जवाब में पाई थी छोटी-छोटी हसरतों/खिलवाड़ों की एक छोटी-मोटी फेहरिस्त

किसी घंटे किसी दिन किसी पखवाड़े महीने साल पांच-दस साल में निबट जाने वाली

आनंद आराम सुख बेफिक्री मनमौज मन के बहलाने-भरमाने को कोई शगल बस!

अब वही सवाल फिर सामने है

पर जवाब उलझे से, मुझे उलझाते से-

जो कम हैं उनका कुनबा बढ़े

पानी का रुतबा बढ़े

जिनके पैर हैं उनको जमीन मिले

जिनके नहीं उनकी जमीन चले- जो हो सबकी साझा

सबकी रोटियां करारी हों

साथ में नींबू-मिर्च की क्यारी हो- सबकी साझा

जीवन हो स्मृतियां हो लंबी कहानियों सी

समवेदनाएं दमकें धूप-किनारियों सी

सारी रातें और सारे दिन

बुनें कहानियों और किरणों-किनारियों की चोटियों सी…

अरे, अब की फेहरिस्त तो उससे भी छोटी निकली!

 

आधारशिला

 

अनुसंधान

भविष्य की आधारशिला

अगर इसका मतलब है

सिर्फ एक और दिन

तो भी बहुत है

मैं जिंदा तो हूं

जीती हूं कई बार

जीती हैं मेरे साथ

उम्मीदें

अपने जीने की

चुनौती

मेरे बने रहने की

परीक्षा

मेरी उत्तजीविता की

प्रामाणिकता

मुझसे परावर्तित जीवट की

एक और मौका

मेरी क्षमता को

आने वाली पीढ़ियों के लिए

तलाशने को जवाब

उन अव्यक्त अनाकार सवालों के

जो जुड़ते हैं कहीं अंतरिक्ष में

अनंत में

उस सबसे

जो गुज़र गया

और जो आने को है

देखती हूं उनमें

अपने भविष्य की झलक

जिंदगी कभी खत्म नहीं होती

उम्मीद कभी खत्म नहीं होती

 

गणित

 

ज़िंदगी गणित नहीं है

या मेरा हिसाब कमजोर है

हमेशा से ही

एक दिन बीतना =/ एक दिन जीना

कभी दिन छोटा पड़ जाता है

और जीना कैरी-फॉरवर्ड हो जाता है, अगले दिन में

या दिन लंबा हो जाता है और

डेफीसिट में चला जाता है जीने का जज़्बा

हालांकि एक दिन = 24 घंटे हमेशा ही रहे हैं

कभी जिंदगी बीतते-बीतते थक जाती है

कभी आदमी जीते-जीते उकता जाता है

जीने की लंबाई ज्यादा हो

तो जिंदगी की लंबाई छोटी लगती है

यानी ज़िंदगी की लंबाई व्युत्क्रमानुपाती जीने की लंबाई

अजीब बात है!

दोनों ही स्थितियों में

जिंदगी का छोटापन अखर जाता है

किसी के जीते जी या उसके बाद!

 

यात्रा

 

यात्रा का गंतव्य क्या है?

अंतिम                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           Anuradha                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         लक्ष्य क्या है?

यात्रा अपने आप में

इन प्रश्नों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है

 

कि रास्ता कैसे कटा

कैसे साथी रहे

कौन साथ चला

किसका हाथ छूटा

 

कि रास्ता कितना जटिल या सरल था

कितना ऊवड़-खाबड़ कठिनाइयों भरा

या चिकना-सपाट

कितना लंबा था- यह भी एक प्रश्न है

हालांकि उतना महत्वपूर्ण नहीं

इसकी समझ सापेक्ष है

चलने की रफ्तार उत्साह इच्छा और खुशी के

ठीक व्युत्क्रमानुपाती है रास्ते की लंबाई

यह अक्सर तय होता है इस बात से

कि साथ कौन है जिगरी कितना है

जो चलने के आनंद से ज्यादा

दर्द और थकान साझा करता है

 

पीछे मुड़ कर देखता वह है

जो चलने का आनंद को चुका

जो आगे की यात्रा से सहम गया

पीछे छूटे रास्ते से भरमा गया

या अपने पैरों पर विश्वास खो बैठा

जिसका पीछे कुछ/कोई प्रिय छूट गया

जिसके मिलने की जरूरत तो है पर उम्मीद नहीं

 

छोटी यात्रा या छोटी लगती यात्रा में

बीता समय पहुंच के भीतर होता है

वापस जा पाने अपने प्रिय से मिल पाने का

विश्वास साथ होता है

यह भरोसा

कि फिर देख पाएंगे उस दुनिया को

छू पाएंगे उन लोगों को

दोहरा पाएंगे आपस में अपने-अपने या साझा

निश्छल अपराधों और निर्मल आनंदों के किस्से

 

आगे आने वाले रास्ते का क्या कहना

हमारे हाथों में लगाम भर है, थामने को

और अपनी-अपनी कुव्वत

अपने घोड़े और रास्ते को चीन्हने की

 

परिचय

 

जन्मः 11 अक्टूबर 1967 को मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के बिलासपुर जिले में।

छह महीने की उम्र में परिवार जबलपुर आ गया। तब से लेकर नौकरी के लिए दिल्ली आकर बसने तक का जीवन वहीं बीता।

जीव विज्ञान में डिग्री। जबलपुर के रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और संचार में उपाधि, समाजशास्त्र और जनसंचार में स्नातकोत्तर उपाधियां। दिल्ली में बाल-पत्रिका चंपक में कुछ महीनों की उप-संपादकी के बाद टाइम्स प्रकाशन समूह में सामाजिक पत्रकारिता में प्रशिक्षण और स्नातकोत्तर डिप्लोमा। हिंदी अखबार दैनिक जागरण में कुछ महीने उप-संपादक। 1991 में भारतीय सूचना सेवा में प्रवेश। पत्र सूचना कार्यालय में लंबा समय बिताने और डीडी न्यूज में समाचार संपादक की भूमिका निभाने के बाद दिसंबर 2006 से प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार में संपादक।

बाल साहित्य, विज्ञान और समाज से जुड़े विविध विषयों पर बीसियों पुस्तकों का संपादन। कैंसर से अपनी पहली लड़ाई पर बहुचर्चित आत्मकथात्मक पुस्तक ‘इंद्रधनुष के पीछे-पीछे : एक कैंसर विजेता की डायरी’ राधाकृष्ण प्रकाशन से 2005 में प्रकाशित। इसका गुजराती में अनुवाद साहित्य संगम प्रकाशन, सूरत से प्रकाशित। शीर्ष पत्रकार एसपी सिंह की रचनाओं के एकमात्र संकलन ‘पत्रकारिता का महानायक सुरेंद्र प्रताप सिंह संचयन’ (राजकमल प्रकाशन, 2011)  का संपादन। नई मीडिया की आधुनिक प्रवृत्तियों पर पुस्तक ‘न्यू मीडिया; इंटरनेट की भाषायी चुनौतियां और संभावनाएं’ (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2012)  का संपादन। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विशेष रूप से विज्ञान, समाज और महिलाओं से जुड़े विषयों पर सतत लेखन। कैंसर-जागरूकता के लिए कार्य हेतु उत्तर प्रदेशीय महिला मंच का हिंदप्रभा 2010 पुरस्कार और पिंक चेन सम्मान 2013 से सम्मानित।

ब्लॉगः www.ranuradha.blogspot.in

फेसबुक: www.facebook.com/R.Anuradha

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