आत्म चिंतन उपवास : भारत को आदिवासियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए

gond woman

प्रिय साथियों,

अभी आदिवासी इलाकों में शांति लाने के नाम पर बड़ी संख्या में सैन्य बलों को भेजने का काम किया जा रहा है .

जबकि अभी तक का अनुभव यह रहा है कि हमारे सैन्य बलों के आदिवासी इलाकों में जाने से वहाँ अशांति ख़त्म नहीं हुई है बल्कि और भी ज़्यादा बढ़ गई है .

पिछले काफी लंबे समय से आदिवासियों पर सरकारी अत्याचारों का लम्बा दौर चला है .लेकिन अगर कोई आदिवासी सरकारी अत्यचार के विरुद्ध न्याय मांगता है तो उसे भी नक्सली घोषित कर फिर से सताया जाता है . इस तरह सरकार ने आदिवासियों के लिये न्याय पाने के सभी रास्ते बंद कर दिये हैं .

सोनी सोरी, लिंगा कोडोपी और बिनायक सेन के ऊपर इसलिये सरकारी अत्याचार हुए क्यों कि इन्होने अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाई थी .

हम जानते हैं कि भारत का शहरी पढ़ा लिखा समृद्ध वर्ग आदिवासी इलाकों में भारी मात्रा में सैन्य बल भेज कर आदिवासियों के संसाधनों पर कब्ज़ा करने को गलत नहीं मानता .

इस के साथ साथ इस लूट के कारण होने वाले विस्थापन और उससे होने वाले असंतोष को दबाने के लिये ताकत का इस्तेमाल करने की ही बातें की जा रही हैं .

लेकिन अगर भारत अपने नागरिकों को इस तरह मारेगा तो भारत के ताकतवर समुदाय का नैतिक पतन हो जाएगा .

भारत को एक राष्ट्र के रूप में सोचना पड़ेगा कि यह देश अपने मूल निवासियों के साथ कैसा सुलूक करेगा।

क्या हम आदिवासियों की ज़मीनों पर पुलिस की बंदूकों के दम पर कब्ज़ा जायज़ मानते हैं ? क्या हम मानते हैं कि आदिवासियों की बस्तियों में आग लगा कर उन्हें उनके गाँव से भगा कर उनकी ज़मीनों पर कब्ज़ा करने के बाद हम इस देश में शांति ला सकते हैं ?

एक बार हमें अगर अपने ही देशवासियों के साथ अन्याय करने की आदत पड़ गई तो क्या यह आदत हमें किस के भी साथ अन्याय करने का रास्ता नहीं खोल देगी ?

आज हम आदिवासी पर हमला करेंगे ,फिर हम दलितों को मारेंगे, फिर हम गाँव वालों को मारेंगे .और एक दिन हम चारों तरफ से अपने ही बनाये गये दुश्मनों से घिर जायेंगे .

इसलिये आज ही हमें आदिवासियों के साथ हमारे सुलूक की समीक्षा करनी चाहिये .

मेरी विनम्र कोशिश है कि इसी मौके को हम आदिवासियों के साथ इस देश को कैसा सुलूक करना चाहिये इस मुद्दे पर सोचने के रूप में सदुपयोग करें .

इस मुद्दे पर आत्म चिंतन करने के लिये मैं एक जून (1 JUNE ) से जंतर मंतर पर एक अनिश्चित कालीन उपवास पर बैठा हूँ और आशा करता हूँ आप भी, जहाँ कहीं भी होगें इस विषय पर आत्मचिंतन करेंगे।

ये सिर्फ आदिवासियों का सवाल नहीं है बल्कि उन सबका सवाल है जो एक बेहतर समाज का निर्माण चाहते हैं, जहाँ सब को न्याय मिले क्यूंकि न्याय बिना शांति की कल्पना भी असंभव है.

अगर आपसे मुमकिन हो तो जंतर मंतर पहुँचे, हमें अच्छा लगेगा.

आपका

हिमांशु कुमार

जंतर मंतर, नई दिल्ली

5 thoughts on “आत्म चिंतन उपवास : भारत को आदिवासियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए

  1. band karo ye natak…..aapke ” hum” me koi bhartiya shamil nahi hai……ye khud ka banaya adamber hai jisme bhartiyon aur aadivaasi ko alag karne ki koshish ki jaa rahi hai..jis se dukaan chalti rahe..

  2. Jayant Ji, ye Himanshu ji koi adambar nahi kar rahe hai aur na hi koi dukan chala rahe hai. unhone to apni achchi khasi sarakari noukari chhod kar pidit logo ke baare me socha hai. vaha jakar ashram khola jise c.g. sarkar ne jala diya. c.g. poolish ne 4 gao ko khak kar diya tha sirf adivasiyo ki jameen lene ke liye uske badle unhe koi harjana nahi balki apne betiyo aur bahuo ki izzat poolish valo ko deni padi. aadmi ko marne ke do tarike hote- ek to aap illegal tarike mare jisse sarkar aapko saja nahi degi aur dusri legal tarike se, jisme aapko sarkar koi saja nahi degi..

  3. Himanshuji, kya Mahendra Karma aapka mitra tha? Uske maare jane par aapne shradhanjali arpit ki hai?

  4. Himanshuji, kya Mahendra Karma aapka mitra tha? Uske maare jane par aapne shradhanjali arpit ki hai? Kya congressiyon ki tarah Mahendra Karma ke bawat upwas hai?

  5. यह क्या है हिमांशु जी !
    भारत सरकार और आदिवासी क्या अल अलग हैं ? क्या आदिवासी भारत का हिस्सा नहीं है ? अब जब नक्सलीओं पर सरकार करवाई करना चाहती है तो आदिवासी आपको दिखने लगा ? कुछ साल पहले जब पुलिस ने आपको सुरक्षा उपलब्ध करवाई थी तो आपने छत्तीसढ़ छोड़ दिया था ! ऐसा मत करो की लोग आदिवासिओं को माओवादी समझने ल जाएँ ! लोगों की सहानुभूति को ख़त्म मत करो ! आदिवासिओं को देश द्रोही क्यूँ घोषित करना चाहते हैं ? अपनी तरह ! अपने फोरेन फंडिंग के लिए इतनी इरी हुयी हरकत तो मत कीजिये ! Nichtayi ki had hoti hai
    .

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