तर्जनी की छुअन से थरथराता यह हथियार लेकिन कोई मयार्दा नहीं जानता, साठ सैकिंड उर्फ छः सौ गोली का आफताबः आशुतोष भारद्वाज

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बंदूक कमबख्त बड़ी कमीनी और कामुक चीज रही। सुकमा के जंगल में काली धातु चमकती है। स्कूल के एनसीसी दिनों में पाषाणकालीन थ्री-नाट-थ्री को साधा था — बेमिसाल रोमांच। गणतंत्र दिवस परेड के दौरान रायफल के बट की धमक आज भी स्मृति फोड़ती है।

लेकिन यहां एसएलआर यानी सैल्फ-लोडिंग राइफल और मानव इतिहास की सबसे मादक और मारक हमला बंदूक एके-47। भारतीय आजादी के साल किसी रूसी कारखाने में ईजाद और आजाद हुये इस हथियार के अब तक तकरीबन दस करोड़ चेहरे सूरज ने देख लिये हैं। इसकी निकटतम प्रतिद्वंद्वी अमरीकी एम-16 महज अस्सी लाख। एक बंदूक अपने चालीस-पचास वर्षीय जीवनकाल में दस इंसानों ने भी साधी तो सौ करोड़। भारत की आबादी जितने होंठ इसे चूम चुके।

इसका जिस्म, जोर और जहर गर्म मक्खन में चाकू की माफिक दुश्मन की छाती चीरता है। ख्रुश्चेव की सेना ने 1956 का हंगरी विद्रोह इसी बंदूक से कुचला था। वियेतनाम युद्ध में इसने ही अमरीकी बंदूक एम-14 को ध्वस्त किया। झुंझलाये अमरीकी सिपाही अपने हथियार फैंक मृत वियेतनामियों की एके-47 उठा लिया करते थे। समूचे सोवियत खेमे और गुटनिरपेक्ष देषों को यह हथियार निर्यात और तस्करी के जरिये पहुंचता था।

शीत युद्ध के दौरान नाटो सेना अपने तकनीकी ताप के बावजूद इस बंदूक का तोड़ नहीं ढूंढ़ पायी थी। पिछले साठ साल में दुनिया भर के सशस्त्र विद्रोह इसकी गोली की नोक पे ही लिखे गये। दक्षिण अमरीका या ईराक, पश्चिमी आधिपत्य के विरोध में खड़े प्रत्येक छापामार लड़ाके का हथियार।

दिलचस्प कि सोवियत सेना को आखिर उनके ही हथियार ने परास्त किया, सोवियत किले पर पहला लेकिन निर्णायक प्रहार इस बंदूक ने ही किया। 1979 में अफगान युद्ध के दौरान अमरीका ने दुनिया भर से एके-47 बटोर अफगानियों को बंटवायीं और लाल सेना अपनी ही निर्मिति को सह नहीं पायी। दस साल बाद जब सोवियत टैंक अफगानी पहाडि़यों से लौटे तो पस्त सिपाहियों की बंदूकों का जखीरा छिन चुका था।

आज भी तालिबानी लड़के इसी कलाश्निकोव का घोड़ा चूमते हैं, राकेट लांचर की गुलेल बना अमरीकी हैलीकाप्टर आसमान से तोड़ पहाडि़यों में गिरा लेते हैं। इतना मारक और भरोसेमंद हथियार नहीं हुआ अभी तक। अफ्रीकी रेगिस्तान, साइबेरिया की बर्फ या दलदल — कीचड़ में दुबका दो, साल भर बाद निकालो, पहले निशाने पर झटाक। तमाम देशों की सेना इसके ही मूल स्वरूप को लाइसैंस या बिना लाइसैंस ढालती हैं। चीनी टाइप-56, , इजरायल की गलिल या भारतीय इन्सास — सब इसकी ही आधी रात की संताने।

अकेली बंदूक जिस पर पत्रकार और सेनापतियों ने किताबें लिखी। लैरी काहानेर की बेजोड़ किताब द वैपन दैट चेंज्ड द फेस आफ वार। समूचे मानव इतिहास में, सैन्य विषेषज्ञ बतलाते हैं, किसी अकेले हथियार ने इतनी लाष नहीं गिराई। परमाणु बम होता होगा सेनापतियों की कैद में, राजनैतिक-सामरिक वजहें होंगी उसके बटन में छुपी। तर्जनी की छुअन से थरथराता यह हथियार लेकिन कोई मयार्दा नहीं जानता।

सच्चा साम्यवादी औजार यह — हसीन, सर्वसुलभ, अचूक।

समूची पृथ्वी पर सर्वाधिक तस्करी होती बंदूक। कई जगह मसलन सोमालिया में छटांक भर डालर दे आप इसे कंधे पर टांग शिकार को निकल सकते हैं। हफ्ते भर के तरकारी-झोले से भी हल्की और सस्ती।

नाल से उफनती चमकते पीतल की ज्वाला। झटके में पीली धातु का जाल हवा में बुन देगी। साठ सैकिंड उर्फ छः सौ गोली का आफताब। पिछली गोली का धुंआ अगली को खुद ही चैंबर में खटाक से अटका देगा। एक सैंकिड उर्फ ढाई हजार फुट दौड़ मारेगी गोली। हथेली का झटका और दूसरी मैगजीन लोड। कैंची साइकिल चलाने या रोटी बेलने से कहीं मासूम इसका घोड़ा। साइकिल डगमगायेगी, गिरायेगी,  घुटने छील जायेगी, चकले पर आटे का लौंदा बेडौल होगा, आंच और आटे का सम सध नहीं पायेगा — यह चीता लेकिन बेफिक्र फूटेगा। फूटता रहेगा। कंधे पर टंगा कमसिन करारा, तर्जनी पर टिका शोख शरारा।

बित्ता भर नीचे मैगजीन उर्फ रसद पेटी का बेइंतहा हसीन कोण। पृथ्वी पर कोई बंदूक नहीं जिसकी अंतडि़यां यूं मुड़ती जाये।

दुर्दम्य वासना,  इसके सामने मानव जाति को उपलब्ध सभी व्यसन बेहूदे और बेबस और बेमुरब्बत। जैन अनुयायी भले हों आप इस हथियार का सत्संग करिये, यह संसर्ग को उकसायेगी, आपकी रूह अंतिम दफा कायांतरित कर जायेगी। नवजात सिपाही का पहला स्वप्न। शातिर लड़ाके की अंतिम प्रेमिका। लड़ाके की पुतलियां चमकेंगी ज्यों वह बतलायेगा आखिर क्यों यह हथियार कंधे से उतरता नहीं।

क्या इतना मादक हथियार क्रंति का वाहक हो सकता है? क्रांति षस्त्र को विचार ही नहीं तमीज और ईमान और जज्बात की भी लगाम जरूरी जो लड़ाके खुद ही बतलाते हैं इस हथियार संग असंभव। क्या उन्मादा पीला कारतूस ख्वाब देख सकता है? या गोली की नोक भविष्य का जन्माक्षर लिख सकती है, वह पंचाग जिसकी थाप पर थका वर्तमान पसर सके, आगामी पीढि़यां महफूज रहे?

फकत दो चीज अपन जानते हैं। पहली, अफगानियों को इस हथियार से खेलते देख उस रूसी सिपाही ने कहा था — अगर मुझे मालूम होता मेरे अविष्कार का ये हश्र होगा तो घास काटने की मशीन ईजाद करता।

दूसरी — जब तोप मुकाबिल हो, अखबार निकालो।

आखिर मिखाइल तिमोफीविच कलाश्निकोव बचपन में कवितायें लिखते थे, सेना में भरती होने के बावजूद कवितायें लिखते रहे थे।

इतिहास का सबसे संहारक हथियार भी क्या किसी असफल रूसी कवि को ही रचना था?

इंडियन एक्पप्रेस के पत्रकार नक्सलवाद के जानकार हैं। कथा-कहानी भी रचते हैं।

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