कमला नगर दोस्तों को एक आमंत्रण (Kishore Jha)

Kishore
Kishore

वर्षों पुरानी आंटे की चक्की और पहलवान की दूकान अब नहीं रहे

वक़्त का अहसास कराने वाला बिड़ला मिल का सायरन भी अब नहीं बजता

बिड़ला मिल की तरह गणेश मिल और न जाने कितनी मिलों पर ना जाने कब से ताला लटका है

 

घंटा घर से चांदनी चौक तक चलता तांगा अब शायद ही दिखे

पर साठ के दशक में चलने वाली ट्राम के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं 

बंगलो रोड के आलिशान बंगलों की जगह बिल्डर्स के फ्लैट खडें हैं 

और कॉलेज की किताबों की दुकानों की जगह आदिदास और लेवाइस के शोरूम 

 

किरोड़ीमल कॉलेज से हनुमान मंदिर तक का शॉर्टकट अब “आम रास्ता” नहीं रहा

और आँख बंद करके नापी हुई गलियां अब खुली आंखों से भी पहचानी नहीं जाती

 

 

मंडेलिया पार्क में खेलते बच्चे  और गलियों में गपियाते लड़कों की टोलियां अब कहां हैं

खो खो , कब्बडी,  स्टापू , गिट्टे न जाने कोई खेलता भी है या नहीं

और शायद ही कोई गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचाता हो

 

“पप्पू की मा तेरा फ़ोन आया है “ऐसी आवाजें शायद ही किसी बिल्डिंग में गूंजती हो

और शायद ही किसी बिल्डिंग के सभी बाशिंदे “चित्रहार” देखने के लिए एक ही जगह महफ़िल जमातें हों

गर्मियों की रातों में छत पर सोने से पहले न ख़त्म होने वालीं कहानियां अपने अंजाम तक जा पहुंची है

और छतों की मुंडेरों पर शुरू हुईं न जाने कितनी ही प्रेम कहानियां अब फेसबुक पर परवान चढ़ रहीं हैं 

 

कॉफ़ी हाउस में साफा पहने वेटर की जगह बारिस्ता के बार टेंडर ने ले ली है

दर्जनों दर्जियों की दूकानों में काम करते कारीगर शायद अब किसी गारमेंट फैक्ट्री में अपना हुनर दिखातें हों 

पर गली गली घूमते और बर्तन कलई करते कारीगरों के हुनर की तो आज शायद ही कोई कीमत हो

गली मोहल्ले में जादू दिखाते जादूगर आजकल कभी-कभी “kingdom“ में दिखते हैं

पर मालूम नहीं की रस्सी पे चलती उस लड़की को किसी सर्कस में काम मिला के नहीं  

 

 

पर “छोटी” और “बड़ी धर्मशाला” आज भी वहीँ खड़ीं हैं जहाँ तुम छोड़ के आये थे

“आप की दुकान” और “नरूला टेंट हाउस” आज भी बदलते वक़्त के गवाह के तौर पर मौजूद हैं

और “लड़का ही होगा” की मान्यता के लिए मशहूर नर्सिंग होम ने दो बिल्डिंगे और खरीद ली हैं और दिल्ली में घटते लिंग अनुपात और बढ़ती “तरक्की” में अपना महतवपूर्ण योगदान दे रहा है   

 

शेर दिल बिल्ले की किंग साइज़ लस्सी अब प्लास्टिक के गिलासों में बिकती है, पर उस पर रखी छाली थोड़ी पतली हो गयी है

पर वैष्णव की चाट, ब्रिज के रसगुल्ले और चाचा के भठूरे का स्वाद अब तक नहीं बदला

इससे पहले की ये बदलें

चलो छोटे गोलचक्कर पर मिलें, मिलकर चलें, इन्हें चखें, कुछ याद करें 

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