ताकि जवाब और जवाबदेहियाँ तय हो सकें! – क़मर वहीद नक़वी |

 

 

 

 

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(लोकमत समाचार, 15 मार्च 2014)


खीर टेढ़ी है! पत्रकार ने इंटरव्यू किया. बवंडर मचा है कि इंटरव्यू ईमानदार था कि बेईमान? लोग तय नहीं कर पा रहे हैं! यू ट्यूब पर लाखों लोग उस क्लिप को देख चुके हैं. पर आँखों देखा सच वही, जो देखनेवाले की आँख देखे या देखना चाहे! कुछ को दिखा कि यह इंटरव्यू फ़िक्स था, पहले से तय कर लिया गया था कि क्या सवाल पूछने हैं. कुछ को दिखा कि यह तो आम बातचीत है जो इंटरव्यू देनेवाले और एंकर के बीच आमतौर पर होती है. इसमें ग़लत क्या है? लाखों लोग मिल कर अब तक इस छोटे से सवाल को हल नहीं कर पाये!

इसीलिए कहा कि खीर टेढ़ी है. अब एक सवाल! अगर यही इंटरव्यू आज केजरीवाल के बजाय राजनाथ सिंह, ममता बनर्जी, दिग्विजय सिंह, नवीन पटनायक, नीतिश कुमार, मुलायम सिंह यादव या अन्ना हज़ारे का होता और उसका ऐसा ही कोई क्लिप प्रकट हो गया होता, तो क्या तब भी उस पर ऐसा ही तूफ़ान उठता? ईमानदारी से जवाब देंगे तो जवाब सिर्फ़ एक शब्द का होगा– नहीं!
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यह इंटरव्यू केजरीवाल का न होता, तो ऐसा बावेला क़तई न मचा होता! बावेला क्या, ऐसी कोई क्लिप तब किसी ने लीक करने तक की ज़हमत भी शायद न उठायी होती. न क्लिप होती, न किचकिच मचती. और मान लिया जाता कि इंटरव्यू देने और लेनेवाले के बीच ऐसी बातचीत तो होती ही रहती है! लेकिन यहाँ मामला केजरीवाल का था. इसलिए बहुत लोगों की आँखों में चुभ गया या चुभाया गया! केजरीवाल बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, बहुत बड़ी-बड़ी बातें! लेकिन छोटी-छोटी बातों में बार-बार फँस जाते हैं! इस इंटरव्यू की क्लिप में भी फँस गये वह कि वोटों की राजनीति के लिए वह भी वैसे ही झूठे मुखौटे पहनते हैं, जैसे कि दूसरे सब! बेईमानी तो हुई न! सड़क तो आपने भी वही वाली पकड़ी केजरीवाल जी, जिस पर बाक़ी लोग अब तक कहीं आगे निकल कर गुरुघंटाल हो चुके हैं!

ज़ाहिर है कि इस क्लिप को जिन चैनलों ने दिखाया और जिन अख़बारों ने छापा, वे ‘आप’ को क्यों सुहायेंगे? मुखौटा उतरना भला किसे अच्छा लगता है? इसी बीच केजरी बाबू की एक और क्लिप आ गयी. उनके चन्दा भोज में एक अंडरकवर संवाददाता पहुँच गया.उसने केजरी बाबू को फिर कैमरे में क़ैद कर लिया यह बोलते हुए कि ‘पूरा मीडिया मोदी के हाथ बिका हुआ है और अगर हमारी सरकार बनी तो हम इन मीडियावालों को जेल भिजवाएँगे.’ जब मीडिया अभी तीन महीने पहले तक केजरी बाबू के तराने गा रहा था, तब उसे कौन पैसा दे रहा था? और जब 2011 में अन्ना के आन्दोलन में मीडिया झूम-धूम रहा था, तब भी उसे किसने और कितने में ख़रीदा था, केजरीवाल जी को इसका हिसाब देना ही चाहिए! केजरीवाल जी ही तब आन्दोलन के सबसे बड़े कर्ता-धर्ता थे और ख़ज़ांची भी! तो मीडिया को पैसे तो वही देते होंगे न!

केजरीवाल के मुखौटों की कहानियों को छोड़िए, इंटरव्यू पर लौटिए. वह मुद्दा केजरीवाल की राजनीति से कहीं बड़ा है. सवाल है कि उस इंटरव्यू के इतर एंकर और केजरीवाल के बीच हुई जो बातचीत लीक हुई, क्या वह सामान्य बातचीत मानी जा सकती है? क्या एंकर का इरादा केजरीवाल को माइलेज देने का नहीं था? क्या एंकर की यह बातचीत भीतर छिपी पहले की किसी अंतरंगता का नतीजा तो नहीं? खीर यहीं पर टेढ़ी है. जवाब सुविधानुसार दोनों हो सकते हैं, हाँ भी और नहीं भी. कम से कम मैंने तो यह महसूस नहीं किया कि जो कुछ हुआ, वह एंकर और इंटरव्यू देनेवाले के बीच होनेवाली आम बातचीत थी, जो अकसर हुआ करती है और उससे इंटरव्यू के चरित्र पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. लीक हुई बातचीत साफ़-साफ़ बताती है कि एंकर कहाँ पर नरम है!

मु्द्दा बड़ा है. ख़ास तौर पर तब, जब पत्रकारिता की गली राजनीति की सड़क पर खुलने लगी हो! और यह कोई आज की बात नहीं. बरसों से ऐसा होता रहा है. लगातार होता रहा है. राजनीति कवर करते-करते पत्रकार ख़ुद राजनीति की टोपी पहनते रहे हैं. सुविधानुसार टोपियाँ बदलते भी रहे हैं. कुछ टोपी उतार कर फिर पत्रकार बने, फिर मौक़ा मिला, तो फिर पुरानी टोपी पहन ली या कोई और नयी टोपी जुगाड़ ली. बहुतेरे एक साथ दो-दो टोपियाँ भी रखते हैं. राजनेता भी हैं, पत्रकार भी. यह यात्रा लम्बी है. टोपी कोई रातोंरात नहीं मिलती! बरसों तक इस या उस पार्टी की सेवा में लगना पड़ता है! सेवाभावी पत्रकारों में अब तो एक नयी नस्ल भी आ गयी है! जो पार्टी नहीं, किसी एक नेता की क़लम ढोती है. एक नस्ल और है. जो कभी पर्दे के पीछे तो कभी खुलेआम राजनीति के समीकरण बनवाती-बिगड़वाती रही है, इसकी गोटी उससे मिलवाती रहती है!

लेकिन समस्या यह है कि यह सब अगर ग़लत है तो रुके कैसे, रोके कौन, टोके कौन? चौकीदार कहाँ है? मीडिया जितना बड़ा हो गया है, जितना फैल गया है, जितनी बड़ी पूँजी से चलता है, जितने बड़े बाज़ार में बिकता है, जितनी तरह के और जितने इरादों के लोग आज मीडिया को चला रहे हैं, उसमें कौन-सी व्यवस्था है हमारे पास जो पत्रकारों को फिसलने से, प्यादे बनने से रोक सकती है? पिछले तीस-चालीस बरसों से या शायद उससे भी ज़्यादा पहले से, जैसे-जैसे लाज का घूँघट धीरे-धीरे सरकता गया, जैसे-जैसे पत्रकारिता की नयी परम्पराएँ लिखी जाती रहीं, और जैसे-जैसे बहानों से उन्हें ढाका-तोपा जाता रहा, उसकी विरासत तो यही होनी थी.

आज बहस इस पर होनी चाहिए कि एक स्वतंत्र, व्यापक, मज़बूत, ग़ैर-सरकारी लेकिन क़ानूनी नियामक संस्था मीडिया के लिए क्यों न हो? ताकि सारे सवालों के जवाब और जवाबदेहियाँ तय हो सकें कि मीडिया का कारोबार कैसे हो, बाज़ार और मीडिया के रिश्ते कैसे परिभाषित हों, आचरण, कंटेंट और सरोकारों की कसौटियाँ क्या हों, इत्यादि, इत्यादि. राजनेता मीडिया पर तभी हमला करते हैं, जब मीडिया भीतर से नरम होने लगे.
(लोकमत समाचार, 15 मार्च 2014)

 

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