दंगा पीड़ितों को ऊन का नहीं, इंसाफ का कंबल चाहिए! – डॉ. पंकज श्रीवास्तव (Dr Pankaj Srivastava)

pankaj srivastava

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दूसरी बार मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों से मिले और उनसे घर वापस जाने का आग्रह किया। ऐसा आग्रह अखिलेश सरकार भी कर रही है। लेकिन दंगा पीड़ित सुनने को तैयार ही नहीं हैं। वे बरसाती पन्नियों को छत बनाकर जानलेवा शीत का मुकाबला कर रहे हैं। यूं इमदाद देने वालों की भीड़ लगी है। एफएम रेडियो वाले भी अभियान चला रहे हैं। कंबल और कपड़े दान करने का आग्रह आमिर खान और अभिषेक बच्चन जैसे फिल्मी सितारे भी कर रहे हैं। हर तरफ मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों को लेकर उदारता की एक लहर है, लेकिन दंगा पीड़ितों का दिल पसीज ही नहीं रहा है। उन्हें दर्जनों बच्चों की मौत मंज़ूर, बीमार होने का खतरा मंज़ूर, लेकिन उस दहलीज़ पर वापस जाना मंज़ूर नहीं, जहां से उनके पुरखों की पहचान जुड़ी है।
तो क्या वे बेवकूफ हैं? मुझे ये कहने की इजाजत दीजिए कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। उलटे वे हमारी ‘मूर्खता की हद’ को नापना चाहते हैं। वे देखना चाहते हैं कि जहां ‘इंसाफ के कंबल’ की जरूरत है, वहां ‘ऊन के कंबल’ देने का नाटक कब तक किया जा सकता है? हत्यारे और बलात्कारी उनकी आंखों के सामने आजाद घूम रहे हैं। उनकी जमीनों और घरों पर कब्जा करने का इंतजाम लगभग पक्का हो चुका है, पर उन्हें कंबलों से बहलाया जा रहा है। लखनऊ में एक सरकार है, जो मुआवजे में लाखों रुपये देने को तो तैयार है, लेकिन अपराधियों को पकड़कर जेल में डालने पर उसका जोर नहीं है। उधर, प्रशासन की पहल पर सुलह के लिए हो रही पंचायतों का असल खेल ये है कि हत्या और बलात्कार के मुकदमे वापस लिए जाएं। ये घर लौटने की शर्त नहीं, खुदकुशी की चिट्ठी पर दस्तखत करने जैसा है। इस तमाम उठापटक के बीच एक जहरबुझी विचारधाऱा अपना काम कर रही है। इसका नमूना एक टीवी चैनल पर दिखा तो दिल कांप गया था। घर वापसी की मुश्किल पर बनी इस ‘स्टोरी’ में गांव का एक चौधरीनुमा बंदा मुसलमानों के गांव छोड़ने पर कह रहा था-‘अच्छा हुआ जो गंदगी साफ हो गई।’
बहुत करीब से देखा है, दंगा पीड़ितों का दुख-दर्द। बलात्कार और सामूहिक हत्याकांड की लोमहर्षक कहानियां ऐसी हैं, जो न अखबार के पन्नों में जगह पा सकीं और न न्यूज चैनलों के कैमरे उन्हें दर्ज कर सके। कहा गया कि ‘ऐसी खौफनाक हकीकत’ दिखाने से तनाव फैल सकता है। लेकिन न लिखने-दिखाने से जो भरोसा खत्म हो रहा है, उसका क्या? आबादी के किसी हिस्से में पैदा हुआ अविश्वास, जो तनाव पैदा करता है, वो किसी देश के लिए कितना खतरनाक हो सकता है, इतिहास ऐसे किस्सों से भरा पड़ा है।
तो क्या कोई रास्ता नहीं है? नहीं, बिलकुल है। सबसे जरूरी है दिलों में आई दरार को पाटना। नफरत की बारिश में प्यार के गुलमुहर खिलाना। लोगों को अहसास दिलाना कि इंसान होने का कुछ और मतलब होता है। अगर गांधी जी का कांग्रेस के लिए कुछ मतलब हो तो राहुल गांधी कांग्रेस कार्यकर्ताओं को निर्देश दें कि वे रामधुन गाते हुए गांव-गांव प्रभात फेरियां निकालें। समाजवादी कार्यकर्ता लाल टोपी पहनकर लोहिया और चरण सिंह के विचारों के पर्चे बांटें। जगह-जगह सभाएं करें। लोगों से संवाद करें। तब शायद उन्हें ये भी पता चलेगा कि उनके पास सिर्फ सत्तासुख लेने वाले हैं, या विचारधारा को समर्पित कार्यकर्ता भी बचे हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यकर्ताओं के लिए शहीद-ए-आजम भगत सिंह का सांप्रदायिकता पर लिखा पर्चा बांटने का ये सबसे बेहतर मौका है।
वैसे, घर के मुकाबले शरणार्थी शिविर को तरजीह देते दंगा पीड़ित सरकार के इकबाल के खत्म होने का भी सबूत हैं। इसमें तब्दीली तभी आ सकती है जब लखनऊ में बैठे मुलायमनंदन अखिलेश यादव जाग जाएं। उनकी सरकार बिना किसी भेदभाव और चुनावी हानि-लाभ का ख्याल किए बिना दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाएं। गांव-गांव ये संदेश जाए कि दंगाइयों को किसी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। वरना इतिहास दर्ज करेगा कि 2013 में मोदी और मुलायम राज में सिर्फ इतना फर्क बचा था कि दंगा पीड़ितों को मिलने वाले चेक की राशि कुछ ज्यादा थी। शिकारी गुजरात में भी आजाद घूम रहे थे और यूपी में भी। मुझे डर है कि कोई बड़ा नेता अगली बार कैंपों में गया तो कोई पीड़ित चीख कर पूछ न ले-‘इंसाफ का कंबल कहां है कमबख्तो..!’

(डॉ. पंकज श्रीवास्तव के बारे में कुछ और करीब 15 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय डॉ.पंकज श्रीवास्तव आईबीएन7 में एसोसिएट एडिटर हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इतिहास में डी.फिल करने के साथ उन्होंने मशहूर हिंदी दैनिक अमर उजाला से पत्रकारिता की शुरुआत की। पहले कानपुर और फिर लखनऊ ब्यूरो से जुड़कर उत्तर प्रदेश की राजनीति और दलित उभार पर विशेष रिपोर्टिंग की। 2003 की शुरुआत के साथ स्टार न्यूज की लॉन्चिंग टीम के हिस्सा बने। कुछ दिन वाराणसी और फिर चैनल का लखनऊ ब्यूरो संभाला। स्टार न्यूज में रहते हुए देश भर में घूम-घूम कर ट्रैवलॉग करने के लिए खासतौर पर पहचाने गए। सितंबर 2007 में सहारा के राष्ट्रीय न्यूज चैनल ‘समय’ की लॉन्चिंग टीम में शामिल हुए, जहां बतौर फीचर एडीटर और एंकर काम करने के बाद मार्च 2008 से आईबीएन7 में कार्यरत।)

(First Published in IBN KHABAR)

http://khabar.ibnlive.in.com/blogs/23/950.html

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