स्वर्ण युग का भस्मासुर – Ravish Kumar

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राजनीति आपकी कमज़ोर स्मृतियों के सहारे ऐसे मिथक की रचना करती है जिसका कोई व्यावहारिक आधार नहीं होता है। हम हर पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वो भारत देश है मेरा, सुन कर भावविभोर होते रहते हैं। पर एक पल के लिए सोचते तो होंगे कि क्या सचमुच ऐसा कोई काल रहा होगा जब सोने की चिड़ियां डालो पर बसेरा करती होगी। आप कहेंगे कि गीतकार ने प्रतीकों के सहारे बताने का प्रयास किया है कि कभी भारत इतना खुशहाल और भरापूरा देश था। दरअसल तब भी यह हकीकत के करीब नहीं हैं। स्वर्ण युग और अंधकार युग इतिहास लेखन के शुरूआती दौर की ऐसी नादानियां हैं जिसका परित्याग करने के लिए दुनिया भर के इतिहासकारों को लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा है। इतिहासलेखन में किसी दौर को देखने का यह मान्य पैमाना नहीं रहा कि फलां युग स्वर्ण युग था या अंधकार युग । ये और बात है कि इसके अवशेष अब भी मिल जाते हैं, खासकर राजनीति में तो यह अभी भी एक दिव्य और अकाट्य तथ्य के रूप में पेश किया जाता रहता है।

स्वर्ण युग की चर्चा इसलिए कर रहा हूं कि रविवार को बीजेपी के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वाजपेयी जी का युग स्वर्ण युग था। स्वर्ण युग का प्रमाण क्या दिया उन्होने कि जीडीपी रेट ८.४ था। नरेंद्र मोदी ने यह नहीं बताया कि फिर भारत की जनता ने उस स्वर्ण युग को क्यों दो बार खारिज कर दिया। क्या जनता १९९९ से २००४ के वर्तमान में यह नहीं देख पा रही थी कि हमारे सामने से कोई स्वर्ण युग गुज़र रहा है। जिस शाइनिंग इंडिया अभियान पर हार के बाद बीजेपी के ही नेता सवाल उठा चुके हैं एक बार फिर से एन डी ए युग को शाइनिंग इंडिया का नया नाम दिया जा रहा है। स्वर्ण युग का। इसके जवाब में कांग्रेस के प्रवक्ता ने भी एलान कर दिया कि एनडीए का स्वर्ण युग नहीं था। स्वर्ण युग तो यूपीए वन का था। अरे वाह, आप स्वर्ण युग में रह रहे हैं फिर भी आप महंगाई और भ्रस्टाचार से त्रस्त हैं। यह कैसा स्वर्ण युग है। शायद है क्योंकि आप में से कई तीस हज़ार प्रति ग्राम सोना खरीदने लगे हैं। देश में सोना कम आए इसके लिए वित्त मंत्री सोने का आयात रोकने के लिए आयात कर बढ़ाते जा रहे हैं। चिदम्बरम यूपीए वन को स्वर्ण युग बताने में इतने व्यस्त हो गए कि भूल गए कि कोई यूपीए द्वितीय के बारे में भी पूछ सकता है ।

ऐसा क्यों होता है कि हमारी राजनीति भविष्य की तरफ बढ़ते बढ़ते अतीत की लोककथाओं से मिथकों की चोरी सत्यकथा की तरह करने लगती है। कभी ये दल राम राज्य की बात करने लगते हैं, अचानक राम राज्य को छोड़ स्वर्ण युग की बात करने लगते हैं। सबके भाषणों को आप सुनिये तो लगेगा कि देश किसी अंधकार में डूबा हुआ है। भारत ने कुछ हासिल ही नहीं किया है। फिर इसी में से कोई नेता आकर बोल देता है कि नहीं नहीं ऐसा नहीं है। ६७ साल की आज़ादी में हमने कुछ नहीं हासिल किया मगर इसमें से पांच साल हम स्वर्ण युग में थे। दिग्विजय सिंह कहते हैं कि इसी स्वर्ण युग में संसद पर आतंकी हमले हुए, आतंकवादियों को उनकी पसंद की जगह तक जाकर छोड़ा गया। दरअसल इतिहासहास लेखन में भी यही होता है । जिस किसी कालखंड को स्वर्ण युग या अंधकार युग कहा गया है,जवाबी तर्कों के सहारे इन अवधारणों को चूर चूर कर दिया जाता है। सही बात है कि राजनीति के पास विकल्प के नाम पर कोई विकल्प नहीं है। यह थकी हुई और अकाल्पनिक राजनेताओं की फौज है जिसे युद्ध करना ही है इसलिए बेमन से रणभेरियां बजा रहे हैं। खुद नहीं बजा सकते तो आजकल जनसंपर्क एजेंसियों पर करोड़ों खर्च करते हैं कि भाई आप ये बिगुल बजाते रहो।

क्या आप सोने की लंका को स्वर्ण युग कहेंगे जो भस्म हो गई । हमारी राजनीति में भारत के सुदूर अतीत में किसी सतयुग की खोज करने की आदत आज की नहीं है। यह आजादी की लड़ाई के दौरान भी थी जब भारत अपनी अस्मिता की तलाश में ऐसे युगों की खोज कर रहा था जिनसे ग़ुलामी की ग्लानि

से उबरने में मदद मिल सके । जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया बैठा करती थी टाइप । इस खोज ने हमारी पहचान की तत्कालिक ज़रूरतें तो पूरी की मगर इसी की बुनियाद में सांप्रदायिकता के स्वर्णिम और मिथकीय बीज भी पड़ गए। जहां से हम किसी अखंड भारत की तलाश करने लगे और किसी एक धर्म के वर्चस्व का सपना बांटने लगे। हमारी राजनीति को ऐसी उपमाओं से मुक्त करने की सख्त ज़रूरत है। अगर स्वर्ण युग का पैमाना जीडीपी का आंकड़ा है तो कई लोग यह भी तो कहते हैं कि जी़डीपी के रेट से विकास की असली तस्वीर नहीं दिखती। कहां है स्वर्ण युग । क्या गुजरात में हैं, क्या मध्य प्रदेश में है, क्या छत्तीसगढ़ में है, क्या दिल्ली में है, क्या यूपी और बिहार में है। अगर है तो सारे दल ग्रोथ रेट के इन गगनचुंबी आंकड़ों के बाद भी सत्तर से नब्बे फीसदी आबादी को सस्ता अनाज देने की होड़ में क्यों है। यही लोग एक वक्त पर कहते हैं कि विकास सबके द्वार तक नहीं पहुंचा। यही लोग मंच पर आकर कहते हैं कि हमारा वाला युग स्वर्ण युग था। कहीं ये राजनीतिक दल अपने घोटाले और कमाई के मौके को स्वर्ण युग तो नहीं बता रहे।

अच्छा है कि हमारी राजनीति में जीडीपी के सहारे विकास की बात हो रही है। मगर जीडीपी विकास की संपूर्ण तस्वीर नहीं है। हो सकता है कि किसी राज्य का जीडीपी काफी हो मगर आप ध्यान से देखेंगे कि यह रेट इसलिए ज्यादा है कि क्योंकि उस राज्य में किसी एक सेक्टर का एकतरफा विकास हुआ है। पचास फैक्ट्रियां लग जाने से जीडीपी बढ़ सकती है लेकिन क्या इससे सारा राज्य खुशहाल हो सकता है,यह बात गारंटी से नहीं कही जा सकती है। कुछ लोगों का कहना है कि यह राहत की बात है कि जीडीपी की बात हो रही है। पहचान की राजनीति पीछे जा रही है। पर ऐसा कहां हो रहा है। सबकुछ एक साथ चल रहा है. पहचान की राजनीति एक दिन तो दूसरे दिन जीडीपी की राजनीति। जीडीपी को भी किसी सतयुग या स्वर्ण युग से जोड़कर पहचान की राजनीति ही की जा रही है। नरेंद्र मोदी के इस बयान पर पी चिदंबरम ने कहा कि वे तथ्यों के साथ फर्जी एनकाउंटर करते हैं तो बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि चिदंबरम तथ्यों का आतंकवाद फैला रहे हैं। दोनों अपने अपने हिसाब से तथ्यों को पेश कर रहे हैं। आम जनता को काफी सावधानी के साथ आंकड़ों की इस राजनीतिक बाज़ीगरी को समझना चाहिए। स्वर्ण युग एक प्रलोभन है। यह न तो कभी था और न कभी आएगा। दोपहर के वक्त अक्सर गलियों में ठग नकली सुनार बनकर आ जाते हैं। सोना चमकाने के नाम पर आपका असली सोना लेकर चंपत हो जाते हैं। ऐसे स्वर्ण युग के दावेदारों से सावधान रहियेगा।

(यह लेख आज के राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है)

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