पैसे का लोकतंत्र और पैसे की ख़बरें: भूपेन सिंह

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केंद्र की यूपीए सरकार पेड न्यूज़ छापने वाले मीडिया संस्थानों के ख़िलाफ़ कोई कदम उठाने के मामले में तो पहले ही हाथ खड़े कर चुकी है, अब वह चुनावों के दौरान पैसा देकर ख़बर छपवाने वाले नेताओं को बचाने के लिए भी खुलकर सामने आ गई है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पेश एक हलफनामे में कहा है कि चुनाव आयोग को किसी जन प्रतिनिधि को उसके चुनावी ख़र्चे के आधार पर अयोग्य घोषित करने का अधिकार नहीं है. वह चुनाव के दौरान ख़र्च के फ़र्जी कागजात पेश करने को भी इतना संगीन नहीं मानती कि इस आधार पर किसी नेता का पद छीन लिया जाए. सरकार ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेसी नेता अशोक चह्वाण के केस में एक ऐसा ही हलफ़नामा सुप्रीम कोर्ट को दिया है. अशोक चह्वाण 2009 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान पेड न्यूज़ मामले में बुरी तरह फंसे हैं. बचाव का कोई रास्ता न देख उन्होंने किसी जनप्रतिनिधि की सदस्यता को ख़ारिज करने संबंधी चुनाव आयोग के अधिकार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. सरकारी हलफनामे से ज़ाहिर होता है कि वह चह्वाण को बचाने के लिए अब तक प्रचलित न्यूनतम संवैधानिक व्यवस्था को भी पलटने की पूरी तैयारी में है. सरकार का कहना है कि चुनाव आयोग तभी किसी उम्मीदवार को अयोग्य घोषित कर सकता  है जब वह अपने चुनाव ख़र्च के कागजात दिखाने में नाकाम हो, उन कागजात के सही या ग़लत होने पर आयोग कुछ नहीं कर सकता.

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से इस मामले में कोई फैसला नहीं आया है लेकिन सरकार की तरफ़ से ऐसा हलफ़नामा देना इस बात की पोल खोल देता है कि वह पेड न्यूज़ मामले में कितनी गंभीर है. पेड न्यूज़ मामले में चुनाव आयोग उत्तर प्रदेश के बिसौली की विधायक उमलेश यादव को चुनाव ख़र्च के फ़र्जी दस्तावेज़ दिखाने और पेड न्यूज़ छापने के मामले में दोषी करार देकर तीन साल के लिए उनकी सदस्यता निरस्त कर चुका है. उनके अलावा झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौड़ा, मध्य प्रदेश में बीजेपी के मंत्री नरोत्तम मिश्रा और अशोक चह्वाण को भी आयोग की तरफ़ से पेड न्यूज़ के मामले में नोटिस दिया गया है और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है. उमलेश यादव वाले मामले ने बाक़ी के आरोपी नेताओं को भी डरा रखा है इसलिए सत्ताधारी पार्टी ने अपने नेता अशोक चह्वाण को बचाने के लिए कमर कस ली है. अशोक चह्वाण पर पेड न्यूज़ के अलावा भी भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज हैं. मुंबई के कुख्यात आदर्श सोसायटी घोटाले में भी उनका नाम शामिल है, जिस वजह से 2010 में उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी थी. आदर्श सोसायटी को युद्ध में मारे गए सैनिकों की पत्नियों के लिए बनाया गया था लेकिन कई नेताओं और नौकरशाहों ने उन फ्लैट की आपस में ही बंदरबांट कर ली थी. अशोक चह्वाण ने भी अपने तीन रिश्तेदारों को उस बिल्डिंग में फ्लैट दिलवाए थे. इस मामले में पुख़्ता सबूत होने की वजह से आख़िरकार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाना पड़ा था. वैसे अशोक चह्वाण कांग्रेस के दुलारे हैं, तमाम आरोपों के बावजूद अब भी वे पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं. कांग्रेस की नेतागिरी से उनका पुराना नाता है, उनके पिता शंकरराव चह्वाण भी कभी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. इस लिहाज़ से देखा जाए तो परिवारवाद से घिरी कांग्रेस में इस खानदान की जडें काफ़ी गहरी हैं.
अशोक चह्वाण दो हज़ार आठ में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे. 13 अक्टूबर 2009 को हुआ महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव उन्हीं की अगुवाई में लड़ा गया. तब, चह्वाण महाऱाष्ट्र के नांदेड़ ज़िले की भोखर सीट से चुनाव जीते थे. उन्होंने अपने चुनाव अभियान में सिर्फ़ सात लाख रुपए का ख़र्च दिखाया. रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ पीपल एक्ट, 1951 की धारा 77 के अनुसार एक प्रत्याशी प्रचार के दौरान दस लाख रुपए तक ख़र्च कर सकता है. चह्वाण ने चुनावों के दौरान पानी की तरह पैसा बहाया लेकिन चुनावा आयोग के सामने ख़र्च के फ़र्जी दस्तावेज़ पेश किए. द हिंदू के मशहूर पत्रकार पी साइनाथ ने अशोक चह्वाण के झूठ की पोल खोलते हुए उन्हें चुनाव अभियान के लिए निर्धारित राशि से कई गुना ज़्यादा पैसा ख़र्च करने और अवैध पेड न्यूज़ छपवाने का ज़िम्मेदार ठहराया. दरअसल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान वहां के प्रमुख अख़बारों ने प्रत्याशियों की ख़बर छापने के लिए अपने रेट तय कर लिए थे. जो प्रत्याशी पैसा चुका रहा था उसी  की ख़बरें छापी जा रही था बाक़ी की ख़बरों को अख़बार कोई अहमियत नहीं दे रहे थे. उस दौरान सबसे बड़ी हलचल अशोक चह्वाण की एक ख़बर ने पैदा की थी. जिसके बाद पेड न्यूज़ के बारे में कोई शक बाक़ी नहीं रह गया. चह्वाण की महानता के बारे में महाराष्ट्र के तीन बड़े अख़बारों-महाराष्ट्र टाइम्स (टाइम्स ग्रुप), लोकमत और पुढारी में एक ख़बर छपी. युवा गतिमान नेतृत्व नाम से छपी इस ख़बर की सभी पंक्तियां शब्दश: एक जैसी थी. पुढारी में यह ख़बर सात अक्टुबर 2009 को छपी तो बाक़ी दो अख़बारों में 10 तारीख़ को. बाद में प्रेस परिषद की सब कमेटी की पेड न्यूज़ पर तैयार रिपोर्ट में परंजॉय गुहा ठकुरता और के श्रीनिवास रेड्डी की रिपोर्ट ने इसे सीधे-सीधे पेड न्यूज़ का मामला करार दिया. यह तो पेड न्यूज़ का एक छोटा सा उदाहरण था वरना ऐसी ख़बरों की उस दौरान महाराष्ट्र के अख़बारों में भरमार थी. पेड न्यूज़ के इस मामले ने भारतीय समाचार माध्यमों की निष्पक्षता और पत्रकारीय उसूलों पर कई सवाल उठाए. मुनाफ़े की होड़ में जुटे मीडिया घरानों की असलियत भी इस घटना से सामने आई.
पेड़ न्यूज़ के मामले में अख़बारों और पैसे वाले प्रत्याशियों का गठजोड़ नज़र आने के बाद, पी साइनाथ ने अशोक चह्वाण के चुनाव अभियान पर कड़ी नज़र रखी और पाया कि उन्होंने पेड न्यूज़ के अलावा भी चुनाव के दौरान बेहिसाब पैसा ख़र्च किया. साईसाथ ने 29 नवंबर 2009 को अपने अख़बार में इज द ईरा ऑफ़ अशोक अ न्यू ईरा  ऑफ़ न्यूज (क्या अशोक चह्वाण का दौर ख़बरों का नया दौर  है?) शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया कि चह्वाण ने चुनाव आयोग को दिए अपने हिसाब में समाचार पत्रों में अपने विज्ञापन का ख़र्च सिर्फ़ पांच हज़ार तीन सौ उन्यासी रुपए दिखाया. लेकिन द हिंदू ने सैंतालीस पेज के रंगीन विज्ञापन इकट्ठा किए जिसमें अशोक चह्वाण के विज्ञापन छपे थे. यह सभी विज्ञापन महाराष्ट्र में सर्वाधिक प्रसार वाले दैनिकों में छपे थे. हिसाब लगाया जाए तो इनका ख़र्च ही करोड़ों रुपए में आएगा. इसके अलावा, चुनाव के दौरान फिल्मी दुनिया के फर्जी नायकों को वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करने का चलन भी अब काफ़ी बढ़ चुका है. कई नायकों ने तो इसे धंधा बना लिया है और वे सीजन में करोड़ों रुपया वसूलते हैं. अशोक चह्वाण भी अपने प्रचार में ऐसे नायकों का इस्तेमाल करने से नहीं चूके. उन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र में मुंबइया फिल्मों के सलमान ख़ान जैसे सितारों को प्रचार में उतारा. यह बात जग ज़ाहिर है कि इस तरह के किसी सेलिब्रिटी का शो आयोजित करने में लाखों-करोड़ों रुपए का ख़र्च आता है. लेकिन अशोक चह्वाण इस बात से साफ़ मुकर जाते हैं. पी साइनाथ ने 10 नवंबर दो हज़ार दस को द हिंदू में लो कॉस्ट, हाई सेलिब्रिटी (कम क़ीमत में मंहगे सितारे) नाम से एक और लेख लिखा. जिसमें अशोक चह्वाण के चुनावी ख़र्च पर कई सवाल उठाए गए. चह्वाण ने पूरे चुनाव के दौरान जो सात लाख रुपए का कुल ख़र्च दिखाया था, उसमें बाक़ी ख़र्चों के अलावा सलमान ख़ान की दो रैलियां भी शामिल थीं. पहली रैली का ख़र्चा सिर्फ़ चार हज़ार चार सौ चालीस और दूसरी का चार हज़ार तीन सौ रुपया दिखाया गया. दोनों रैलियों में से प्रत्येक में डेढ़ हज़ार रुपया लाउड स्पीकर में ख़र्च दिखाया गया और रैली की जगह का किराया सिर्फ़ पांच सौ रुपया. पंडाल की कीमत दो सौ रुपया और मंच पर लगे सोफ़ा के लिए भी दो सौ रुपए का ख़र्च दिखाया गया. इस सफ़ेद झूठ पर चह्वाण अब तक क़ायम हैं. माना की सलमान, चह्वाण से अपने संबंधों की वजह से उनके प्रचार में आए लेकिन क्या मुंबई से चह्वाण के चुनाव क्षेत्र तक भी वह अपने ही ख़र्च पर आए थे? क्या उनके रहने खाने-पीने में भी कोई ख़र्च नहीं हुआ?  सबसे बड़ी बात कि एक मशहूर मुंबइया अभिनेता की एक रैली में सिर्फ़ चार-पांच हज़ार रुपए ख़र्च!  सितारे की रैली के लिए प्रचार में क्या कोई पैसा ख़र्च नहीं हुआ? ख़ैर, इस तरह के अनगिनत सवाल हो सकते हैं. जिसका जवाब कोई भी सामान्य बुद्धि वाला आदमी भी दे सकता है लेकिन लोकतंत्र की रक्षक सरकारों को यह नज़र नहीं आता है.
उपरोक्त बातों से पता चलता है कि देश में संसद और विधानसभाओं में पहुंचने के लिए कितना पैसा ख़र्च होता है. इससे हमारे लोकतंत्र के फरेब की भी एक झलक मिलती है. कहने भर के लिए यहां देश का कोई भी नागरिक चुनाव लड़ सकता है और विधायक, सांसद, मंत्री राष्ट्रपति कुछ भी बन सकता है. लेकिन हक़ीकत देखी जाए तो साफ़ हो जाता है भारत में मुख्यधारा की संसदीय राजनीति सिर्फ़ पैसे वालों के लिए आरक्षित है. एक सरकारी रिपोर्ट (अर्जुनसेन गुप्ता कमेटी) के मुताबिक़ जिस देश के क़रीब पिचहत्तर फ़ीसदी लोग प्रति दिन बीस रुपए से भी कम कमा रहे हों, क्या वे भी कभी चुनाव लड़ने के बारे में  सोच सकते हैं? क्या उनके भी कोई लोकतांत्रिक अधिकार हैं? कुल मिलाकर चुनाव की प्रक्रिया ही ऐसी है कि जिसमें ग़रीब लोगों के लिए कोई ज़गह नहीं है. जो भी व्यक्ति चुनाव लड़ना चाहता है उसे एक निश्चित धनराशि के जमानत के नाम पर चुनाव अधिकारी के पास जमा करानी होती है. विधानसभाओं के लिए यह राशि दस हज़ार रुपए है और संसद के लिए पच्चीस हज़ार. क्या पिचहत्तर फ़ीसदी देश की ग़रीब आबादी चुनाव में इतना पैसा चुनाव लड़ने पर ख़र्च करना बर्दाश्त कर सकती है?  माना वह किसी तरह यह रक़म इकट्ठा कर भी ले, तो क्या अरबों-ख़बरों और अवैध धन वालों के सामने ग़रीब लोग चुनाव जीत सकते हैं? इन अर्थों में देखा जाए तो यह चुनावी खेल सिर्फ़ पैसे वालों का है और संसदीय मुख्यधारा की सभी पार्टियां इस झूठे खेल में गले-गले तक डूबी हैं. उनकी पार्टी के पास अरबों-खरबों रुपया कहां से आता है, इसका हिसाब देने के लिए वे तैयार नहीं. इतना बड़ा गोलमाल कर अगर कोई पार्टी नैतिकता, ईमानदारी या देशभक्ति की बात करे तो इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है? ऐसे में अगर धन-पिपाशु और आपराधिक मुकदमों में फंसे लोग अवैध धन के बल पर विधानसभाओं और संसद में पहुंचते हैं तो वे बहुसंख्यक ग़रीब जनता के हित में खाक नीतियां बनाएंगे!
वैसे तो चुनाव आयोग की प्रक्रिया ही अपने आप में ग़रीबों को हाशिये पर ढकेलने वाली है. लेकिन इसने जितनी भी स्वतंत्रता और अधिकार हासिल किए थे उसे भी अब नए दौर का निजाम बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है. जहां-जहां उसे लगता है कि पैसे वाले प्रभावशाली लोगों के अधिकारों पर चोट हो रही है वह पूरी बेशर्मी से ग़लत को सही ठहराने में जुट जाता है. चुनाव आयोग और प्रेस परिषद जैसी संस्थाओं की सीमाएं यहां  अपने-आप साबित हो जाती हैं. चुनाव आयोग कुछ कहता रहे, प्रेस परिषद अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू कितना ही निष्पक्ष दिखने की कोशिश करें, लोकसभा-राज्यसभा में पेड न्यूज पर चर्चा हो जाए, होगा वही जो पूंजी के गुलाम नेता चाहेंगे. पेड न्यूज़ पर बहस के दौरान कई बार कुछ बुद्धिजीवी मित्र इस तरह बात करते हैं, जैसे मीडिया राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को ब्लैकमेल कर रहा है. जबकि बात इतनी सरल और आसान नहीं है. सरकार ने निजी कंपनियों के मीडिया यानी मुनाफ़ाखोरों को इतनी छूट दी है कि उनके सारे हित पूंजीवादी आर्थिक नीतियों को सही साबित करने में ही जुड़े हैं. इऩ अर्थो में देखा जाए तो पैसे वाली पार्टियों और पैसे वाले मीडिया के हित एक हैं. पेड न्यूज़ के लिए निजी मीडिया मालिक और निजीकरण की वकालत करने वाली पार्टियां समान रूप से ज़िम्मेदार हैं और दोनों इसका इस्तेमाल कर फायदे में रहते हैं. सार्वजनिक तौर पर मुनाफ़ाखोर मीडिया और कांग्रेस-बीजेपी जैसी पार्टियों से जुड़े लोग पेड न्यूज़ की कितनी ही आलोचना क्यों न करें, इस विकृति से तब तक बचना मुश्किल है जब तक मीडिया मालिकों को प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर मुनाफ़ा कमाने की स्वतंत्रता मिलती रहेगी और पैसे वाले लोग लोकतंत्र के नाम पर विधानसभाओं और संसद में पहुंचते रहेंगे. अशोक चह्वाण वाले मामले में सरकार की बेशर्मी को भी इन्हीं संदर्भों में समझना ज़रूरी है।
(भूपेन सिंह। युवा पत्रकार और प्राध्‍यापक। वाम आंदोलनों से जुड़ाव। सहारा समय, स्‍टार न्‍यूज और जी न्‍यूज में लंबे समय तक नौकरी करने के बाद इन दिनों पूर्णकालिक रूप से अध्‍यापन कार्य से जुड़े हैं।
कई अखबारों में नियमित रूप से लिखते हैं। सिनेमा में खासी दिलचस्‍पी है।

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