निराला अन्तर्जातीय विवाह और दलित शिक्षा के विरोधी थे – कॅंवल भारती

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कहा जा रहा है कि मैंने ‘निराला का वर्णाश्रम प्रेम’ में निराला को आधा उद्धरित किया है, आधा छोड़ दिया है, जिसमें निराला ने शूद्र शक्ति के उत्थान और जागरण में देश के पुनरुद्धार की बात कही है। मैंने जो छोड़ा है, उसे मैं यहाॅं प्रस्तुत कर रहा हूॅं। असल में सवाल छोड़ने का नही है, वरन् विश्लेषण का है। निराला के कथन में व्यंग्य है, जिसे वे लोग नहीं देख पा रहे हैं। अव्वल तो निराला द्विजों को शूद्रों के पतन का जिम्मेदार नहीं मानते। उसी लेख में वे आगे(मतलब शूद्र इसी के अधिकारी थे) लिखते हैं-‘शंकर (आचार्य) ने जो अनुशासन (प्रतिबन्ध) दिये हैं, वे अधिकारियों के विचार से ही दिये गये हैं। न शूद्रों ने अपने इतर कर्मों को छोड़ा, न वे उठ सके। इनके गिरने में हिन्दू समाज के द्विजत्व का क्या कसूर?’ (चाबुक, पृष्ठ 54)

यानी, निराला के अनुसार शूद्र इसी के अधिकारी थे। पर, ये इतर कर्म कौन से थे, जिनके छोड़ने से शूद्रों का पतन हुआ? इसका खुलासा निराला ने क्यों नहीं किया है?
ब्रिटिश सरकार ने चाहे कुछ और किया हो या न किया हो, पर सबसे बड़ा उसने काम यह किया था कि कानून के सामने सबको बराबर कर दिया था। समानता की इस क्रान्ति से निराला बहुत दुखी थे। अपने इस दुख को उन्होंने इन शब्दों में व्यक्त किया था-‘हिन्दुस्तान पर अॅंगे्रजों का शासन सुदृढ़ हो गया, उस समय ब्राह्मण शक्ति तो पराभूत हो चुकी थी, क्षत्रिय और वैश्य शक्ति भी पूर्णतः विजित हो गयी। शिक्षा जो थी अॅंगे्रजों के हाथ में गयी, अस्त्र विद्या अॅंगे्रजों के अधिकार में रही, व्यवसाय, कौशल भी अॅंगे्रजों के हाथ में है। भारतवासियों के भाग्य में पड़ा शूद्रत्व। अदालत में ब्राह्मण और चाण्डाल की एक ही हैसियत, एक ही स्थान, एक ही निर्णय। बाहरी प्रतिघातों ने भारतवर्ष के उस समाज-शरीर को, उसके उस व्यक्तित्व को समूल नष्ट कर दिया। ब्रह्म-दृष्टि से उसका अस्तित्व ही न रह गया।’ (वही, पृष्ठ 55)

निराला यह मानने के लिये विवश थे कि ‘भारतवर्ष का यह युग शूद्र-शक्ति के उत्थान का युग है और देश का पुनरुद्धार उन्हीं के जागरण की प्रतीक्षा कर रहा है।’ (वही, पृष्ठ 56) यह उनका व्यंग्यात्मक कथन है, जिसमें स्वर पुनरुत्थान का ही है, क्योंकि अगले ही क्षण वे उसी लेख में अन्तर्जातीय विवाह और खान-पान का विरोध करते दिखायी देते हैं। उनके ये शब्द देखिए-‘अछूतों के साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध स्थापित कर उन्हें समाज में मिला लिया जाय या इसके न होने के कारण ही एक विशाल संख्या हिन्दू राष्ट्रीयता से अलग है, यह एक कल्पना के सिवा कुछ नहीं। दो मनों की जो साम्य स्थिति विवाह की बुनियाद है और प्रेम का कारण, इस तरह के विवाह में उसका सर्वथा अभाव ही रहेगा और जिस योरप की वैवाहिक प्रथा की अनुकूलता सन्तराम जी (जातपात तोड़क मण्डल के मन्त्री) ने की है, वहाॅं भी यहीं की तरह वैषम्य का साम्राज्य है।’ (वही, पृष्ठ 60)

निराला तुलसी के भक्त हैं और उन्हीं का अनुसरण करते हुए कहते हैं कि दलित कितना ही योग्य हो, वह ब्राह्मण के बराबर नहीं हो सकता, भले ही ब्राह्मण कितना ही दुर्गुणों से भरा हो। ये शब्द देखिए-‘ब्राह्मणों में भी भंगी, चरसी, शराबी और कबाबी हैं। पर, इसीलिये अन्त्यजों (दलितों) से उनकी तुलना नहीं हो सकती। दूसरे, तुलना यह इस तरह की है, जैसे करोड़पति ऐयाश-दिल लड़के से किसी मजदूर के ऐयाश-दिल लड़के की।’ (वही, पृष्ठ 61)

निराला शूद्रों की अॅंगे्रजी शिक्षा के भी विरोधी थे। उन्होंने सन्तराम जी द्वारा शूद्र-शिक्षा का समर्थन करने के विरुद्ध यह तर्क दिया कि इससे बी. ए. पास शूद्र ब्राह्मणों को शिक्षा देने लग जायेंगे। उनका यह हास्यास्पद कथन इस प्रकार है-‘अॅंगे्रजी स्कूल और कालेजों में जो शिक्षा मिलती है, उससे दैन्य ही बढ़ता है और अपना अस्तित्व भी खो जाता है। बी. ए. पास करके झींगुर लोध अगर ब्राह्मण को शिक्षा देने के लिये अग्रसर होंगे, तो सन्तराम जी ही की तरह उन्हें हास्यास्पद होना पड़ेगा।’ (वही, पृष्ठ 61)

जिस समय निराला ने यह लेख लिखा, पूना-पैक्ट हो चुका था और पूरे देश में दलित-उभार का जबरदस्त राजनीतिक और सामाजिक दबाव बना हुआ था। निराला इस दबाव से कब तक बचे रह सकते थे? अन्ततः, उन्होंने भारी मन से इसे स्वीकार किया और ‘चतुरी चमार’ तथा ‘जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाओ’ जैसी कुछ रचनाएॅं लिखीं, जिनको आधार बनाकर ही उनके ब्राह्मण आलोचक उन्हें प्रगतिशील बनाने पर तुले हुए हैं। किन्तु दलित आलोचना इन रचनाओं को भी दलित-पक्ष की नहीं मानती।
17-7-2013

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