ओपिनियन बता नहीं बना रहा है मीडिया: अभिषेक पाराशर

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भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की ‘लहर’ इन दिनों मीडिया में सबसे बड़ा मुद्दा है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक टीवी चैनलों में जहां पर प्राइम टाइम के दौरान होने वाली बहस में तथाकथित सर्वेक्षणों के आधार पर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि देश में मोदी की लहर है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि जनमत निर्माण में टीवी चैनलों की भूमिका और जनता के रुझान को उसी अंदाज में प्रस्तुत करने में बड़ा अंतर है। मीडिया का यह पूर्वाग्रह गाहे बगाहे विमर्श का मुद्दा भी होता है कि चैनल आखिरकार किस तरह से एक खास छवि का अनुसरण करते हुए उसे और मजबूत बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं। इसलिए अगर चैनल कह रहे हैं कि मोदी की लहर है तो यह पड़ताल करना जरूरी है कि उनके इस दावे का आधार क्या है या फिर इससे उनके निहित स्वार्थ को पूरा करने में कैसे मदद मिल सकती है,  आदि आदि. टीवी चैनल एक विशुद्घ तौर पर जोखिम से परिपूर्ण कारोबार है, वैसा कारोबार जिसमें कड़ी प्रतिस्पर्धा है और बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। इसलिए किसी अन्य कारोबारी की तरह की चैनल और उसके मालिक उसी लाइन पर चलते हैं जिससे उन्हें इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में न केवल टिके रहने में मदद मिले बल्कि सबसे आगे भी बने रहे। कारोबार का मुख्य सिद्घांत मुनाफा होता है और यही उसके लिए इंसेंटिव भी है तो इसी आधार पर समाचार का चयन और उसे प्रस्तुत करने का नजरिया भी तय होता है। यह एक आम कारोबारी सिद्घांत है जिसे हर कोई जानता है, बस इसे समाचार चैनलों के साथ भी जोड़कर देखा जाने लगे तो चैनल प्रायोजित लहर की सच्चाई की कुछ परतों को आसानी से उधेड़ा जा सकता है।

मोदी लगातार आर्थिक विकास की बात करते हैं और उसके लिए धड़ल्ले से गुजरात मॉडल का जिक्र करते हैं। गुजरात मॉडल मोदी की पूंजी है और वह पूरे देश को गुजरात की तर्ज पर ही विकसित करेंगे। उन्होंने अलग से कोई विचार नहीं प्रस्तुत किया है जिसके आधार पर यह कहा जा सके उनके पास गुजरात से इतर भी कुछ है जो कि समग्र तौर पर देश के लिए हो सकता है। दरअसल मोदी जिस आर्थिक तरक्की की बात करते हैं वह अपने आप में पूरी तरह से यूपीए सरकार की आर्थिक लाइन का दोहराव है, बल्कि कहीं अधिक प्रचंड तरीके से। मोदी यूपीए 2 सरकार की आर्थिक नीतियों को क्रूर और निर्मम तरीके से आगे बढ़ाएंगे जिसे कांग्रेस की सरकार गठबंधन की मजबूरियों और अन्य राजनीतिक कारणों से आगे नहीं बढ़ा पाई। मोदी इसी का फायदा उठा रहे हैं और अपने आप को सीधे सीधे उद्योगपतियों और कारोबारियों से जोड़ रहे हैं। जाहिर तौर पर यही उद्योगपति और कारोबारी मीडिया को विज्ञापन देने का काम करते हैं तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर मीडिया को कैसे और कब मोदी के पक्ष में किस तरह से बोलना है, इसकी पटकथा लिखी जा चुकी है। पटकथा की विश्वसनीयता बनी रहे इसलिए समय समय पर क्रेडिट एजेंसियों द्वारा दी जाने वाली रेटिंग और सर्वेक्षण सामने आते रहते हैं जिसमें मोदी प्रभाव की बात की जाती है।

हालांकि गुजरात के विकास को लेकर मोदी के दावे पर कई सवाल खड़े हैं। जिसका जवाब मोदी नहीं देते है। मोदी के शासनकाल के दौरान  2001 से गुजरात के शिक्षा के क्षेत्र में रैंकिंग 16 से गिरकर 18 (2011) तक पहुंच गई। 2001 में गुजरात में प्रति व्यक्ति आय राज्यों के बीच चौथे स्थान पर थी जो कि अब घटकर छठे पायदान पर आ चुका है। गुजरात साक्षरता, स्कूल छोडऩे की दर, उम्र और शिशु मृत्यु दर जैसे प्रमुख विकास सूचकांकों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल से पीछे है जबकि कुपोषण के मोर्चे पर राज्य की स्थिति बीमारू राज्यों (विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश से) से भी बदतर है। ये कुछ सवाल है जिस पर न तो मोदी बात कर रहे हैं और न ही मीडिया में यह बहम विमर्श का मुद्दा है। इतने सारे तथ्यों को जानबूझकर अंदाज किया जाना यह साबित करने के लिए काफी है कि कुछ तो सही नहीं है मीडिया के भीतर। खासकर यह बात तब और प्रासंगिक हो जाती है जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार का हर दिन का लेखा जोखा मीडिया ले रही थी।

राजनीतिक मोर्चे पर इस दावे की पड़ताल करना आवश्यक हो जाता है। हिंदी क्षेत्र के राज्यों में मोदी की लहर का जिक्र है और खुद मोदी भी मिशन 272 पर काम कर रहे हैं। चुनाव पूर्व गठबंधन के लिहाज से भी मोदी की हवा में कोई दम नहीं दिखता और रही बात चुनाव बाद होने वाले गठबंधन की तो वह तभी संभव है जब चुनाव पूर्व स्थिति मजबूत हो। बिहार जैसे राज्य में भाजपा 30 सीटों पर लडऩे जा रही है और उसने तीन सीटें उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को जबकि 7 सीटें लोकजनशक्ति पार्टी को दी है। उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान से गठबंधन के प्रतीकात्मक मायने ज्यादा है। लेकिन नीतिश कुमार पहले से ही कुर्मी जाति के कद्दावर नेता है और पासवान जाति के मतों पर अब पूरी तरह से रामविलास पासवान का कब्जा नहीं रहा। नीतिश कुमार महादलित के तौर पर पहले से ही इस वोट बैंक में जबरदस्त सेंध लगा चुके हैं और उनकी यह कोशिश पूरी तरह से सफल भी रही है। बिहार में वैसे भी वोटिंग का एकाश्म पैटर्न पहले ही टूट चुका है।

दूसरी तरफ महाराष्ट्र में भाजपा एक ग्रैंड अलाएंस के साथ मैदान में है जहां अठावले की पार्टी भी इस गठबंधन में शामिल है। पासवान, उदित राज और अठावले के साथ आने से भाजपा को कितना राजनीतिक फायदा होगा यह भारी संदेह के दायरे में आता है। दरअसल यह पूरी कवायद राजनीतिक अस्पृश्यता को दूर करने की है जिससे भाजपा को अब तक भारी नुकसान होता रहा है। पासवान-अठावले-उदित राज का साथ भाजपा के लिए महज फेस सेविंग की कवायद है। वैसे सबकी नजर इस समीकरण के राजनीतिक गोलबंदी में रुपांतरित होने पर रहेगी। महाराष्ट्र में शिव सेना के मराठा वोट बैंक पर मनसे बड़ा सेंध लगा चुकी है और मराठा वोट पर शिव सेना के एकाधिकार को चोट पहुंची है जिसका नुकसान महाराष्ट्र में भगवा गठबंधन को ही होगा। यानी भाजपा वहीं मजबूत है या अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है जहां पर वह पहले से है। फिलहाल एनडीए में सीटों के आधार पर सबसे बड़ा दल शिवसेना और फिर अकाली दल हैं जबकि चुनाव बाद जिन दलों की सरकार के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी उसमें से सपा और बसपा को छोड़कर कोई भी दल फिलहाल किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं है। मीडिया जिस लहर की बात कर रहा है उसमें कुछ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय राजनीतिक दलों और निर्णायक वोट बैंक की जानबूझकर उपेक्षा की जा रही है। सर्वेक्षण ओपिनियन नहीं बता रहे हैं बल्कि ओपीनियन बना रहे हैं।

युवा पत्रकार अभिषेक पाराशर बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम करते हैं। बिहार, यूपी की राजनीति समेत बीजेपी पर खासतौर से नज़र रखते हैं।

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