कुछ मकान बूढ़े हो जाते हैं – Mayank Saxena

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कुछ मकान
बूढ़े हो जाते हैं जब
तो दरकने लगते हैं
दरकते मकानों को
रास नहीं आती
मरम्मत
पुताई
लेकिन वो
करवाता जाता है
ये सब कुछ
सिर्फ इसलिए
कि बचा रहे वो
देता रहे लोगों को आसरा
मानते रहें
लोग उसका अहसान
बने रहें शरण में
कहते रहें
देखो
असल तो पुराना ही है
नया तो बेकार है
कभी लगता है
समाज…
कहीं कोई पुराना मकान तो नहीं…

One thought on “कुछ मकान बूढ़े हो जाते हैं – Mayank Saxena

  1. kuchh rishte bhi to aise hi hote hian ham ki marammat karte jate hian jabki unki buniyaden bahut hi khokhli hoti hain, ye soch kar ki ye hamara sahara hain, jabki asaliyat mein ham unhein apne sahare se chala rahe hote hain

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