असफल बच्चे नहीं हम होते हैं ! किशोर

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पिछले महीने मैं मुंबई से दिल्ली ट्रेन से सफ़र कर रहा था.एक छोटा सा परिवार (मां, बाप और ३ साल का लड़का)  मेरे हमसफ़र थे.बच्चा अपनी इस रेल यात्रा को लेकर काफी उत्सहित था जैसा कि अक्सर बच्चे होते हैं.अक्सर ट्रेन में बैठने और सोने के लिए लेयर में बनी सीट्स और बर्थसउन्हें परीकथा जैसे लगते हैं  . वो बार-बार अपनी सीट से उतर कर इधर-उधर जाने की कोशिशकर रहा था. कभी वह ऊपर की बर्थ पर चढने की जिद करता तो कभी उतरने की. ट्रेन के मुसाफिरों में उसकी उम्र के एक लड़का और एक लड़की और भी थे जिनके साथ वह कभी खेलता तो कभी लड़ता. कभी ये बच्चे एक के हाथ से चिप्स या बिस्कुट छीनने की कोशिश करते कभी अपनी मां के पास जाकर दुसरे की शिकायत करते. अपनी प्यारी-प्यारी अटखेलियों से वह ट्रेन के सभी मुसाफिरों का प्यारा बन गया और सभी उसके साथ खेलने की कोशिश कर रहे थे. कुछ उसे पकड़ कर   गले लगाने की कोशिश कर रहे थे तो कुछ चूमने की.   गले  लगाना और चूमना उसे कुछ खास पसंद नहीं था और वह अपनी नाराजगी रो और चीख कर दिखा भी रहा था. पर उसका यह विरोध बड़ों   को कम ही समझ आ रहा था.

कभी-कभी वो चार सीट आगे ८-९ महीने के बच्चे के साथ खेलने भी चला जाता और उसके साथ खेलने की कोशिश करता. हर दस मिनट में वह छोटे बच्चे के पास जाता और अपने प्यार का इजहार करने की कोशिश करता. उस छोटे बच्चे के मां बाप इस तीन साल के बच्चे के साथ खेलने की कोशिश करते और अलग-अलग चीज़ों से उसका दिल बहलाने की कोशिश कर रहे थे ताकि वह दो मिनट वहां टिक सके. यही हाल कोच में बैठे अन्य यात्रियों का भी था, कभी कोई बिस्कुट दे कर उसे अपने पास बुलाने की कोशिश करता तो कभी कोई खिलौना देकर. पर उसका चंचल मन कहीं भी दो मिनट से ज्यादा नहीं ठहरता और वो दौड़ कर वापस अपनी मां के पास आ जाता. और अगर थोड़ी देर टिक भी जाता तो उसकी मां उसे खींच के वापस ले आती. जब भी उसे खींच के वापस लाया जाता वह इसका विरोध करता हुआ रोता. उसके इस व्यवहार पर मां-बाप उसे लगातार डांट रहे थे और हलकी सी चपत भी रसीद कर देते.

 

लगभग पंद्रह घंटे के सफ़र में कम से कम तीस बार हलकी सी चपत लगी होगी इस बच्चे को. हालाँकि सबकी सब चपत हथेली पर या कंधे पर लगाई गयी थी और इन चपतों में कहीं भी उसे हानि या दुःख पहुँचाने की मंशा दिखाई नहीं दी, बल्कि हर चपत में उसे यह बताने कि कोशिश की जा रही थी कि जो वो कर रहा है,  वह  उसको शायद चोट पहुंचा सकता है. इन चपतों के जरिये उसे अनुशासित करने की कोशिश की जा रही थी. उसे यह बताने की कोशिश हो रही थी कि क्या “गलत” है और क्या “सही”. पर इन चपतों की संख्या हैरान करने वाली थी. नीचे उतरने पर एक चपत, ऊपर जाने की जिद पर एक, दुसरे बच्चों के बिस्कुट  छीनने  पर एक , उनके साथ खेलने पर एक, दूसरे मुसाफिरों से बिस्कुट लेने पर एक, छोटे बच्चे के साथ खेलने पर एक, कुछ खाने की जिद पर एक और कुछ ना खाने पर एक. चपत लगाने का ये सिलसिला जो चर्च गेट से शुरू हुआ वो  लाल किले  तक चलता रहा. ना तो ये चपत बच्चे को वो सब करने से रोक सके, जिनसे मां उसे रोकना चाहती थी और ना ही उसे “अनुशासित”, “आज्ञाकारी” बना सके.

 

इस सफ़र के बाद कई दिन तक मैं सोचता रहा कि आखिर मां-बाप बच्चे के साथ इस तरह का व्यवहार कैसे कर सकते हैं  क्या उन्हें अपने बच्चे से प्यार नहीं? नहीं, ऐसा नहीं की उन्हें बच्चे से प्यार न था. सफ़र के दौरान कई बार उन्हें बच्चे को ऐसे ही प्यार करते और दुलारते देखा जैसे कोई भी मां-बाप करता है .जब  बच्चे को नींद लगी तो उन्होंने यहाँ तक ख्याल रखा कि उनके उठने-बैठने की हरकत से उसकी नींद न टूट जाए. उसके खाने पीने का हर सामन बेग में पैक करके लाये थे कि सफ़र में वो चीज़ मिले न मिले.

बच्चे पर रोक-टोक लगा कर शायद वह अपने बच्चे को किसी अनजान खतरे से बचाना चाहते थे जैसा कोई भी मां-बाप चाहेगा.  अनजान लोगों से अपने बच्चे का मेलजोल भी शायद इसलिए पसंद नहीं था और क्यों न हो आज कल बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर लगातार ये सन्देश प्रसारित किया जाता है कि “किसी अनजान व्यक्ति से  दोस्ती ना  करें”  या  “अनजान व्यक्ति की दी हुई कोई चीज़ न खाएं,  उसमें  नशीला पदार्थ हो सकता है” आदि आदि. अविश्वास के इस दौर मैं अभिवाभाक कैसे किसी “अनजान खतरे” को अपने लख्ते जिगर के पास फटकने देंगे.

चपत लगाने में  भी शायद उनकी मंशा यही थी कि कहीं वह भागने-दौड़ने में  चोट न खा बैठे. शायद वो चपत के जरिये उसे “ग़लत” और “सही” की पहचान भी कराना चाह रहे थे. शायद यह तरीका था बच्चे को अहसास करने का कि क्या “ठीक” है और क्या “गलत“ या शायद वो उसे “अनुशासित” करना चाह रहे थे. इसमें भी कोई नई बात नहीं क्योंकि हर मां-बाप यही चाहते हैं कि उनका बच्चा अनुशासित हो. लेकिन प्रश्न यह उठता है कि अनुशासित करने और “सही” “गलत” की पहचान करने का यह तरीका आखिर कहाँ तक ठीक है? मैं “सही” “गलत” की बहस मैं नहीं पडूंगा क्योंकि इसका कोई निश्चित पैमाना नहीं हो सकता, और जरूरी नहीं कि जो मुझे ठीक लगे वो  सही ही हो. पर इतना जरूर कहूँगा कि बच्चे को “क्या करना चाहिए” “क्या नहीं” समझाने की जद्दोजहद में कहीं हम उनकी खोज की प्रवृति और स्वाभाविक जिज्ञासा को ख़त्म न कर दें.  इस चर्चा में मैं अपनी बात बच्चों को अनुशासित करने के तरीकों तक रखूंगा.

इस वाकये में क्या अभिभावक बच्चे को अनुशासित करने में सफल रहे? क्या वो तीस चपत बच्चे को “सही” “गलत” की पहचान कराने में मददगार साबित हुए? शायद नहीं!  इतनी बार नीचे उतरने या ट्रेन में इधर-उधर घूमने पर चपत खाने के बावजूद बच्चे में ना तो दुबारा ऐसा करने की इच्छा कम हुई न जिज्ञासा.  मैं यह नहीं कह रहा कि बच्चे की जिज्ञासा शांत करने के लिए उसे आग में हाथ डालने दे की इजाज़त दे दी जाये या और किसी खतरे में डाल दें. अभिवाभाक होने के नाते उसे हर खतरे से बचाने की जिम्मेदारी हमारी है चाहे वो बच्चे की इच्छा के विरूद्ध ही क्यों न हो. एक निश्चित उम्र में बच्चे की खतरों को परखने की क्षमता सीमित होती है. ये क्षमता उम्र के अलग-अलग पड़ाव में अलग होती है और उसी हिसाब से उसे सुरक्षा देने की हमारी जिम्मेदारी भी. उदहारण के लिए, सड़क पार करते हुए चार साल के बच्चे का हाथ पकड़ना तो वाजिब है पर  किशोरावस्था में आप उसे यह नहीं कह सकते कि आप उसे हाथ पकड़ के स्कूल के गेट तक छोड़ कर आयेंगे और शायद यह व्यवहार उसके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को ठेस भी पहुंचाए. मुमकिन है उसके व्यक्तित्व विकास में बाधक भी बने. पर इस उम्र में उसे गाड़ी चलने से रोकना लाज़मी है चाहे वो गाड़ी चलाने में कितना भी निपुण हो और चाहे गाड़ी चलाने की कितनी भी जिद क्यों न करे.

इस बात में कोई दो राय नहीं की बच्चों को एक उम्र तक राह दिखाने की जरूरत होती है और अनुशासित करने की भी.बच्चों को डांट-डपट या मारपीट कर अनुशासित करने की परंपरा हमारी संस्कृति में सदियों से रही है. और हमारी संस्कृति में hi क्यों ये तरीका to लगभग हर संस्कृति का हिस्सा रहा है. मैक्सिम गोर्की ने इस प्रथा का व्याख्यान अपने नावेल “मां” में बखूबी किया है. पश्चिमी देशों में पिछले कुछ सालों में स्थिति बहुत सुधर गयी है पर हम यह नहीं कह सकते कि वो इस कुप्रथा से अछूते रहे हैं.

अब प्रश्न यह उठता है बच्चों के साथ अवांछित सख्ती किये बिना और उनकी स्वाभाविक जिज्ञासा और खोज की प्रवृति को कुचले बिना उन्हें अनुशासित कैसे किया जाए?

इस प्रश्न से दो-चार होने से पहले बच्चों से जुडी कुछ भ्रांतियोंको तोडनाजरूरी है. अक्सर कहा जाता है कि “बच्चा कच्ची मिटटी जैसा होता है और हम उसे किसी भी रूप में ढाल सकते हैं”. इससे कतई इंकार नहीं कि बच्चों के व्यक्तित्व विकास में वयस्कों के दिशानिर्देश की अहम् भूमिका रहती है पर कच्ची मिटटी की मान्यता में हम बच्चे के उन  व्यक्तिगत गुणों को नकार रहें है जो हर बच्चे में अलग है. हर उम्र में बच्चे की एक समझ, सोच. अनुभव और व्यक्तित्व होता है जिसके आधार पर वह आगे सीखता है और अपने व्यक्तित्व का विकास करता है. यह बात हम सभी के लिए सच है. उम्र के हर पड़ाव पर हमारी एक सोच-समझ और अनुभव होता है जिसके आधार पर हम आगे सीखते हैं. यह बात दीगर है कि जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं हमें लगता है कि हमें तो सब पता है और वैसे-वैसे हमारी सीखने की क्षमता कम होती जाती है.

इसी तरह यह भ्रान्ति भी गलत है कि बच्चा तो “कोरा कागज़ है और हम उस पर जो चाहे लिख सकते हैं”.बच्चे को “कोरा कागज़” मानना भी बच्चे की अपनी समझ और निजी व्यक्तित्व को नाकारना है.

हम बच्चों को कुछ बताते हुए यह भूल जाते हैं कि उनकी अपनी  समझ भी है और वह उस बात को उसी के आधार पर  समझते हैं  हमारी कोशिश रहती है की बच्चे मूक दर्शक की तरह हमारी बात सुनें, समझें , सीखें और रट्टू तोते की तरह उसका अनुसरण करें. सीखने की  इस प्रक्रिया में उनकी भागीदारी नदारद है. विशेषज्ञों का मानना है कि सक्रिय भागीदारी सीखने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है. हमारी कोशिश रहती है कि वह बेजान  मिटटी की तरह रहे और हम उसे जिस रूप में चाहें  ढाल सकें .

जब वह कोई बात नहीं समझता या उस रूप में ढलने को तैयार नहीं होता जैसा की हम चाहते हैं तो हमारा संयम टूटने लगता है और हम सख्ती बरत कर समझाने की कोशिश करते हैं. हमें यह समझ नहीं आता कि दिक्कत हमारे समझाने के तरीके में है न की उसकी समझ में. हम यह भी भूल जाते हैं कि “असफल” बच्चे नहीं होते, असफल  वयस्क या अध्यापक होते हैं. फिर भी हम हमेशा असफलता का ठीकरा बच्चों  पर फोड़ने की कोशिश करते हैं  और उसकी असफलता में अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझ पाते.

समाज और अभिवाभाक बच्चों को अपने भविष्य के रूप में देखते हैं. वह यह भूल जाते हैं कि उनके भविष्य से ज्यादा उनका वर्तमान अहम् है और भविष्य सुनहरा बनाने की जुगत में हम बच्चो का वर्तमान नष्ट नहीं कर सकते. “We can’t abuse their present for our future”. तीसरी भ्रान्ति यह है कि बच्चा “बिना छड़ी के नहीं सीखता”.

इस बात में यकीन करने वाले अध्यापको की संख्या हमारे देश में असंख्य है कि यह “जादू की छड़ी” बच्चे के आगे बढ़ने के लिए जरूरी है. हम सभी ने कभी न कभी इस “छड़ी” को भुगता है. पर उस छड़ी से हमने कितना “सीखा” यह कहना मुश्किल है. कुछ और सीखा हो या ना सीखा हो बच्चों पर “छड़ी’ आजमाना जरूर सीखा है. शायद इसीलिए छड़ी के सहारे बच्चों को सीखाने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. इस सन्दर्भ में ये लतीफा बहुत सटीक है – ‘एक बार एक बच्चे ने अपने पिता से पुछा ‘क्या आपके पिताजी आपको मारते थे?’. पिता बोले ‘हाँ’. फिर बच्चे ने पुछा कि ‘क्या आपके पिताजी के पिताजी आपके पिताजी को मारते थे’ तो पिताजी ने फिर कहा ‘हाँ’. बात आगे बढ़ाते हुए बच्चे ने फिर पूछा  ‘क्या उनके पिताजी भी उन्हें मारते थे?’. इस बार झल्ला के पिताजी ने कहा ‘हाँ भाई हाँ पर तू यह क्यों पूछ रहा है.’ बच्चे ने जवाब दिया बस मैं यह जानना चाहता हूँ कि यह खानदानी गुंडागर्दी कब ख़त्म होगी!’ यह बात सौ फीसदी सच है कि यह खानदानी गुंडागर्दी सदियों से चली आ रही है और इसे रोकना निहायत ही जरूरी है

मैं नॉर्वे या अन्य पाश्चात्य देशो की तरह उन कानूनों की वकालत नहीं करता जिसके तहत पछले दिनों भारतीय मूल के मां-बाप को लम्बी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. आरोप था कि मां-बाप अक्सर बच्चों को धमकाते थे कि अगर वह बिस्तर गीला करेंगे तो उन्हें वापस भारत भेज दिया जायेगा. इस आरोप में  माँ-बाप को अरसे तक जेल में दिन बिताने पड़े और दोनों बच्चों को को बालगृह में. मेरा मानना है कि किसी भी बच्चे के लिए सबसे माकूल जगह उसका अपना घर होता है न की बालगृह. जितना प्यार और सुरक्षा उसे अपने अभिवाभाको से मिल सकती है कहीं और से नहीं. लेकिन यह भी  जरूरी है कि बहुत से अभिवाभकों को लालन-पोषण और बच्चों के साथ उचित व्यवहार के लिए काउन्सलिंग की आवश्यकता है. पंद्रह घंटो में बच्चे को तीस चपत लगाना, बच्चे की जिज्ञासा को न समझना या अनुचित  सख्ती के साथ अनुशाशित करना बच्चों के साथ शारीरिक और मानसिक दुराचार है. इस तरह के व्यवहार को दुराचार (ABUSE ) के अलावा कुछ और नहीं कहा जा सकता और यह दुराचार हमारे समाज और संस्कृति का अभिन्न अंग है. यह एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज बच्चों के प्रति अपनी सोच दुरुस्त करने में छुपा है. जरूरत है इसे स्वीकारने की और इसका समाधान की कोशिश करने की. इस कोशिश मैं विशेषज्ञों से परामर्श बहुत कारगर हो सकता है और अगर काउन्सलिंग के बाद भी  अभिवाभाक इस तरह के व्यवहार करते रहते हैं तो इसके लिए कानूनी प्रावधान भी होना चाहिए.    

 एक बार फिर याद दिलाना चाहूँगा की बच्चे सिर्फ भविष्य नहीं वर्तमान भी हैं और  “We can’t abuse their present for our future”.

(लेखक डेवलेपमेंट प्रोफेश्नल के रूप में टेरे डेस होम्स, जर्मनी में कार्यरत हैं और पिछले कई सालों से बाल अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।)

 

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